सप्तम ज्योतिर्लिंग काशी विश्वनाथ (उत्तर प्रदेश): यहां जाने से पहले जानें ये महत्वपूर्ण बातें

काशी विश्वनाथ मंदिर, शिवजी को समर्पित बनारस की भूमि पर स्थित है। यह ज्योर्तिलिंग पुराणों की माने तो शैव परंपरा का एक अनुपम प्रमाण है। मणिकर्णिका घाट पर स्थित इस मंदिर को शक्ति पीठ भी माना जाता है। 
महारानी अहल्याबाई ने 1780 में वर्तमान के काशी विश्वनाथ मंदिर की स्थापना की थी। लोग इसे विशेश्वर के नाम से भी जानते हैं। संतो की माने तो यहां दर्शन करने वाले प्रत्येक भक्त को मोक्ष की प्राप्ति होती हैं।

By: RevivingCultures
Published on: 15 April 2026 at 1:40 pm / Updated on: 24 May 2026 at 11:09 pm
सप्तम ज्योतिर्लिंग  काशी विश्वनाथ (उत्तर प्रदेश): यहां जाने से पहले जानें ये महत्वपूर्ण बातें

ज्योतिर्लिंग किसे कहते हैं?

शिवजी के प्रकाशमय रूप में प्रकट होने के स्वरूप को ज्योतिर्लिंग कहते हैं। 

काशी विश्वनाथ मंदिर की यह बातें ज़रूर जाने 

  •  यहां भगवान शिव की विश्वनाथ के रूप में पूजा होती हैं। 
  • यह भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के वाराणसी शहर में बसा हैं।
  • 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, यह असीम आस्था का प्रतीक है।
  • महारानी अहल्याबाई ने इसे 1780 में बनवाया था। 
  • 1983 से यह मंदिर उत्तर प्रदेश की सरकार के संरक्षण में है। 
  • मंदिर में दर्शन करके गंगा में स्नान करने से पापों से मुक्ति मिलती हैं।

काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़े ऐतिहासिक तथ्य 

  • इस मंदिर को मुस्लिम शासकों ने अनेकों बार तोड़ा है जिनमें से आखिरी औरंगज़ेब था, पर शिव भगवान की कृपा से यह हर बार और भव्य बनकर सामने आया हैं।
  • इस मंदिर में एक मुहर है जो 9–10 शताब्दी ईशा पूर्व राजघाट की खुदाई के दौरान मिली थी। 
  • Boom of Xuanzang में भी इस मंदिर का उल्लेख मिलता हैं जो इतिहास के अनुसार 635 ईस्वी में बनारस आए थे। 

क्या आप जानते हो काशी विश्वनाथ मंदिर की क्या खासियत है? 

भक्तगण यह तो जानते ही हैं कि यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है पर क्या आप जानते यहां पर पूजे जाने वाले आराध्य भगवान विश्वनाथ को काशी के राजा की उपाधी दी गई हैं। 

किनके दर्शन के बिना काशी विश्वनाथ मंदिर में बाबा के दर्शन अधूरे माने जाते हैं?

काल भैरव के दर्शन को यहां अत्यधिक महत्व दिया गया है और माना जाता है कि बाबा विश्वनाथ के दर्शन के पहले काल भैरव जी दर्शन करने चाहिए तभी बाबा प्रसन्न होते हैं। कहा जाता है कि उनके दर्शन के बिना बाबा के दर्शन अधूरे है। उन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता हैं। ऐसे में उनकी आज्ञा से ही काशी में प्रवेश कर सकते है इसीलिए उनके दर्शन करना ना भूले। 

काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन का समय:

यह मंदिर यूं तो रात को 3 बजे ही खुल जाता हैं पर भक्तों के लिए यह सुबह 4 बजे मंगला आरती के बाद ही खुलता हैं। 

