हे गोपाल राधा कृष्ण गोविंद गोविंद - Hey Gopal Radha Krishna Govind Govind Sankirtan
यह अत्यंत मधुर और भक्तिरस से परिपूर्ण श्रीकृष्ण नाम-स्मरण भजन भगवान श्रीकृष्ण के विभिन्न दिव्य नामों का संकीर्तन करता है। “गोपाल”, “राधा कृष्ण” और “गोविंद” जैसे पावन नाम भक्त के मन को भक्ति, प्रेम और शांति से भर देते हैं।
हे गोपाल राधा कृष्ण गोविंद गोविंद कृष्ण।
गोविंद गोविंद कृष्ण गोविंद गोविंद॥
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सरयू किनारे - Saryu Kinare
परिचय यह अत्यंत मधुर और भावपूर्ण राम भजन भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के अयोध्या आगमन की दिव्य अनुभूति को प्रकट करता है। भजन में सरयू तट, अवध नगरी और प्रभु श्रीराम के स्वागत का इतना सुंदर चित्रण किया गया है कि सुनने वाला स्वयं को अयोध्या की उस पावन बेला में उपस्थित अनुभव करता है। भजन के शब्द भक्तों के हृदय में वर्षों से बसे उस प्रेम, प्रतीक्षा और आनंद को दर्शाते हैं, जब प्रभु अपने भक्तों के जीवन और घर में पधारते हैं। दीपों की रोशनी, मुस्कुराते चेहरे और प्रभु दर्शन की लालसा इस भजन को और भी अधिक भक्तिमय बना देती है। यह केवल भगवान के आगमन का वर्णन नहीं, बल्कि उस आध्यात्मिक आनंद का उत्सव है जो प्रभु कृपा से जीवन में आता है। भावार्थ इस भजन में भक्त भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के अवध आगमन का आनंद मनाते हुए कहता है कि जैसे प्रभु स्वयं उसके आंगन में पधार गए हों। प्रभु के आगमन से पूरा वातावरण प्रकाश, प्रेम और खुशियों से भर जाता है। वर्षों की प्रतीक्षा समाप्त होती है और भक्त की आँखें प्रभु दर्शन पाकर भावविभोर हो उठती हैं। भजन यह भी दर्शाता है कि श्रीराम, सीता और लक्ष्मण का संबंध प्रेम, त्याग और मर्यादा का प्रतीक है। उनके दर्शन मात्र से भक्त के जीवन में शांति और आनंद का संचार होता है। अवधपुरी की खुशहाली और दीपों की जगमगाहट इस बात का प्रतीक है कि जहाँ प्रभु का वास होता है वहाँ अंधकार और दुःख स्वयं दूर हो जाते हैं। अंत में भक्त यही कामना करता है कि उसका पूरा जीवन प्रभु के दर्शन और स्मरण में ही बीते। यह भजन श्रद्धा, प्रेम और प्रभु आगमन की अलौकिक अनुभूति को अत्यंत सुंदर ढंग से प्रस्तुत करता है।
मैं तो गोवर्धन कु जाऊ मेरी वीर - Mai To Govardhan Ku Jau Meri Veer
परिचय यह अत्यंत मधुर और भक्तिरस से भरा गोवर्धन भजन भक्त के मन में बसे ब्रज प्रेम और गिरिराज गोवर्धन के प्रति अटूट श्रद्धा का सुंदर चित्रण करता है। इस भजन में भक्त अपने मन की तीव्र इच्छा व्यक्त करता है कि वह गोवर्धन धाम जाकर गिरिराज जी की परिक्रमा करे, मानसी गंगा में स्नान करे और संतों की सेवा कर भगवान के दर्शन प्राप्त करे। भजन में ब्रजभक्ति की सरलता और प्रेममयी भावना झलकती है। भक्त का मन संसार में कहीं नहीं लगता और वह बार-बार केवल गोवर्धन जाने की ही इच्छा प्रकट करता है। गिरिराज महाराज की परिक्रमा, संत सेवा और हरि दर्शन की लालसा इस भजन को अत्यंत भावपूर्ण बना देती है। यह भजन केवल तीर्थ यात्रा का वर्णन नहीं बल्कि भगवान श्रीकृष्ण और ब्रजधाम के प्रति गहरी भक्ति, प्रेम और समर्पण का दिव्य प्रतीक है। भावार्थ इस भजन में भक्त कहता है कि उसका मन किसी भी प्रकार से नहीं मानता और वह केवल गोवर्धन धाम जाना चाहता है। वह गिरिराज जी की सात कोस परिक्रमा करना, मानसी गंगा में स्नान करना और संतों को भोजन कराना चाहता है। भक्त के हृदय में श्रीकृष्ण के दर्शन की तीव्र लालसा है और वह ब्रजभूमि की सेवा को ही अपने जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य मानता है। उसका मन संसारिक इच्छाओं से हटकर केवल हरि भक्ति में रम गया है। यह भजन दर्शाता है कि सच्चा भक्त भगवान और उनके धाम के प्रति इतना प्रेम रखता है कि उसका मन हर समय उसी स्मरण और दर्शन की अभिलाषा में लगा रहता है।
अंत समय में श्याम - Ant Samay Mein Shyam
परिचय यह अत्यंत भावपूर्ण कृष्ण-भक्ति गीत है, जिसमें भक्त अपने जीवन की समस्त भूलों, दुर्बलताओं और सांसारिक मोह-माया को स्वीकार करते हुए भगवान श्रीकृष्ण से अंतिम समय में अपने नाम का स्मरण कराने की प्रार्थना करता है। इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि जीवन भर की सच्ची भक्ति और भगवान का नाम ही अंत समय में जीव का वास्तविक सहारा बनता है। भजन में वैराग्य, समर्पण, पश्चाताप और प्रभु-प्रेम का सुंदर संगम देखने को मिलता है। भावार्थ इस भजन में भक्त भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में पूर्ण समर्पण व्यक्त करता है। वह स्वीकार करता है कि जीवन में उससे अनेक भूलें हुई हैं, फिर भी उसे प्रभु की असीम करुणा पर विश्वास है। संसार की धन-दौलत, शरीर और संबंध सभी नश्वर हैं और अंततः साथ छोड़ जाते हैं, परंतु भगवान का नाम और उनकी कृपा ही जीव के साथ रहती है। भक्त प्रार्थना करता है कि मृत्यु के समय उसकी जिह्वा पर केवल श्रीकृष्ण का नाम हो और स्वयं श्याम उसे अपने धाम ले जाने आएँ। यह भजन भगवान के नाम-स्मरण, प्रेम और शरणागति के महत्व को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है।
किशोरी लाड़ली - Kishori Ladali
परिचय यह एक अत्यंत मधुर और भक्तिमय राधा भजन है, जिसमें श्री राधा रानी के अवतरण और उनके बाल रूप की दिव्य कथा का सुंदर वर्णन किया गया है। इस भजन में राधा रानी को वृषभानु नंदिनी और बरसाना की लाडली के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिनके आगमन से सम्पूर्ण ब्रज में आनंद और उत्सव का वातावरण छा जाता है। भजन की पंक्तियों में उनकी सुंदरता, मासूमियत और दिव्यता का अत्यंत मनोहारी चित्रण किया गया है। साथ ही, यह भी दर्शाया गया है कि राधा रानी का जन्म केवल एक घटना नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के लिए एक दिव्य उत्सव है। भावार्थ इस भजन का मुख्य भाव श्री राधा रानी के जन्म, उनकी महिमा और उनके दिव्य स्वरूप का गुणगान करना है। भक्त यह मानता है कि राधा रानी स्वयं लक्ष्मी का अवतार हैं, जो प्रेम और करुणा का संदेश देने इस धरा पर आई हैं। भजन में यह भी बताया गया है कि राधा और कृष्ण का संबंध कितना गहरा और दिव्य है—राधा की आंखें भी तब तक नहीं खुलतीं जब तक वे कृष्ण के दर्शन नहीं कर लेतीं।
भक्ति रस के और कृष्ण भजन - Krishan BhajanMore Bhajans

परिचय यह अत्यंत मधुर और भक्तिरस से भरा गोवर्धन भजन भक्त के मन में बसे ब्रज प्रेम और गिरिराज गोवर्धन के प्रति अटूट श्रद्धा का सुंदर चित्रण करता है। इस भजन में भक्त अपने मन की तीव्र इच्छा व्यक्त करता है कि वह गोवर्धन धाम जाकर गिरिराज जी की परिक्रमा करे, मानसी गंगा में स्नान करे और संतों की सेवा कर भगवान के दर्शन प्राप्त करे। भजन में ब्रजभक्ति की सरलता और प्रेममयी भावना झलकती है। भक्त का मन संसार में कहीं नहीं लगता और वह बार-बार केवल गोवर्धन जाने की ही इच्छा प्रकट करता है। गिरिराज महाराज की परिक्रमा, संत सेवा और हरि दर्शन की लालसा इस भजन को अत्यंत भावपूर्ण बना देती है। यह भजन केवल तीर्थ यात्रा का वर्णन नहीं बल्कि भगवान श्रीकृष्ण और ब्रजधाम के प्रति गहरी भक्ति, प्रेम और समर्पण का दिव्य प्रतीक है। भावार्थ इस भजन में भक्त कहता है कि उसका मन किसी भी प्रकार से नहीं मानता और वह केवल गोवर्धन धाम जाना चाहता है। वह गिरिराज जी की सात कोस परिक्रमा करना, मानसी गंगा में स्नान करना और संतों को भोजन कराना चाहता है। भक्त के हृदय में श्रीकृष्ण के दर्शन की तीव्र लालसा है और वह ब्रजभूमि की सेवा को ही अपने जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य मानता है। उसका मन संसारिक इच्छाओं से हटकर केवल हरि भक्ति में रम गया है। यह भजन दर्शाता है कि सच्चा भक्त भगवान और उनके धाम के प्रति इतना प्रेम रखता है कि उसका मन हर समय उसी स्मरण और दर्शन की अभिलाषा में लगा रहता है।

परिचय यह अत्यंत भावपूर्ण कृष्ण-भक्ति गीत है, जिसमें भक्त अपने जीवन की समस्त भूलों, दुर्बलताओं और सांसारिक मोह-माया को स्वीकार करते हुए भगवान श्रीकृष्ण से अंतिम समय में अपने नाम का स्मरण कराने की प्रार्थना करता है। इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि जीवन भर की सच्ची भक्ति और भगवान का नाम ही अंत समय में जीव का वास्तविक सहारा बनता है। भजन में वैराग्य, समर्पण, पश्चाताप और प्रभु-प्रेम का सुंदर संगम देखने को मिलता है। भावार्थ इस भजन में भक्त भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में पूर्ण समर्पण व्यक्त करता है। वह स्वीकार करता है कि जीवन में उससे अनेक भूलें हुई हैं, फिर भी उसे प्रभु की असीम करुणा पर विश्वास है। संसार की धन-दौलत, शरीर और संबंध सभी नश्वर हैं और अंततः साथ छोड़ जाते हैं, परंतु भगवान का नाम और उनकी कृपा ही जीव के साथ रहती है। भक्त प्रार्थना करता है कि मृत्यु के समय उसकी जिह्वा पर केवल श्रीकृष्ण का नाम हो और स्वयं श्याम उसे अपने धाम ले जाने आएँ। यह भजन भगवान के नाम-स्मरण, प्रेम और शरणागति के महत्व को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है।

परिचय यह अत्यंत मधुर और वात्सल्य रस से भरा श्रीकृष्ण भजन भगवान श्रीकृष्ण के घर आगमन की आनंदमयी भावना को व्यक्त करता है। इस भजन में भक्त अपने घर आए बाल गोपाल की मनमोहक छवि का वर्णन करता है। श्रीकृष्ण की पायल की मधुर ध्वनि, उनकी सांवली सूरत और मोहक मुस्कान पूरे वातावरण को प्रेम और आनंद से भर देती है। भजन में माता यशोदा, सखियों और भक्तों के हृदय में उत्पन्न होने वाले आनंद का सुंदर चित्रण किया गया है। कान्हा के आगमन से अंधेरी रात भी प्रकाशमय हो जाती है और हर कोई उनकी मोहिनी छवि में खो जाता है। यह भजन भक्त और भगवान के बीच के प्रेम, वात्सल्य और आत्मिक आनंद की मधुर अनुभूति कराता है। इसे सुनकर ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं बालकृष्ण भक्त के घर पधार गए हों। भावार्थ इस भजन में भक्त अत्यंत प्रसन्न होकर कहता है कि भगवान श्रीकृष्ण उसके घर पधारे हैं। उनकी पायल की मधुर ध्वनि और सुंदर छवि देखकर पूरा वातावरण आनंद से भर गया है। भक्त अनुभव करता है कि श्रीकृष्ण के आगमन से अंधकार मिट जाता है और जीवन पवित्र हो जाता है। माता यशोदा और सखियाँ भी कान्हा की मोहक अदाओं को देखकर आनंदित हो जाती हैं। भजन यह संदेश देता है कि जब भगवान भक्त के हृदय में आते हैं, तब जीवन प्रेम, शांति और दिव्य आनंद से भर जाता है। श्रीकृष्ण का दर्शन और स्मरण ही भक्त के जीवन को पावन बना देता है।

परिचय यह अत्यंत मधुर और विरह रस से परिपूर्ण श्रीकृष्ण भजन भक्त के हृदय में बसे कान्हा के प्रेम और उनकी बांसुरी की मोहिनी धुन का भावपूर्ण वर्णन करता है। इस भजन में भक्त कहता है कि श्रीकृष्ण की बांसुरी ने उसकी नींद और चैन दोनों चुरा लिए हैं और अब उसका मन केवल कान्हा के प्रेम में डूबा रहता है। भजन में प्रेम, विरह और समर्पण की गहरी भावना दिखाई देती है। भक्त संसार से छिपकर अपने हृदय की व्यथा व्यक्त करता है और कहता है कि श्रीकृष्ण के दर्शन के बिना उसका जीवन अधूरा प्रतीत होता है। कान्हा की मधुर बांसुरी उसके मन को बार-बार उनकी ओर आकर्षित करती है। यह भजन भक्त और भगवान के बीच के उस दिव्य प्रेम को दर्शाता है जहाँ विरह भी भक्ति का मधुर स्वरूप बन जाता है। भावार्थ इस भजन में भक्त श्रीकृष्ण से कहता है कि उनकी बांसुरी की मधुर धुन ने उसका चैन और नींद छीन ली है। अब उसका मन हर समय केवल कान्हा के स्मरण और प्रेम में डूबा रहता है। भक्त अपने प्रेम को अत्यंत पवित्र मानते हुए डरता है कि कहीं उसकी प्रेम डोरी टूट न जाए। वह कान्हा के दर्शन की अभिलाषा में व्याकुल होकर आँसू बहाता है और उनके बिना जीवन को अधूरा अनुभव करता है। भजन यह संदेश देता है कि सच्ची भक्ति में प्रेम इतना गहरा हो जाता है कि भक्त का मन संसार से हटकर केवल भगवान में ही रम जाता है। श्रीकृष्ण की बांसुरी यहाँ दिव्य प्रेम और आत्मिक आकर्षण का प्रतीक है।

परिचय यह अत्यंत भावपूर्ण कृष्ण भजन एक भक्त की अपने आराध्य श्रीकृष्ण के प्रति गहरी विरह भावना और समर्पण को व्यक्त करता है। भजन में भक्त स्वयं वृन्दावन न जा पाने की विवशता प्रकट करते हुए किसी यात्री के माध्यम से अपना संदेश, प्रणाम और प्रेम श्रीकृष्ण तक पहुँचाने की विनती करता है। इसके शब्दों में भक्ति, प्रेम, विरह और श्रीधाम वृन्दावन के प्रति अनन्य आकर्षण का सुंदर संगम देखने को मिलता है। भावार्थ इस भजन में भक्त भगवान श्रीकृष्ण से मिलन की तीव्र अभिलाषा व्यक्त करता है। वह कहता है कि यदि कोई वृन्दावन जाए तो उसके प्रणाम, आँसू, भावनाएँ और प्रेम प्रभु तक पहुँचा दे। भक्त स्वयं को संसार की माया और कठिनाइयों में फँसा हुआ मानकर श्रीकृष्ण से अपने उद्धार की प्रार्थना करता है। भजन का मुख्य संदेश यह है कि सच्चा भक्त अपने प्रभु से दूर रहकर भी हर क्षण उनका स्मरण करता है और जीवन के अंतिम क्षण तक उनके चरणों में स्थान पाने की कामना करता है। यह रचना श्रीकृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण, प्रेम और विरह-भक्ति का अद्भुत उदाहरण है।

