पापमोचनी एकादशी 2026 व्रत: तिथि,महात्म्य ,शुभ मुहूर्त, पूजा विधि एवं कथा

चैत्र कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को पापमोचनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। यह भगवान विष्णु को समर्पित एक अत्यंत शुभ व्रत है। यह  सभी पापों का नाश करने वाली मानी जाती है। आइये जानते हैं इस एकादशी का महत्व, पारण समय और व्रत की विधि और कथा।

By: RevivingCultures
Published on: 10 March 2026 at 2:00 pm / Updated on: 24 May 2026 at 11:09 pm
पापमोचनी एकादशी 2026 व्रत: तिथि,महात्म्य ,शुभ मुहूर्त, पूजा विधि एवं कथा

पापमोचनी एकादशी: व्रत कथा, महत्व, पूजा विधि एवं  पारण समय !

पापमोचनी एकादशी की व्रत कथा भगवान विष्णु को समर्पित है | इस बार पापमोचनी एकादशी 2026 में 15 मार्च, रविवार को मनाई जाएगी, जो चैत्र कृष्ण पक्ष में पड़ती है और यह हिंदू कैलेंडर वर्ष की अंतिम एकादशी होती है | यह एकादशी सभी पापों का नाश करने वाली मानी जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस कथा के श्रवण मात्र से 1000 गौदान के समान फल प्राप्त होता है। 
हिंदू धर्म में यह पापों से क्षमा मांगने के लिए एक महत्वपूर्ण उपवास का दिन है,  जो भक्तों को पिछले पापों और मानसिक कष्टों से मुक्ति दिलाने वाली मानी जाती है।

पापमोचनी एकादशी 2026  तिथि और पारण समय

  • एकादशी तिथि प्रारंभ: रविवार, 15 मार्च 2026 
  • पारण का समय: सोमवार, 16 मार्च 2026, सुबह 06:30 बजे से 09:40 बजे तक 
  • द्वादशी समाप्ति क्षण: 16 मार्च 2026 को सुबह 09:40 बजे

पापमोचनी एकादशी का महत्व

यह एकादशी ब्रह्म हत्या, स्वर्ण चोरी और गुरु-पत्नी गमन जैसे महापापों से भी मुक्ति दिलाने में सहायक मानी जाती है। जो भक्त इस दिन पूर्ण श्रद्धा से व्रत रखते हैं, वे जीवन के सभी कष्टों से मुक्त होकर अंत में बैकुंठ धाम प्राप्त करते हैं।  यह व्रत आरोग्य और संतान प्राप्ति के लिए भी लाभकारी माना जाता है। 

पूजा विधि और नियम

  • ⁠  ⁠भगवान विष्णु (विशेष रूप से उनके चतुर्भुज रूप) को पीले फूल, फल और तुलसी के पत्ते अर्पित करके उनकी पूजा करें।
  • ⁠  ⁠भक्त कठिन निर्जला व्रत या फलाहार व्रत रख सकते हैं | इस दिन चावल खाना वर्जित माना जाता है।
  • ⁠  ⁠विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना और रात्रि में जागरण करना अत्यधिक फलदायी माना जाता है।

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा

प्राचीन काल में चैत्ररथ नामक एक सुंदर वन था, जहाँ च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी ऋषि कठिन तपस्या कर रहे थे। मेधावी ऋषि की तपस्या से घबराकर इंद्रदेव ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए मंजुघोषा नामक अप्सरा को भेजा। अप्सरा के रूप और गायन से मोहित होकर ऋषि अपनी तपस्या भूल गए और उनके साथ कई वर्षों तक काम-क्रीड़ा में लीन रहे। वर्षों बाद जब मेधावी ऋषि को अपनी भूल का आभास हुआ और उन्हें अपनी तपस्या के नष्ट होने का दुःख हुआ, तो उन्होंने क्रोधित होकर मंजुघोषा को पिशाचिनी बनने का श्राप दे दिया।
मंजुघोषा द्वारा क्षमा याचना करने पर ऋषि ने उसे श्राप मुक्ति का उपाय बताया। उन्होंने कहा कि चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी का व्रत करने से वह पुनः अपने दिव्य रूप को प्राप्त कर सकेगी। मेधावी ऋषि स्वयं भी अपने पिता च्यवन ऋषि के पास गए और अपनी भूल बताई। च्यवन ऋषि ने उन्हें भी अपने पापों के प्रायश्चित के लिए इसी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी| दोनों ने विधि-विधान से पापमोचनी एकादशी का व्रत किया, जिसके प्रभाव से मेधावी ऋषि का तप पुनः जागृत हुआ और मंजुघोषा पिशाच योनि से मुक्त होकर स्वर्ग लोक चली गई। 

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा सम्पूर्ण हुई बोलो

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे !