अष्टम ज्योतिर्लिंग त्रयंबकेश्वर (महाराष्ट्र): दर्शन समय, कैसे पहुँचें, नियम और पूरी यात्रा
किसी ने एक ऋषि से पूछा, “अगर सब कुछ किस्मत में लिखा जा चुका है तो फिर मंदिरों में जाकर दुआ मांगने से क्या होगा?” ऋषि ने बहुत ही प्यार से जवाब दिया और कहा, “यूं तो सब किस्मत में लिखा हुआ है पर महादेव ने कुछ पन्ने खाली छोड़े हैं और वह उन्हीं चीजों से भरते हैं जिसकी दुआ मनुष्य करता है।”
Published on: 23 February 2026 at 12:38 pm / Updated on: 24 May 2026 at 11:09 pm

अगर आपने भी त्रयंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग जाने का मन बना लिया है तो वहां जाने से पूर्व उसके मुख्य रहस्य को जरूर जाने:
- यहां पर मौजूद त्रिमुखी शिवलिंग आध्यात्मिक और ऐतिहासिक रहस्य से परिपूर्ण है।
- माना जाता है कि यह गौतम ऋषि की तपस्या से कहीं ना कहीं जुड़ी है।
- इस शिवलिंग में ब्रह्मा, विष्णु, और महेश तीनों के लिंग एक साथ है जो कि अपने में अद्भुत है।
- यही वह जगह है जहां से गोदावरी नदी का उद्गम हुआ था।
- काफी लोग इस शिवलिंग को उसके धीरे-धीरे धसने के कारण भी जानते हैं।
- कई भक्त अपने कालसर्प दोष के निवारण के लिए यहां जरूर आते हैं।
- माना जाता है यह सारी चीज इस स्थान को और भी रहस्यमय और शक्तिशाली बनाती है।
त्रयंबकेश्वर मंदिर का इतिहास
- इतिहास के अनुसार इस मंदिर का पूर्ण निर्माण नाना साहब पेशवा जो की तीसरे पेशवा बालाजी थे ने करवाया था।
- इस मंदिर को बनने में 31 साल लगे 1755 में शुरू होकर यह मंदिर 1786 में जाकर पूरा बना।
- उसे समय के आर्थिक अंको की माने तो इस मंदिर के निर्माण हेतु 16 लख रुपए खर्च किए गए थे जो कि आज की आर्थिक गणना के अनुसार खरबों में होंगे।
त्रयंबकेश्वर मंदिर के यह रहस्य जरूर जाने
- इस ज्योतिर्लिंग को त्र्यंबक यानी की तीन नेत्रों वाला इसीलिए कहा जाता है क्योंकि यह शिवलिंग तीन भागों में बनता है। पहला भाग ब्रह्मा जी यानी प्रकृति के सृजन करता, दूसरा भाग विष्णु जी यानी की धरती के पालनहर्ता, और तीसरा भाग महेश यानी की सृष्टि के संघार हारता को दर्शाता है। यह निश्चित रूप में अन्य ज्योतिर्लिंगों से भिन्न है।
- गौतम ऋषि पर गौ हत्या का मिथ्या आरोप लगा था जिसके मुक्ति पाने के लिए उन्होंने घनघोर तपस्या की। उनकी इसी तपस्या से खुश होकर महादेव ने मां गंगा को गोदावरी के रूप में इसी स्थान पर अवतरित किया और खुद ज्योतिर्लिंग के रूप में यही समा गए।
- इस ज्योतिर्लिंग के लिए यह भी मशहूर है कि जब कलयुग का अंत आएगा तब यह ज्योतिर्लिंग पूरी तरह से धरती में समा जाएगा और इस बात की पुष्टि करते हुए आप इसके घटते हुए आकार को आज भी देख सकते हैं।
- कालसर्प दोष से ग्रस्त लोग यहां खुद को बचाने के लिए भी आते हैं साथ ही साथ नारायण नागबली पूजा भी यहां पर की जाती है यह स्थान पितृ दोष और ग्रह दोष से मुक्ति पाने के लिए अत्यंत ही महत्वपूर्ण है।
- काफी लोग यह नहीं जानते कि यहां पर शिवलिंग भूमिगत है और अगर आप गर्भग्रह में जाएंगे तो वहां सिर्फ तीन मुख दिखाई देते हैं। माना जाता है कि यही कुशावर्त कुंड है जहां से गोदावरी नदी का उद्गम हुआ था। यह भी कहा जाता है यह पापों का नाश करने वाली नदी है।
- एक और आश्चर्य की बात यह है कि यह शिवलिंग हर तीसरे साल अपने लिंग को बदलता है यानी कि स्त्री से पुरुष में जो बात इसे और भी रहस्यमय बनाती है।
यह स्थान भक्तों को शांति और मोक्ष की प्राप्ति करवाता है और न जाने कितने रहस्य में शक्ति का केंद्र है।

त्रयंबकेश्वर मंदिर कब जाएं?