परिचय यह अत्यंत भावपूर्ण और ज्ञानमयी भजन संत महिमा और भगवान से जुड़ने की सच्ची अभिलाषा को व्यक्त करता है। इस भजन में भक्त ऐसे संत की कामना करता है जो उसे भगवान हरि से जोड़ दे और उसके जीवन के अज्ञान, भ्रम तथा मोह को दूर कर दे। भजन में संतों के संग की महिमा का अत्यंत सुंदर वर्णन किया गया है। भक्त मानता है कि सच्चे संत का मिलना संसार में दुर्लभ है, लेकिन वही संत मनुष्य को भक्ति, सद्गुण और मोक्ष का मार्ग दिखाते हैं। यह भजन आत्मिक जागृति, सत्संग और ईश्वर भक्ति की प्रेरणा देने वाला अत्यंत मधुर भजन है। भावार्थ इस भजन में भक्त भगवान से प्रार्थना करता है कि उसे ऐसा संत मिले जो उसका संबंध भगवान हरि से जोड़ दे। वह चाहता है कि संत उसके मन के भ्रम और अज्ञान को दूर कर उसे सच्चे भक्ति मार्ग पर चलाएं। भक्त यह भी कहता है कि संसार की माया से दूर होकर केवल संतों की कृपा से ही ईश्वर प्राप्ति का मार्ग सरल होता है। सच्चा संत भक्त का हाथ पकड़कर उसे कभी भटकने नहीं देता। भजन यह संदेश देता है कि संतों का संग जीवन को सफल और पवित्र बनाता है। वे मनुष्य को सद्गुण, भक्ति और भगवान के प्रेम की ओर ले जाते हैं।

परिचय यह अत्यंत पवित्र और दिव्य मंत्र भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण की शरणागति एवं रक्षा की प्रार्थना का सुंदर स्वरूप है। इस मंत्र में भक्त भगवान राम को “राघव” और भगवान कृष्ण को “केशव” कहकर पुकारता है तथा उनसे अपनी रक्षा और कृपा की याचना करता है। यह मंत्र वैष्णव भक्ति परंपरा में अत्यंत प्रसिद्ध है और इसका जप मन को शांति, शक्ति और आध्यात्मिक आनंद प्रदान करता है। “रक्षाम्” और “पाहिमाम्” शब्द भक्त की उस भावना को व्यक्त करते हैं जिसमें वह स्वयं को पूर्ण रूप से भगवान के चरणों में समर्पित कर देता है। इस मंत्र का उच्चारण भक्त के हृदय में भक्ति, विश्वास और आत्मिक शांति का संचार करता है तथा भगवान के नाम स्मरण की महिमा को प्रकट करता है। भावार्थ इस मंत्र में भक्त भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण से अपनी रक्षा और कृपा की प्रार्थना करता है। “राम राघव रक्षाम्” का अर्थ है — हे भगवान राम, मेरी रक्षा कीजिए। वहीं “कृष्ण केशव पाहिमाम्” का अर्थ है — हे भगवान कृष्ण, मुझे अपनी शरण में लेकर मेरी रक्षा कीजिए। यह मंत्र यह संदेश देता है कि भगवान का नाम ही भक्त का सबसे बड़ा सहारा है। जब भक्त श्रद्धा और विश्वास के साथ प्रभु का स्मरण करता है, तब उसे भय, दुख और चिंता से मुक्ति प्राप्त होती है। यह मंत्र भक्ति, समर्पण और भगवान के प्रति अटूट विश्वास का अत्यंत सुंदर प्रतीक है।

परिचय यह अत्यंत प्रेरणादायक और ज्ञानमयी भजन मानव जीवन के सत्य, वैराग्य और ईश्वर की कृपा का गहन संदेश देता है। इस भजन में बताया गया है कि मनुष्य जिस शरीर, धन और संसारिक वस्तुओं को अपना समझता है, वे वास्तव में परमात्मा की देन हैं। भजन अहंकार और “मैं” तथा “मेरा” की भावना को त्यागने की प्रेरणा देता है। इसमें जीवन की नश्वरता और संसार की अस्थिरता का अत्यंत सरल और प्रभावशाली वर्णन किया गया है। यह भजन मनुष्य को सेवा, भक्ति और साधना के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है तथा यह सिखाता है कि सच्ची शांति और संतोष केवल ईश्वर प्रेम में ही प्राप्त होता है। भावार्थ इस भजन में कहा गया है कि मनुष्य का शरीर, धन और जीवन सब भगवान की देन हैं। इसलिए किसी भी वस्तु पर अहंकार करना उचित नहीं है, क्योंकि संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है। भजन यह समझाता है कि जीवन में प्राप्त सभी सुख और साधन क्षणिक हैं और एक दिन सब कुछ छूट जाने वाला है। इसलिए मनुष्य को मोह और अभिमान छोड़कर प्रेम, सेवा और भक्ति का मार्ग अपनाना चाहिए। अंत में यह संदेश दिया गया है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य साधना और ईश्वर की सेवा है। जो व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है, उसका जीवन सफल और शांतिमय बन जाता है।

