दूर नगरी बड़ी दूर नगरी - Dur Nagari Badi Dur Nagari
यह अत्यंत मधुर और प्रेमरस से परिपूर्ण राधा-कृष्ण भजन गोपी और श्रीकृष्ण के मधुर संवाद एवं प्रेम भाव का सुंदर चित्रण करता है। इस भजन में गोपी अपने प्रिय कन्हैया से मिलने की उत्कट इच्छा व्यक्त करती है, लेकिन गोकुल की दूरी, लोकलाज और मार्ग की कठिनाइयों के कारण अपने मन की व्यथा भी प्रकट करती है।
दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी।
कैसे आऊं मैं कन्हैया, तेरी गोकुल नगरी॥
कैसे आऊं मैं कन्हैया, तेरी गोकुल नगरी॥
बड़ी दूर नगरी॥
कान्हा दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी।
कान्हा दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी॥
रात में आऊं तो कान्हा, डर मोहे लागे।
दिन में आऊं तो, देखे सारी नगरी॥
बड़ी दूर नगरी।
कान्हा दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी॥
कैसे आऊं मैं कन्हैया, तेरी गोकुल नगरी॥
बड़ी दूर नगरी॥
सखी संग आऊं कान्हा, डर मोहे लागे।
अकेली आऊं तो भूल जाऊ डगरी॥
बड़ी दूर नगरी।
कान्हा दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी॥
कैसे आऊं मैं कन्हैया, तेरी गोकुल नगरी॥
बड़ी दूर नगरी॥
मीरा कहे प्रभु गिरधर नागर।
गिरधर नागर प्यारे नटवर नागर॥
तुम्हरे दरस बिन मैं तो हो गई बावरी।
बड़ी दूर नगरी...
दूर नगरी बड़ी दूर नगरी।
दूर नगरी बड़ी दूर नगरी॥
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परिचय यह अत्यंत भक्तिमय और उत्साहपूर्ण कृष्ण भजन भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला का सुंदर वर्णन करता है। भजन में उस दिव्य प्रसंग को गाया गया है जब श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर सम्पूर्ण ब्रजवासियों की रक्षा की थी। इसी अद्भुत लीला के कारण उन्हें “गिरधारी” नाम प्राप्त हुआ। भजन में इन्द्र के अहंकार, मूसलधार वर्षा और श्रीकृष्ण की करुणामयी रक्षा का अत्यंत सरल और मधुर चित्रण किया गया है। यह भजन भक्तों को भगवान की शक्ति, करुणा और अपने भक्तों के प्रति उनके प्रेम का अनुभव कराता है। साथ ही यह संदेश भी देता है कि भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए हर संकट में उनके साथ खड़े रहते हैं। भावार्थ इस भजन में वर्णन किया गया है कि जब ब्रजवासियों ने भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर इन्द्र की पूजा छोड़कर गोवर्धन पर्वत की पूजा की, तब इन्द्र को बहुत क्रोध आया। अपने अहंकार में आकर इन्द्र ने ब्रज में मूसलधार वर्षा आरंभ कर दी ताकि सम्पूर्ण ब्रज डूब जाए। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर सभी ब्रजवासियों, गौओं और जीवों को उसके नीचे सुरक्षित आश्रय दिया। इन्द्र आश्चर्यचकित रह गया कि इतनी प्रचंड वर्षा के बाद भी ब्रज का कुछ नहीं बिगड़ा। तब उसे अपनी भूल और अहंकार का एहसास हुआ। भजन यह संदेश देता है कि भगवान अपने भक्तों की सदैव रक्षा करते हैं और अहंकार का अंत निश्चित है। श्रीकृष्ण की यह लीला प्रेम, संरक्षण और दिव्य शक्ति का प्रतीक है। “गिरधारी” नाम भगवान की उसी महान कृपा और गोवर्धन धारण लीला की याद दिलाता है।

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