वृन्दावन वास चाहिए - Vrindavan Vaas Chahiye
परिचय
यह अत्यंत मधुर एवं रसपूर्ण भजन श्रीधाम वृंदावन की महिमा, श्रीराधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम तथा ब्रजवास की उत्कट अभिलाषा का भावपूर्ण वर्णन करता है। भजन में भक्त अपने जीवन की सबसे बड़ी कामना के रूप में वृंदावन धाम में निवास प्राप्त करने की प्रार्थना करता है। यमुना महारानी के पावन तट, निधिवन की दिव्यता, रसिक संतों की संगति तथा श्रीराधा रानी की असीम कृपा का सुंदर चित्रण इस रचना में किया गया है। भक्त मानता है कि संसार के समस्त सुखों से बढ़कर वृंदावन की धूल, वहाँ का वातावरण और भगवान के नाम का निरंतर स्मरण है। इस भजन में केवल धामवास की इच्छा ही नहीं, बल्कि ऐसा जीवन जीने की प्रार्थना भी है जिसमें मन, वचन और कर्म पूर्णतः श्रीराधा-कृष्ण की भक्ति में समर्पित हो जाएँ। भजन का प्रत्येक शब्द ब्रज प्रेम, वैराग्य, शरणागति और दिव्य रस की अनुभूति कराता है।
भावार्थ
इस भजन का मूल संदेश यह है कि श्रीवृंदावन धाम केवल एक स्थान नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराधा रानी की दिव्य लीलाओं का शाश्वत धाम है, जहाँ पहुँचकर जीव को आध्यात्मिक शांति, प्रेम और परम आनंद की प्राप्ति होती है। भक्त प्रार्थना करता है कि उसे संसार की क्षणभंगुर इच्छाओं के स्थान पर वृंदावन में रहने का सौभाग्य प्राप्त हो, क्योंकि वहीं सच्चे संतों और रसिक भक्तों का संग मिलता है, जिनकी कृपा से भक्ति का विकास होता है और भगवान के प्रति प्रेम बढ़ता है।
भजन में यह भावना भी व्यक्त की गई है कि जीवन की हर परिस्थिति में भक्त प्रभु की इच्छा को स्वीकार करने के लिए तैयार है, बस उसे वृंदावन और भगवान का स्मरण कभी न छूटे। वह श्यामा-कुंजबिहारी से धामवास की भिक्षा माँगता है और चाहता है कि उसका प्रत्येक श्वास वृंदावन की पावन भूमि में ही निकले। अंत में भक्त की सर्वोच्च इच्छा यह प्रकट होती है कि मृत्यु के समय भी उसके मन में केवल श्रीराधा-कृष्ण, उनके प्रिय धाम, गुरुदेव और ब्रज की लीलाओं का स्मरण रहे। यह भजन सिखाता है कि भगवान की भक्ति, संतों का संग और धाम का प्रेम ही मानव जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि और वास्तविक संपदा है।