त्रिशूर पूरम - त्योहार जिसमें हाथी सोने से ओर आकाश आतिशबाजी से आज
केरल केवल अपनी भौतिक सुंदरता और आयुरवैदिक कला के अलावा त्रिशूर पूरम उत्सव के लिए भी जाना जाता है। यह केरल का सबसे भव्य मंदिर उत्सव है जो इस प्रान्त में पूरमों की मां के नाम से भी जाना जाता है। भौचक्के रह गए न यह सुनकर की आखिर यह है क्या!
Published on: 12 May 2026 at 3:32 pm / Updated on: 24 May 2026 at 11:09 pm

त्रिशूर पूरम कब और कहां मनाया जाता हैं?
त्रिशूर पूरम अंग्रेजी के अप्रैल या मई महीने में मनाया जाता है। इन महीनों में से जो महीना मलयालम महीने मेडम में पड़ता है उसमें यह उत्सव मनाया जाता है।
यह त्रिशूर में स्थित वड़क्कुनाथन मंदिर में मनाया जाता है। यहां पर सबसे बड़ा आकर्षण होता है सजे धजे हुए 50 हाथी, शानदार आतिशबाजी, और वहां की पारंपरिक नीलम संगीत।
त्रिशूर पूरम उत्सव के बारे में आप क्या जानते हो?
- यह उत्सव पूराम नक्षत्र को वड़क्कुनाथन मंदिर में मनाया जाता है।
- इस उत्सव को मनाने की शुरुआत ढाई सौ साल पहले हुई थी। माना जाता है कि लगभग 1790 से 1805 के बीच राजाराम वर्मा जो की कोचिंग के शासक थे उन्होंने इस उत्सव को मनाना शुरू किया था। राजाराम वर्मा को शक्तिन थंपुरन भी कहा जाता है।
त्रिशूर पूरम उत्सव के मुख्य आकर्षण क्या-क्या है?
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जैसे कि पहले भी बताया गया है इस दिन 50 हाथियों को सजा धजाकर वडक्कुनाथन मंदिर में सवारी निकाली जाती हैं।
- इस दिन एक प्रतियोगिता भी रखी जाती है जिसके अंतर्गत मंदिर के बीच रंग बिरंगी छतरियां बदली जाती हैं। इस प्रतियोगिता को कुडमाट्टम कहते हैं। यह प्रतियोगिता परमेक्कावु और थिरूवमबाडी मंदिरों में होती है।
- मंदिर के परिसर में इस दिन पारंपरिक वादक बजाकर संगीत कार्यक्रम किया जाता है जिससे इलांजीथारा मेलम कहते हैं।
- इस दिन शानदार आतिशबाजी की जाती है जो कि विश्व प्रसिद्ध है। इसे वेदिकेट्टू कहा जाता है।
- माना जाता है कि इस उत्सव में परमेक्कावु और थिरूवमबाडी मंदिर से उनके देवता भाग लेने आते हैं
- दक्षिण भारत में इस त्यौहार को बहुत धूमधाम से मनाया जाता है और इसका संस्कृत महत्व भी है। इसी कारण इस उत्सव में भाग लेने के लिए देश विदेश से लोग आते हैं।
इस त्यौहार के आरंभ होने के पहले किन चीजों का ध्यान रखा जाता है?
- त्रिशूर निगम को बहुत वक्त पहले से ही यह निर्देश दे दिया जाता है की त्रिशूल के पूरे थेक्किंकडु मैदान में किसी भी तरह का प्लास्टिक का उपयोग न किया जाए और इस पूरे क्षेत्र को प्लास्टिक मुक्त रखा जाए।
- साथ ही साथ इस क्षेत्र में किसी भी तरह के संगीत कार्यक्रम के होने की अनुमति इस दौरान नहीं दी जाती है।
- कृष्णापुरम के दौरान यहां पर लोगों की भीड़ आती हैऔर प्रदूषण होने का खतरा बहुत ही ज्यादा होता है।
- काफी लोग के नहीं जानते कि इस त्यौहार को पूरमों जननी के रूप में मनाया जाता है।
- आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप में इस त्यौहार का केरल में एक बहुत बड़ा स्थान है।
- कहानियों की माने तो यह केरल के सर्वाधिक पुराने मंदिर त्योहारों में से एक माना जाता है।
- काफी वर्षों पूर्व इस उत्सव की शुरुआत राजाराम वर्मा ने 10 मंदिरों में की थी जो की इस प्रकार हैं- लालूर, परमेक्कवु, करमुक्कू, थिरुवंबदी कनिमंगलम, नेथिलाकावु, चूराकोट्टुकरा, पनामुक्कमपल्ली, चेम्बुकावु, और अय्यनथोले।
त्रिशूर पूरम किस तरह मनाया जाता है?
- त्योहार के 7 दिन पूर्व ध्वजारोहण समारोह किया जाता है जिसे कोडियेट्टम कहा जाता हैं।
- इस दिन हाथियों को सुनहरे हेडड्रेस, घंटियों, गहने और कोलम से सजाया जाता है।
- यहां एक विलांबरम नामक प्रथा के अनुसार नीथिलाक्कविलम्मा जी की मूर्ति, गहनों से सजे हाथी के ऊपर विराजमान की जाती है। यह हाथी वडक्कुनाथन अर्थात शिवजी के मंदिर जाकर दक्षिणी द्वार को धक्का देकर खोलता है।
- उत्सव के दौरान दो दिन तक आतिशबाजी की जाती है। इस त्यौहार का मुख्य उत्सव कनीमंगलम सस्थवु एज़ुनेलिप्पु सुबह के वक्त शुरू होता हैं।
- इस त्यौहार के दौरान एडक्का, थिमिला, चेंडा, मद्दलम, कॉम्बू, जैसे संगीत वाद्ययंत्र के साथ यह त्यौहार मनाया जाता। संगीत इस उत्सव का मुख्य भाग है।
- 250 कलाकार इस वाद्यवृंद में भाग लेते हैं और चेण्डा कलाकार इस उत्सव का नेतृत्व करते हैं।
- उत्सव का खात्मा आतिशबाजी के साथ होता है।
त्रिशूर पूरम केरल के किस क्षेत्र में मनाया जाता है?
त्रिशूर पूरम तृश्शूर जिले में स्थित तेक्किनकाडु मैदान में मनाया जाता है।
त्रिशूर पूरम को मनाने के लिए कैसे पहुंचे?
रेलवे से जाने केइए आपको तृश्शूर स्टेशन तक जाना होगा। वहां से मुख्यमंदिर 1 किलोमीटरकी दूरी पर है।
कोच्चिनइंटरनेशनल एयरपोर्ट तृश्शूर से 58 किलोमीटर की दूरी पर है।
भारत के हर प्रांत में त्योहारों की बौछार है और हर त्यौहार अपने में अनुपम है। केरल में इस अनोखे रंग बिरंगे, संगीतमय और आतिशबाजी से भरपूर त्यौहार के साक्षी जरूर बने।