- त्रयंबकेश्वर मंदिर जाने के लिए कोई भी समय यूं तो अच्छा है पर नवंबर से फरवरी तक जब सर्दी का मौसम होता है तब जाना बेहतर है।
- जिन्हें मानसून यानी की जुलाई से सितंबर में जाना पसंद है वह भी इस वक्त जाकर झरनों और हरी भरी पहाड़ियों का आनंद ले सकते हैं।
- महाशिवरात्रि के दौरान भी यहां काफी भीड़ होती है।
- पितृ पक्ष के दौरान यहां काफी लोग पूजा के लिए आते हैं।
त्रयंबकेश्वर में कौन-कौन सी पूजा होती है?
जैसा कि सब जानते हैं यह 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और यहां खास करके महादेव की पूजा होती है पर साथ ही साथ यहां पर कुछ और पूजाएं भी होती हैं:
- कालसर्प शांति पूजा
- त्रिपिंडी श्राद्ध
- नारायण नागबली पूजा
- महामृत्युंज जाप
- रुद्राभिषेक
- ब्रह्मा विष्णु और महादेव की पूजा एक साथ
त्रयंबकेश्वर में कौन-कौन से त्योहार और धार्मिक आयोजन किए जाते हैं
- मकर संक्रांति के दौरान यहां काफी प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान होते हैं।
- श्रावण मास में भक्तों की लाइन लगी रहती है और खासकर सोमवार को बहुत सारे भक्त यहां दर्शन को आते हैं।
- पितृपक्ष के दौरान त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए यहां भीड़ इकट्ठा होती है।
- नाग पंचमी की पूजा केवल यही होती है इसीलिए यहां पर भक्तों का तांता लगा रहता है
- यहां एक तीन दिवसीय हिंदू समझ भी होता है जहां परिवार अपने सदस्यों की आत्मा की मुक्ति के लिए यहां पूजा करने आते हैं। ऐसी पूजा खासकर अचानक मृत्यु या दुर्मरण से हुई हुई मृत्यु के लिए की जाती है।
त्र्यंबकेश्वर कैसे जाएं?
रेलवे से जाने वालें – यहां सबसे नजदीक रेलवे स्टेशन नासिक रोड रेलवे स्टेशन है यहां से मंदिर की दूरी 39 किलोमीटर है।
हवाई जहाज से जाने वाले – सबसे नजदीकी हवाई अड्डा नासिक ओझार एयरपोर्ट पड़ता है जो त्रयंबकेश्वर से 35 से 50 किलोमीटर की दूरी पर है।
टैक्सी या निजी वाहन से जाने वाले – एयरपोर्ट और स्टेशन से आप आसानी से टैक्सी बुक करके लगभग एक से डेढ़ घंटे में मंदिर पहुंच सकते हैं।
बस से जाने वाले – यात्रियों को काफी सारी बसें भी मिल जाती है जो आपको इस मंदिर के दर्शन आसानी से कर सकती हैं।
त्रयंबकेश्वर में आरती का समय
त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में मुख्य रूप से दो बार आरती होती है– एक सुबह और एक शाम।
- सुबह की आरती को काकड़ आरती या फिर मंगल आरती भी कहा जाता है जो कि साढे 5 से 6 बजे तक होती है।
- श्याम की आरती 7:00 बजे से 9:00 बजे के बीच होती है।
- मंदिर सुबह 5:30 बजे से खुल जाता है और रात के 9:00 बजे तक खुला रहता है।
- अभिषेक पूजा के इच्छुक प्रातः 6:00 बजे से दोपहर के 12:00 तक यह पूजा कर सकते हैं।
- दोपहर की पूजा 1:00 से 1:30 तक होती है।
- जो लोग स्वर्ण मुकुट के दर्शन करना चाहते हैं वह हर सोमवार की शाम 4 से 5 बजे तक कर सकते हैं।
त्रयंबकेश्वर जाने से पहले यह बात जरूर याद रखें?
- हर सोमवार को शाम 4:00 से 5:00 बजे तक महादेव का स्वर्ण मुकुट जिसे पंचमुखी भी कहते हैं वह कुशवर्त तीर्थ ले जाया जाता है। इसके दर्शन आपको उसी दिन हो सकते हैं। इसके बाद उसकी विशेष आरती होती है जिसके दर्शन करना बिल्कुल भी ना भूले।
- खास तेनु और त्योहारों के दौरान आरती के समय में फेर बदल हो सकती है।
- मंदिर जाते वक्त शालीन पोशाक ही पहन कर आए।
बाबा के दरबार से खाली गया न कोय। हर हर महादेव!
भगवान शिव के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंग
| नाम | ज्योतिर्लिंग |
|---|---|
| प्रथम | सोमनाथ ज्योतिर्लिंग |
| द्वितीय | मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग |
| तृतीय | महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग |
| चतुर्थ | ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग |
| पंचम | केदारनाथ ज्योतिर्लिंग |
| षष्ठ | भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग |
| सप्तम | काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग |
| अष्टम | त्रयंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग |
| नवम | बैद्यनाथधाम ज्योतिर्लिंग |
| दशम | नागेश्वर ज्योतिर्लिंग |
| एकादश | रामेश्वर ज्योतिर्लिंग |
| द्वादश | घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग |