षटतिला एकादशी 2026: ये काम करने से बरसेगी भगवान विष्णु की कृपा

2026 में माघ कृष्ण पक्ष में आने वाली पहली एकादशी इतनी महत्वपूर्ण क्यों है और वह कौन-सी एकादशी है? आइए जानते हैं इस एकादशी का महत्व, पूजा की विधि-विधान तथा इसे करने से प्राप्त होने वाले फल के बारे में

आने वाली 14 जनवरी को षटतिला एकादशी है। इस दिन मकर संक्रांति का भी शुभ संयोग बन रहा है, जिसके कारण इस वर्ष की षटतिला एकादशी अत्यंत विशेष मानी जा रही है। इस दिन श्रीहरि की पूजा, विष्णु सहस्रनाम का पाठ तथा तिल के छह प्रकार के उपयोग का विधान है। ऐसा करने से घर में सुख-समृद्धि, धन-वैभव की प्राप्ति होती है और श्रीहरि की विशेष कृपा बनी रहती है।

By: RevivingCultures
Published on: 10 January 2026 at 1:07 pm / Updated on: 24 May 2026 at 11:09 pm
षटतिला एकादशी 2026: ये काम करने से बरसेगी भगवान विष्णु की कृपा

षटतिला एकादशी का महत्व

षटतिला एकादशी माघ कृष्ण पक्ष में आने वाली एक अत्यंत महत्वपूर्ण एकादशी है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा में तिल का विशेष महत्व होता है। एकादशी के दिन तिल का छह प्रकार से उपयोग किया जाता है, इसी कारण इसे षटतिला एकादशी कहा जाता है।

इस पावन दिन तिल का दान करने से पापों से मुक्ति मिलती है, दरिद्रता का नाश होता है तथा सुख-समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है। षटतिला एकादशी का व्रत रखने, तिल का दान करने और जरूरतमंदों की सहायता करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं। यह व्रत हमें सेवा, दान और धर्म के मार्ग पर चलने का संदेश देता है।

तिल के छह प्रकार का उपयोग

  • तिल का दान
  • तिल से स्नान
  • तिल का उबटन
  • तिल से पूजा
  • तिल से बना भोजन
  • तिल मिश्रित पीने का जल

तिथि की शुरुआत :
13 जनवरी 2026, 03:17 P.M.

तिथि की समाप्त :
14 जनवरी 2026, 05:52 P.M.

पारण: समय: 07:15 से 10:45

 

षटतिला एकादशी व्रत कथा

एक बार नारद मुनि तीनो लोकों का भ्रमण करते हुए भगवान विष्णु के वैकुण्ठ धाम पहुंचे । वहां पहुंच कर उन्होंने भगवन विष्णु को प्रणाम कर उनसे अपनी जिज्ञासा व्यक्त करते हुए प्रश्न किया कि प्रभु षट्तिला एकादशी की क्या कथा है और इस एकादशी को करने से क्या फल प्राप्त होता है

देवर्षि नारद द्वारा विनित भाव से इस प्रकार प्रश्न किये जाने पर भगवान विष्णु ने कहा प्राचीन काल में पृथ्वी पर एक ब्राह्मणी रहती थी। वह ब्राह्मणी मुझमें बहुत ही श्रद्धा एवं भक्ति रखती थी। वह ब्राह्मणी मेरे सभी व्रतों का पालन नियम पूर्वक किया करती थी । एक बार ब्राह्मणी ने एक महीने तक व्रत रखकर मेरी आराधना की। व्रत के प्रभाव से ब्राह्मणी का शरीर तो शुद्ध हो गया परंतु वह ब्राह्मणी कभी किसी भी ब्राह्मण एवं देवताओं के निमित्त अन्न दान नहीं करती थी अत: एक बार मैंने सोचा कि यह ब्राह्मणी बैकुण्ड में रहकर भी अतृप्त रहेगी अत: मैं स्वयं एक दिन भिक्षा लेने उसकी कुटिया पहुंच गया।

ब्राह्मणी से जब मैंने भिक्षा की याचना की तब उसने एक मिट्टी का पिण्ड उठाकर मेरी झोली में डाल दिया। मैं वह पिण्ड लेकर अपने धाम लौट आया। कुछ दिनों के बाद वह ब्राह्मणी भी देह त्याग कर मेरे लोक में आ गयी। यहां उसे एक कुटिया और आम का पेड़ मिला। खाली कुटिया को देखकर वह ब्राह्मणी घबराकर मेरे पास आई और बोली की मैं तो धर्मपरायण हूं फिर मुझे खाली कुटिया क्यों मिली है। तब मैंने उसे बताया कि यह अन्नदान नहीं करने तथा मुझे मिट्टी का पिण्ड देने से हुआ है।

मैंने फिर उस ब्राह्मणी को बताया कि जब देव कन्याएं आपसे मिलने आएं तब आप अपना द्वार तभी खोलना जब वे आपको षट्तिला एकादशी के व्रत का विधान बताएं। ब्राह्मणी ने ऐसा ही किया और जिन विधियों को देवकन्या ने कहा था उस विधि से ब्राह्मणी ने षट्तिला एकादशी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उसकी कुटिया अन्न धन से भर गयी। इसलिए हे नारद इस बात को सत्य मानों कि जो व्यक्ति इस षट्तिला एकादशी का व्रत करता है और तिल एवं अन्न दान करता है उसे मुक्ति और वैभव की प्राप्ति होती है।