वृन्दावन वास चाहिए - Vrindavan Vaas Chahiye

यह अत्यंत मधुर एवं रसपूर्ण भजन श्रीधाम वृंदावन की महिमा, श्रीराधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम तथा ब्रजवास की उत्कट अभिलाषा का भावपूर्ण वर्णन करता है। भजन में भक्त अपने जीवन की सबसे बड़ी कामना के रूप में वृंदावन धाम में निवास प्राप्त करने की प्रार्थना करता है। यमुना महारानी के पावन तट, निधिवन की दिव्यता, रसिक संतों की संगति तथा श्रीराधा रानी की असीम कृपा का सुंदर चित्रण इस रचना में किया गया है। भक्त मानता है कि संसार के समस्त सुखों से बढ़कर वृंदावन की धूल, वहाँ का वातावरण और भगवान के नाम का निरंतर स्मरण है। इस भजन में केवल धामवास की इच्छा ही नहीं, बल्कि ऐसा जीवन जीने की प्रार्थना भी है जिसमें मन, वचन और कर्म पूर्णतः श्रीराधा-कृष्ण की भक्ति में समर्पित हो जाएँ। भजन का प्रत्येक शब्द ब्रज प्रेम, वैराग्य, शरणागति और दिव्य रस की अनुभूति कराता है।

वृंदावन धाम को वास भलो, जहाँ पास बहे यमुना पटरानी।
जो जन जाय के ध्यान धरे, बैकुंठ मिले तिनको रजधानी।।

वेद पुराण बखान करे, सब संत मुनि तिनके मनमानी।
यमुना यमदूतन तारत है, भव तारत है श्री राधिका रानी।।

दे दो बांके! श्री वृंदावन वास चाहिए।
वास चाहिए, वास चाहिए, वास चाहिए।।

ओ मेरी रसना पे नाम श्री हरिदास चाहिए।
दे दो बांके! श्री वृंदावन वास चाहिए।।

वास चाहिए, वास चाहिए, वास चाहिए।
दे दो बांके! श्री वृंदावन वास चाहिए।।

वास चाहिए, वास चाहिए, वास चाहिए।
वृंदावन वृंदावन वास चाहिए, वास चाहिए।।

वृंदावन में रसिक मिलेंगे, रहते भक्ति में डूबे।
उनकी कृपा से ही भजन बढ़ेगा, तन-मन मस्ती में झूमे।।

हो मुझे रसिकों से रस की वो प्यास चाहिए।
मुझे रसिकों से रस की वो प्यास चाहिए।।

दे दो बांके! श्री वृंदावन वास चाहिए।
वास चाहिए, वास चाहिए, वास चाहिए।।

हमें वृंदावन वृंदावन वास चाहिए।
हमें वृंदावन वृंदावन वास चाहिए।।

जैसे राखो वैसे रहूँगी, पर दे दो वृंदावन।
नाम-धाम दो हृदय विराजे, भटके नहीं मेरा मन।।

ओ कहनी-रहनी बने विश्वास चाहिए।
कहनी-रहनी बने, विश्वास चाहिए।।

दे दो बांके! श्री वृंदावन वास चाहिए।
वास चाहिए, वास चाहिए, वास चाहिए।।

चाहे जो भी ले लो परीक्षा, केवल आस तिहारी।
हाँ चाहे जो भी ले लो परीक्षा, केवल आस तिहारी।।

धामवास की दे दो भिक्षा, श्यामा कुंजबिहारी।
मुझे निधिवन में निकले वो श्वास चाहिए।।

मुझे निधिवन में निकले वो श्वास चाहिए।
दे दो बांके! श्री वृंदावन वास चाहिए।।

वास चाहिए, वास चाहिए, वास चाहिए।
हमें वृंदावन वृंदावन वास चाहिए।।

हमें वृंदावन वृंदावन वास चाहिए।
हमें वृंदावन वृंदावन वास चाहिए।।

हो जब प्राण निकलने वाले, एक ध्यान हो मन में।
टटिया स्थान, रंगीली कुंज हो, कुंज महल हो मन में।।

टटिया स्थान, रंगीली कुंज हो, कुंज महल हो मन में।
श्री जी, स्वामी जू, गुरुदेव पास चाहिए।।

