वरुथिनी एकादशी 2026 व्रत: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि एवं कथा

हमारे सनातन धर्म में एकादशी व्रत रखने का विशेष महत्व है। यह सभी व्रतों में सबसे बड़ा और उत्तम व्रत माना गया है और हर वर्ष आने वाली   सभी 24 एकादशियों का अलग अलग महत्व है तो आइये जानते है इस वर्ष आने वाली वरुथिनी एकादशी के बारे में जो की वैशाख माह के कृष्ण पक्ष में आती है। वरुथिनी एकादशी सौभाग्य और पुण्य देने वाली तिथि है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत को करने से कठोर तपस्या का फल और कन्यादान के सामान पुण्य मिलता है। आगे जानते हैं यह व्रत इस वर्ष किस तिथि में रखा जायेगा। 

By: RevivingCultures
Published on: 9 April 2026 at 11:55 am / Updated on: 24 May 2026 at 11:09 pm
वरुथिनी  एकादशी 2026 व्रत: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि एवं कथा

वरुथिनी एकादशी का विशेष महत्व, पूजा विधि विधान, मंत्र, भोग और पारण का समय एवं कथा !

• वरुथिनी एकादशी का व्रत रखने से सभी पापों और संतापों से मुक्ति के मार्ग खुल जाते हैं और व्रती को मानसिक शांति प्रदान करती है।
• मान्यतओं की माने तो इस व्रत से व्रती को 100000 वर्षों की तपस्या क बराबर फल मिलता है।
• सौभाग्य में वृद्धि होती है और जीवन क कष्टों का निवारण हो जाता है।
• इस दिन भगवान के मधुसूदन स्वरुप की आराधना करने से घर में आर्थिक तंगी से छुटकारा मिलता है।
• इस दिन दान का विशेष महत्व है इस दिन तिल, अन्न, भूमि और विद्या का दान करने से उसका कई गुना पुण्य मिलता है।
• यह व्रत मोक्ष प्राप्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना गया है, जिससे व्यक्ति को बैकुंठ और भगवान् की सेवा की प्राप्ति होती है।
• यह व्रत करने से सेहत में सुधार होता है और शारीरिक-मानसिक कष्टों से राहत मिलती है।

वरुथिनी एकादशी 2026 की तिथि, शुभ मुहूर्त और पारण का समय

हिन्दू पंचांग के अनुसार वरुथिनी एकादशी व्रत की :
तिथि प्रारंभ : 13 अप्रैल 2026, 01:16 AM
एकादशी तिथि समाप्त : 14 अप्रैल 2026, 01:08 AM
व्रत पारण का समय : 14 अप्रैल - 06:54 AM से 10:13 AM

मंत्र

व्रत रखने वाले पुरुष या स्त्री को "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय " का जाप करना चाहिए और तुलसी दल लेकर विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ अवश्य करना चाहिए। 

भोग 

वरुथिनी एकादशी पर खरबूजे का भोग लगाने की विशेष परंपरा है और साथ ही साथ पंचामृत और कोई भी सात्विक मिठाई का भोग जरूर लगाएं और विशेष ध्यान रखें की उसमे तुलसी दल जरूर हो अन्यथा भगवान आपका भोग स्वीकार नहीं करेंगे क्यूंकि भगवान को तुलसी अत्यंत प्रिये हैं।  

व्रत कथा

वरुथिनी एकादशी की पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक पराक्रमी और धर्मात्मा राजा थे जिनका नाम मांधाता था। वो बहुत ही न्यायप्रिय और प्रजा के हित में कार्य करने  वाले राजा थे। वह बहुत पराक्रमी और दानवीर थे। 
एक दिन राजा मांधाता जंगल में तपस्या में लीन थे । तभी वहां अचानक से एक जंगली भालू आ गया उसने उन पर हमला कर दिया और उनका पैर चबाने लगा । राजा ने बहुत प्रयास किया, लेकिन वे उस भालू से खुद को बचा नहीं सके और उनका एक पैर बुरी तरह घायल हो गया। वह भालू उन्हें घसीटकर जंगल की तरफ ले गया राजा बहुत ही घबरा गए किन्तु तापस धर्म के अनुकूल उन्होंने हिंसा न करके भगवान् विष्णु का स्मरण किया और बहुत ही करूण भाव से  प्रार्थना की। 
भगवान विष्णु ने उनकी प्रार्थना सुनी और उन्होंने प्रकट होकर भालू के प्राण हर लिए और राजा की जान बचाई किन्तु राजा बहुत ही दुखी था क्यूंकि राजा का पैर भालू पहले ही खा चुका था, राजा को दुखी देखकर भगवान् विष्णु ने उन्हें मथुरा जाकर मेरे अवतार वराह की पूजा करो और  वरुथिनी एकादशी व्रत का पालन करो । वरुथिनी एकादशी का व्रत करने से तुम्हारे पूर्व जन्म के पाप नष्ट होंगे और तुम वापस से सुन्दर और सुदृढ़ अंगों वाले हो जाओगे और जिस भालू ने तुम्हें जो काटा है, यह तुम्हारे पूर्व जन्म का अपराध था।
भगवान की आज्ञा मानकर राजा मान्धाता ने मथुरा जाकर श्रद्धापूर्वक वरूथिनी एकादशी व्रत का पालन किया। जिसके प्रभाव से राजा शीघ्र ही पुन: सुंदर और संपूर्ण अंगों वाला हो गया। इसी एकादशी के प्रभाव से राजा मान्धाता स्वर्ग गया था। 
पुराणों के अनुसार वरूथिनी एकादशी के व्रत से अन्न दान, कन्या दान और  दस हजार वर्ष तक तप करने के बराबर फल प्राप्त होता है। इस व्रत के महात्म्य को पढ़ने से एक हजार गौ दान का फल मिलता है। इस तरह जो भी व्यक्ति पीड़ित है उसे वरूथिनी एकादशी का व्रत रखकर भगवान विष्णु का स्मरण करके इस एकादशी व्रत कथा का श्रवण अवश्य ही करना चाहिए। 

वरुथिनी एकादशी व्रत कथा समाप्त हुई बोलो - 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे 
हरे राम हरे रांम राम राम हरे हरे