काशी विश्वनाथ के ज्योतिर्लिंग की कथा

  • अगर आपने शिव पुराण पढ़ी होगी तो इस कहानी के बारे में आप ज़रूर जानते होंगें।
  • कहते हैं रूठना ओर मनाने से त्रिदेव भी नहीं बचे। ऐसे में एक त्रिदेवों में से दो देव अर्थात विष्णुजी और ब्रह्माजी का झगड़ा हो गया। 
  • दोनों लड़ रहे थे कि सब में वो ही श्रेष्ठ हैं। ऐसे में शिवजी प्रकाश के रूप में वहां प्रकट हुए। उन्होंने दोनों देवों से उस ज्योति के आदि ओर अंत को खोजने को कहा। 
  • विष्णु जी ने तो तुरंत हार मान ली पर ब्रह्माजी ने जीतने की होड़ में झूठ बोल दिया। जिसे सुनकर शिवजी को बहुत गुस्सा आया। 
  • इस गुस्से के एक अंश से काल भैरव ने जन्म लिया।
  • काल भैरव ने ब्रह्मा जी के 5 सिरों को काट दिया और उन्हें श्राप दिया कि अन्य देवताओं की भांति उनकी पूजा नहीं की जाएगी। 
  • भगवान विष्णु को उन्होंने आशीर्वाद दिया कि उनकी कीर्ति और भी फैलेगी और समस्त संसार उनकी हमेशा पूजा करेंगे। 
  • ब्रह्महत्या के पाप से यह सिर उनके हाथों से चिपक गए और मुक्ति के लिए वो तीनों लोक भटकने लगे।
  • माना जाता हैं वह जैसे ही काशी पहुंचे उनके हाथ से ब्रह्मा जी का सिर अलग हो गया ओर आखिरकार उन्हें उस पाप से मुक्ति मिलीं।
  • काल भैरव को वही रहकर अखंड तपस्या करने का शिवजी ने आदेश दिया ओर साथ ही साथ उन्हें काशी के कोतवाल की उपाधि दी। 
  • उसके बाद वह भी ज्योतिर्लिंग के रूप में वही बस गए। 

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग और शिव पार्वती कथा

पुराणों की माने तो इस ज्योतिर्लिंग से भगवान शिव और माता पार्वती की प्रेम गाथा छिपी हैं। 

  • कहते हैं मां पार्वती हिमालय में रहकर नाखुश थी ओर उन्होंने भगवान शिव के सामने भी यह बात कही और कही और चलकर रहने का आग्रह किया। 
  • इसी कारण भगवान शिव काशी आकर विश्वनाथ स्वरूप में ज्योतिर्लिंग में समा गए। 

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग और राजा देवदास और काल भैरव से जुड़ी कथा

  • एक अन्य कथा के अनुसार शिवजी रह तो मंदाचल पर्वत पर रहे थे पर काशी का भी वो परित्याग नहीं करना चाहते थे। 
  • ऐसे में एक शिवगण जिनका नाम निकुंभ था उसने काशी से मनुष्यों को पूरी तरह से हटा दिया।
  • इस स्थिति ने राजा देवदास को अत्यंत ही दुखी किया और वो ब्राह्माजी की पूजा करने लगें।
  • शिवजी ने यह जानकर काशी को अपना घर बना लिया और खुद ज्योतिर्लिंग के रूप में यहां रहने लगे। 

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में आरती का समय

  • मंगला आरती का समय सुबह 3 से सुबह 4 बजे तक का होता है।
  • भोग आरती सुबह 11: 15 से लेकर दोपहर 12:20 तक होता है। 
  • सप्तऋषि आरती शाम 7 बजे से लेकर शाम 8:15 तक होती है। 
  • श्रृंगार आरती का समय रात 9 बजे से रात 10:15 तक का हैं। 

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में जाते वक्त रखे इन बातों का खास ध्यान 

  • मंदिर में मोबाइल फोन ले जाने की अनुमति नहीं है, ऐसे में मोबाइल फोन लॉकर में रख कर आए।
  • प्रसाद में काफी जगह आपको रुद्राक्ष मिल सकते है, उसे आप अपने मंदिर में भी रख सकते हैं या पहन भी सकते हैं। 
  • वहां पर आप शिवजी की पूजा दूध, गंगाजल, घी, दही, धतूरे का फूल, फल, आंक माला, अन्य फल और फूल से कर सकते हैं। 
  • यह आने हेतु सभ्य वेशभूषा ही पहन कर आए। 

शिव नाम रटत, रटत, पहुंचे जो काशी,
कष्ट मिटे
, पीड़ा मिटे, मिले यहां विश्वनाथ अविनाशी।

भगवान शिव के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंग

नाम ज्योतिर्लिंग
प्रथम सोमनाथ ज्योतिर्लिंग
द्वितीय मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग
तृतीय महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग
चतुर्थ ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग
पंचम केदारनाथ ज्योतिर्लिंग
षष्ठ भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग
सप्तम काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग
अष्टम त्रयंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग
नवम बैद्यनाथधाम ज्योतिर्लिंग
दशम नागेश्वर ज्योतिर्लिंग
एकादश रामेश्वर ज्योतिर्लिंग
द्वादश घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग