अपरा एकादशी 2026 व्रत: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि एवं कथा

जेष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अपरा एकादशी का हिंदू धर्म में बहुत बड़ा महत्व है। यह व्रत पिछले जन्मों के पापों, निंदा और झूठ जैसे दोषों से मुक्ति दिलाकर अपार पुण्य, यश और समृद्धि प्रदान करता है। इसे 'अचला'  एकादशी भी कहा जाता हैं, और इस दिन भगवान विष्णु के  (त्रिविक्रम रूप) की पूजा  करने से मोक्ष और सुख- समृद्धि और शांति प्राप्त होती है।

By: RevivingCultures
Published on: 9 May 2026 at 4:02 pm / Updated on: 24 May 2026 at 11:09 pm
अपरा एकादशी 2026 व्रत: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि एवं कथा

अपरा एकादशी का विशेष महत्व, पूजा विधि विधान, मंत्र, भोग और पारण का समय एवं कथा !

  • पद्य पुराण के अनुसार, अपरा एकादशी का व्रत करने से ब्रह्मा हत्या, गोत्र हत्या और परनिंदा जैसे बड़े पापों से भी मुक्ति मिलती  है।
  • अपरा का अर्थ होता है 'असीम' मान्यता है कि यह एकादशी अपार पुण्य देने वाली है। इस दिन व्रत करने से गंगा स्नान, अश्वमेध यज्ञ और 
  • इस दिन व्रत रखने से समाज में नाम, यश, सम्मान और परिवार में सुख-समृद्धि मिलती  है।
  • इस व्रत को करने से व्यक्ति कर्मकांडों के बंधन से मुक्त हो कर मोक्ष को प्राप्त होता है।
  • इस दिन भगवान विष्णु के त्रिविक्रम (वामन स्वरूप) की और लक्ष्मी माता की पूजा की जाती है। 

अपरा एकादशी 2026 की तिथि, शुभ मुहूर्त और पारण का समय

हिन्दू पंचांग के अनुसार वरुथिनी एकादशी व्रत की -

  • तिथि प्रारंभ : 12 मई 2026, 02:52 PM।
  • एकादशी तिथि समाप्त : 13 मई 2026, 01:29 PM।
  • व्रत पारण का समय : 14 मई - 05:31 AM से 10:02 AM। 

पूजा विधि 

  • सुबह स्नान आदि से निवृत होकर व्रत का संकल्प लें और भगवान्  विष्णु  की पूजा - अर्चना करें।
  • धूप, दीप, गंध, और पीले पुष्पों से पूजा करें।
  • व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  • अगले दिन द्वादशी पर समय के अनुसार पारण करें अन्यथा यदि अपने समयानुसार व्रत का पारण नहीं किया तो आपका व्रत सम्पूर्ण नहीं माना जायेगा ।

मंत्र

व्रत रखने वाले पुरुष या स्त्री को "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय " का जाप करना चाहिए और तुलसी दल लेकर विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ अवश्य करना चाहिए। इस दिन भगवान् के नाम का जाप अवश्य करें, और रात्रि में शयन ना करके भगवान् का संकीर्तन करना चाहिए। 

भोग 

अपरा एकादशी पर भगवान को आम के हलवे का भोग विशेषकर लगाएं और साथ ही साथ पंचामृत एवं पीले फलों (आम, केला या पपीता) का और कोई भी सात्विक मिठाई पीले रंग में हो उसका भोग जरूर लगाएं और विशेष ध्यान रखें की उसमे तुलसी दल अवश्य हो अन्यथा भगवान आपका भोग स्वीकार नहीं करेंगे क्यूंकि भगवान विष्णु को तुलसी अत्यंत प्रिये हैं।  

व्रत कथा

अपरा एकादशी व्रत कथा : युधिष्ठिर ने पूछा- जनार्दन ! ज्येष्ठ माह के कृष्णपक्ष में कौन सी एकादशी आती है ? मैं उसका माहात्म्य सुनना चाहता हूं। उसे बताने की कृपा कीजिये ।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले- हे राजन् ! तुमने सम्पूर्ण लोकों के हित के लिये बहुत उत्तम बात पूछी है। हे राजन ! इस एकादशी का नाम 'अपरा' है। यह बहुत पुण्य प्रदान करने वाली और बड़े-बड़े पापों का नाश करनेवाली है। ब्रह्महत्या से दबा हुआ, गोत्रकी हत्या करने वाला, गर्भस्थ बालक को मारने वाला, परनिन्दक तथा परस्त्रीलम्पट पुरुष भी अपरा एकादशी के सेवन से निश्चय ही पाप रहित हो जाता है। जो झूठी गवाही देता, माप-तोलमें धोखा देता, बिना जाने ही नक्षत्रों की गणना करता और कूटनीति से आयुर्वेद का ज्ञाता बनकर वैद्य का काम करता है- ये सब नरकमें निवास करने वाले प्राणी हैं। परन्तु अपरा एकादशी के सेवन से ये भी पापरहित हो जाते हैं। 

इसकी प्रचलित कथा के अनुसार प्राचीन काल में महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। उसका छोटा भाई वज्रध्वज बड़ा ही क्रूर, अधर्मी तथा अन्यायी था। वह अपने बड़े भाई से द्वेष रखता था। उस पापी ने एक दिन रात्रि में अपने बड़े भाई की हत्या करके उसकी देह को एक जंगली पीपल के नीचे गाड़ दिया। इस अकाल मृत्यु से राजा प्रेतात्मा के रूप में उसी पीपल पर रहने लगा और अनेक उत्पात करने लगा।
 
एक दिन अचानक धौम्य नामक ॠषि उधर से गुजरे। उन्होंने प्रेत को देखा और तपोबल से उसके अतीत को जान लिया। अपने तपोबल से प्रेत के  उत्पात का कारण समझा। ॠषि ने प्रसन्न होकर उस प्रेत को पीपल के पेड़ से उतारा तथा परलोक विद्या का उपदेश दिया।
 
दयालु ॠषि ने राजा की प्रेत योनि से मुक्ति के लिए स्वयं ही अपरा एकादशी का व्रत किया और उसे अगति से छुड़ाने को उसका पुण्य प्रेत को अर्पित कर दिया। इस पुण्य के प्रभाव से राजा की प्रेत योनि से मुक्ति हो गई। वह ॠषि को धन्यवाद देता हुआ दिव्य देह धारण कर पुष्पक विमान में बैठकर स्वर्ग को चला गया।
 
हे राजन! यह अपरा एकादशी की कथा मैंने लोकहित के लिए कही है। इसे पढ़ने अथवा सुनने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है।
अपरा एकादशी व्रत कथा समाप्त हुई बोलो - 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे 
हरे राम हरे रांम राम राम हरे हरे