दूर नगरी बड़ी दूर नगरी - Dur Nagari Badi Dur Nagari
परिचय
यह अत्यंत मधुर और प्रेमरस से परिपूर्ण राधा-कृष्ण भजन गोपी और श्रीकृष्ण के मधुर संवाद एवं प्रेम भाव का सुंदर चित्रण करता है। इस भजन में गोपी अपने प्रिय कन्हैया से मिलने की उत्कट इच्छा व्यक्त करती है, लेकिन गोकुल की दूरी, लोकलाज और मार्ग की कठिनाइयों के कारण अपने मन की व्यथा भी प्रकट करती है।
भजन की प्रत्येक पंक्ति में ब्रज की सरलता, प्रेम की मधुरता और श्रीकृष्ण के प्रति गोपियों की गहरी अनुरक्ति दिखाई देती है। कभी गोपी रात में आने से डरती है, तो कभी दिन में लोगों की नजरों से संकोच करती है। यह भाव भक्त और भगवान के बीच के प्रेम को अत्यंत सरल और मनोहारी रूप में प्रस्तुत करता है।
यह भजन केवल सांसारिक मिलन का वर्णन नहीं बल्कि आत्मा की परमात्मा से मिलने की तड़प और भक्ति की गहन भावना का प्रतीक भी है।
भावार्थ
इस भजन में गोपी श्रीकृष्ण से कहती है कि उनकी गोकुल नगरी बहुत दूर है और वहाँ पहुँचने में उसे अनेक संकोच और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वह कभी रात के अंधकार से डरती है तो कभी दिन में लोगों की बातों से लज्जित होती है।
गोपी का मन श्रीकृष्ण से मिलने के लिए अत्यंत व्याकुल है, लेकिन प्रेम के साथ-साथ उसमें विनम्रता और संकोच भी है। वह कहती है कि यदि सखियों के साथ आए तो शर्म आती है और अकेली आए तो रास्ता भूल जाने का भय लगता है।
अंत में यह भजन प्रेम की उस मधुर अवस्था को दर्शाता है जहाँ भक्त अपने आराध्य से मिलने के लिए हर कठिनाई सहने को तैयार रहता है। यह राधा-कृष्ण प्रेम और ब्रजभाव की अत्यंत सुंदर अभिव्यक्ति है।