श्री जी, स्वामी जू, गुरुदेव पास चाहिए।
दे दो बांके! श्री वृंदावन वास चाहिए।।

वास चाहिए, वास चाहिए, वास चाहिए।
दे दो बांके! श्री वृंदावन वास चाहिए।।

वास चाहिए, वास चाहिए, वास चाहिए।
हमें वृंदावन वृंदावन वास चाहिए।।

हमें वृंदावन वृंदावन वास चाहिए।
हमें वृंदावन वृंदावन वास चाहिए।।

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हे गोपाल राधा कृष्ण गोविंद गोविंद - Hey Gopal Radha Krishna Govind Govind Sankirtan
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परिचय यह अत्यंत मधुर और भक्तिरस से परिपूर्ण श्रीकृष्ण नाम-स्मरण भजन भगवान श्रीकृष्ण के विभिन्न दिव्य नामों का संकीर्तन करता है। “गोपाल”, “राधा कृष्ण” और “गोविंद” जैसे पावन नाम भक्त के मन को भक्ति, प्रेम और शांति से भर देते हैं। इस भजन का सरल और मधुर स्वरूप सामूहिक संकीर्तन, भजन मंडली और ध्यान के समय विशेष आनंद प्रदान करता है। बार-बार भगवान के नामों का उच्चारण करते हुए भक्त अपने मन को संसारिक चिंताओं से हटाकर श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन कर देता है। यह भजन नाम-जप की महिमा को दर्शाता है और बताता है कि भगवान का नाम ही जीवन का सबसे बड़ा सहारा और आत्मिक आनंद का स्रोत है। भावार्थ इस भजन में भक्त भगवान श्रीकृष्ण को उनके प्रिय नामों से पुकारते हुए उनका स्मरण करता है। “गोपाल” भगवान के उस रूप को दर्शाता है जो अपने भक्तों और समस्त जीवों का पालन करते हैं, जबकि “गोविंद” आनंद और करुणा के स्वरूप श्रीकृष्ण का नाम है। भजन यह संदेश देता है कि भगवान के नामों का निरंतर जप करने से मन शुद्ध होता है और भक्त के भीतर प्रेम, भक्ति और शांति का संचार होता है। यह संकीर्तन भक्त को श्रीराधा-कृष्ण की दिव्य उपस्थिति का अनुभव कराते हुए उसे भक्ति रस में डुबो देता है।

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परिचय यह अत्यंत भावपूर्ण कृष्ण-भक्ति गीत है, जिसमें भक्त अपने जीवन की समस्त भूलों, दुर्बलताओं और सांसारिक मोह-माया को स्वीकार करते हुए भगवान श्रीकृष्ण से अंतिम समय में अपने नाम का स्मरण कराने की प्रार्थना करता है। इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि जीवन भर की सच्ची भक्ति और भगवान का नाम ही अंत समय में जीव का वास्तविक सहारा बनता है। भजन में वैराग्य, समर्पण, पश्चाताप और प्रभु-प्रेम का सुंदर संगम देखने को मिलता है। भावार्थ इस भजन में भक्त भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में पूर्ण समर्पण व्यक्त करता है। वह स्वीकार करता है कि जीवन में उससे अनेक भूलें हुई हैं, फिर भी उसे प्रभु की असीम करुणा पर विश्वास है। संसार की धन-दौलत, शरीर और संबंध सभी नश्वर हैं और अंततः साथ छोड़ जाते हैं, परंतु भगवान का नाम और उनकी कृपा ही जीव के साथ रहती है। भक्त प्रार्थना करता है कि मृत्यु के समय उसकी जिह्वा पर केवल श्रीकृष्ण का नाम हो और स्वयं श्याम उसे अपने धाम ले जाने आएँ। यह भजन भगवान के नाम-स्मरण, प्रेम और शरणागति के महत्व को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है।

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परिचय यह अत्यंत मधुर और वात्सल्य रस से भरा श्रीकृष्ण भजन भगवान श्रीकृष्ण के घर आगमन की आनंदमयी भावना को व्यक्त करता है। इस भजन में भक्त अपने घर आए बाल गोपाल की मनमोहक छवि का वर्णन करता है। श्रीकृष्ण की पायल की मधुर ध्वनि, उनकी सांवली सूरत और मोहक मुस्कान पूरे वातावरण को प्रेम और आनंद से भर देती है। भजन में माता यशोदा, सखियों और भक्तों के हृदय में उत्पन्न होने वाले आनंद का सुंदर चित्रण किया गया है। कान्हा के आगमन से अंधेरी रात भी प्रकाशमय हो जाती है और हर कोई उनकी मोहिनी छवि में खो जाता है। यह भजन भक्त और भगवान के बीच के प्रेम, वात्सल्य और आत्मिक आनंद की मधुर अनुभूति कराता है। इसे सुनकर ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं बालकृष्ण भक्त के घर पधार गए हों। भावार्थ इस भजन में भक्त अत्यंत प्रसन्न होकर कहता है कि भगवान श्रीकृष्ण उसके घर पधारे हैं। उनकी पायल की मधुर ध्वनि और सुंदर छवि देखकर पूरा वातावरण आनंद से भर गया है। भक्त अनुभव करता है कि श्रीकृष्ण के आगमन से अंधकार मिट जाता है और जीवन पवित्र हो जाता है। माता यशोदा और सखियाँ भी कान्हा की मोहक अदाओं को देखकर आनंदित हो जाती हैं। भजन यह संदेश देता है कि जब भगवान भक्त के हृदय में आते हैं, तब जीवन प्रेम, शांति और दिव्य आनंद से भर जाता है। श्रीकृष्ण का दर्शन और स्मरण ही भक्त के जीवन को पावन बना देता है।

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