
कथा वाचक एवं आध्यात्मिक आयुक्त
प्रेमानंद जी महाराज
गुरु:स्वामी रामभद्राचार्य के शिष्य
धर्म:हिन्दू धर्म
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परिचय
श्री प्रेमानंद जी महाराज एक प्रसिद्ध भारतीय आध्यात्मिक गुरु, संत और भक्तिमार्ग के उच्च कोटि के प्रवक्ता हैं। वे राधावल्लभ संप्रदाय से जुड़े रसिक संत हैं और राधा-कृष्ण प्रेम-भक्ति, नाम-स्मरण, ब्रह्मचर्य और सेवा को जीवन का मूल आधार मानते हैं। उनकी साधना, शिक्षाएँ और जीवन-शैली आज के समय में भक्ति मार्ग का एक सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।
माता-पिता एवं प्रारंभिक संस्कार
श्री प्रेमानंद जी महाराज का जन्म एक संस्कारवान परिवार में माता श्रीमती रमा देवी और पिता श्री शंभू पांडे के घर हुआ। बाल्यकाल से ही उन्हें धार्मिक वातावरण, सादगी और नैतिक मूल्यों के संस्कार प्राप्त हुए। बचपन से उनका झुकाव ईश्वर-भक्ति, साधना और आत्मिक चिंतन की ओर था।
संन्यास ग्रहण
केवल 13 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने सांसारिक जीवन का परित्याग कर संन्यास मार्ग को अपनाया। यह निर्णय उनके भीतर विद्यमान गहरी वैराग्य भावना और ईश्वर-प्राप्ति की तीव्र आकांक्षा का परिचायक था। संन्यास पथ पर उन्हें प्रारंभ में आनंदस्वरूप ब्रह्मचारी नाम प्राप्त हुआ तथा आगे चलकर महावाक्य और संन्यासी जीवन स्वीकार करने के बाद वे स्वामी आनंदाश्रम कहलाए।
साधना एवं तपस्वी जीवन
श्री प्रेमानंद जी महाराज ने अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण काल वाराणसी में गंगा तट पर कठोर साधना में व्यतीत किया। वे लंबे समय तक एक पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यान, मौन और आत्मचिंतन में लीन रहे। इसी अवधि में संत पंडित स्वामी श्री राम शर्मा जी के सान्निध्य ने उनके आध्यात्मिक मार्ग को और अधिक दृढ़ किया।
गुरु परंपरा एवं दीक्षा
उन्हें राधावल्लभ संप्रदाय के एक गोस्वामी द्वारा “शरणागति मंत्र” के माध्यम से दीक्षित किया गया। इसके पश्चात वे अपने परम गुरु श्री हित गौरांगी शरण जी महाराज (बड़े गुरुजी) के सान्निध्य में पहुँचे।
गुरुजी से उन्हें “निज मंत्र” की दीक्षा प्राप्त हुई, जो सहचरी भाव और नित्य विहार रस पर आधारित है। इसी के साथ वे रसिक संत परंपरा के आधिकारिक साधक बने।
वृंदावन से विशेष आत्मिक संबंध
श्री प्रेमानंद जी महाराज का वृंदावन से अत्यंत गहरा आत्मिक संबंध है। वे वृंदावन को केवल निवास स्थान नहीं, बल्कि राधा-कृष्ण की लीलाभूमि और साधना की पूर्ण स्थली मानते हैं। उनका विश्वास है कि वृंदावन में किया गया नाम-स्मरण और भक्ति साधना साधक के जीवन को शीघ्र आध्यात्मिक दिशा प्रदान करती है।
श्री हित राधा केली कुंज ट्रस्ट
वर्ष 2016 में स्थापित श्री हित राधा केली कुंज ट्रस्ट, वृंदावन एक गैर-लाभकारी संस्था है। ट्रस्ट का उद्देश्य भक्ति के साथ-साथ सेवा के माध्यम से समाज का उत्थान करना है।
ट्रस्ट द्वारा प्रमुख सेवाएँ
तीर्थयात्रियों हेतु आवास
निःशुल्क भोजन व्यवस्था
वस्त्र एवं आवश्यक सामग्री
चिकित्सा सहायता
साधु एवं निर्धन सेवा
शिक्षाएँ एवं दर्शन
श्री प्रेमानंद जी महाराज की शिक्षाओं के प्रमुख आधार हैं:
हरिनाम जप और राधा-कृष्ण प्रेम-भक्ति
आडंबर से दूर, अंतःशुद्धि पर बल
गुरु-निष्ठा को आध्यात्मिक जीवन की रीढ़ मानना
अहंकार, ईर्ष्या और दिखावे से दूर रहना
ब्रह्मचर्य और संयम को आध्यात्मिक शक्ति मानना
उनका स्पष्ट संदेश है:
“ईश्वर को पाने का सबसे सरल और शुद्ध मार्ग प्रेम है, न कि केवल कर्मकांड।”
ब्रह्मचर्य एवं संयम का व्यावहारिक दृष्टिकोण
वे ब्रह्मचर्य को केवल संन्यासियों तक सीमित नहीं मानते। उनके अनुसार गृहस्थ जीवन में भी
इंद्रिय संयम
विचारों की पवित्रता
अनुशासित दिनचर्या
आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत आवश्यक है।
मौन, एकांत और सादगी
श्री प्रेमानंद जी महाराज का जीवन अत्यंत सादा, मौनप्रिय और एकांत साधनामय रहा है। वे मंचीय दिखावे, अनावश्यक प्रसिद्धि, विवादों और राजनीति से सदैव दूर रहते हैं।
युवाओं के लिए संदेश
युवाओं को वे विशेष रूप से प्रेरित करते हैं कि:
जीवन को लक्ष्यहीन न बनाएं
नशा, भोग और मोबाइल-आसक्ति से बचें
कम उम्र से नाम-स्मरण और सदाचार अपनाएँ
ऊर्जा को साधना और सेवा में लगाएँ
नोट: सभी Live वीडियो संबंधित कथा वाचकों के आधिकारिक YouTube चैनलों से एम्बेड किए जाते हैं।
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