परिचय यह अत्यंत मधुर और लोकभाव से भरपूर राजस्थानी कृष्ण भजन भक्त और भगवान के निष्कपट प्रेम का सुंदर चित्रण करता है। इस भजन में एक सरल हृदय भक्तिन अपने आराध्य श्रीश्याम को प्रेमपूर्वक खीचड़ो परोसकर भोजन कराने का भाव व्यक्त करती है। भजन में ग्रामीण जीवन की सहजता, प्रेम और भक्ति का अद्भुत संगम दिखाई देता है। भक्तिन के पास भले ही राजसी भोजन न हो, लेकिन उसके हृदय में श्रीकृष्ण के प्रति सच्चा प्रेम और सेवा भाव है। यही प्रेम भगवान को अपने भक्त के घर खींच लाता है। यह भजन करमा बाई की प्रसिद्ध भक्ति भावना की याद दिलाता है, जहाँ भगवान केवल प्रेम और श्रद्धा से प्रसन्न होकर भक्त के घर पधारते हैं। सच्चे प्रेम और निष्कपट भक्ति की यही महिमा इस भजन की आत्मा है। भावार्थ इस भजन में भक्तिन भगवान श्रीश्याम को प्रेमपूर्वक खीचड़ो और घी का भोग लगाने के लिए आमंत्रित करती है। वह कहती है कि उसके पिता घर पर नहीं हैं, इसलिए वह स्वयं प्रेम से भगवान को भोजन करा रही है। भक्तिन का विश्वास है कि यदि भक्ति करमा बाई जैसी सच्ची और निष्कपट हो, तो भगवान स्वयं भक्त के घर पधारते हैं। भक्ति में बाहरी वैभव नहीं बल्कि प्रेम और श्रद्धा का महत्व होता है। भजन यह संदेश देता है कि भगवान केवल सच्चे प्रेम से प्रसन्न होते हैं। जब भक्त का हृदय निर्मल और समर्पित होता है, तब भगवान निर्जीव मूर्ति में भी सजीव रूप से अनुभव होने लगते हैं।

परिचय यह अत्यंत मधुर और भक्तिरस से परिपूर्ण भजन श्रीराधा-कृष्ण के युगल स्वरूप की महिमा का सुंदर गुणगान करता है। इस भजन में भक्त अपने आराध्य जुगल किशोर श्रीराधा-कृष्ण को अपना सर्वस्व मानते हुए उनके चरणों में पूर्ण समर्पण का भाव प्रकट करता है। भजन में भक्त कहता है कि वह जन्म-जन्मांतर तक श्रीराधा-कृष्ण का सेवक बनकर उनके चरणों की सेवा करना चाहता है। प्रभु की असीम दया, करुणा और भक्तवत्सलता का अत्यंत सुंदर वर्णन इस भजन की विशेषता है। इस भजन में श्रीराधारमण, राधावल्लभ, कुंजबिहारी और गिरिधरलाल जैसे श्रीकृष्ण के प्रिय स्वरूपों का स्मरण करके भक्त अपने प्रेम और श्रद्धा को व्यक्त करता है। यह भजन प्रेम, समर्पण और निष्काम भक्ति का अद्भुत उदाहरण है। भावार्थ इस भजन में भक्त श्रीराधा-कृष्ण को अपना स्वामी और जीवन का आधार मानते हुए कहता है कि वह सदैव उनके चरणों का सेवक बना रहना चाहता है। भक्त का विश्वास है कि प्रभु अपने भक्तों की भूलों को क्षमा कर उन पर सदैव कृपा करते हैं। भजन यह भी दर्शाता है कि भगवान अपने शरणागत भक्तों का पालन और उद्धार करते हैं। उनके अनेक सुंदर स्वरूप भक्त के हृदय में प्रेम और आनंद उत्पन्न करते हैं। अंत में भक्त पूर्ण प्रेम और समर्पण के साथ स्वीकार करता है कि उसके लिए भगवान ही सब कुछ हैं और वही उसके सच्चे ठाकुर हैं। यही इस भजन का मुख्य भाव है।