Ashtak

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कृष्णप्रेममयी राधा युगलाष्टकम् - Krishna Prem Mayi Radha Yugalashtakam
परिचय
युगलाष्टकम् श्रीराधा–कृष्ण के दिव्य युगल स्वरूप का अत्यंत मधुर और भावपूर्ण स्तवन है। इसमें राधा और कृष्ण को एक-दूसरे का प्रेम, प्राण, धन, चेतना और आश्रय बताया गया है। यह रचना वैष्णव परंपरा में युगल भक्ति और माधुर्य भाव का श्रेष्ठ उदाहरण मानी जाती है, जहाँ राधा और कृष्ण को अलग नहीं बल्कि एकात्म रूप में पूजा जाता है।
भावार्थ
युगलाष्टकम् का मूल भाव यह है कि श्रीराधा और श्रीकृष्ण परस्पर पूर्णतः अभिन्न हैं।
राधा का सर्वस्व कृष्ण हैं और कृष्ण का सर्वस्व राधा हैं।
उनका प्रेम, प्राण, चेतना, निवास, वस्त्र और राज्य सब एक-दूसरे में स्थित है।
भक्त यह स्वीकार करता है कि उसके जीवन का वास्तविक धन और उसकी शाश्वत गति केवल राधा–कृष्ण युगल ही हैं।
पाठ का फल
युगलाष्टकम् का नित्य श्रद्धा और प्रेमपूर्वक पाठ करने से—
राधा–कृष्ण के प्रति प्रेम और माधुर्य भाव की वृद्धि होती है
मन में शांति, कोमलता और भक्तिरस का संचार होता है
अहंकार, भय और द्वेष का नाश होता है
भक्ति में स्थिरता और गहराई आती है
अंततः भक्त को राधा–कृष्ण की कृपा और दिव्य सान्निध्य प्राप्त होता है

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चौराष्टकम् - Chaurastakam
चौराग्रगण्य पुरुषाष्टकम् भगवान श्रीकृष्ण के उस अलौकिक रूप का स्तवन है जिसमें वे नवनीतचौर — अर्थात् माखन चोर — के रूप में प्रकट होते हैं। यह अष्टकम केवल बाह्य लीलाओं का वर्णन नहीं करता, बल्कि यह बताता है कि श्रीकृष्ण भक्तों के पाप, अहंकार, आसक्ति और बंधनों को चुरा लेने वाले परम करुणामय भगवान हैं। इस अष्टकम में भक्त स्वयं अपने हृदय को श्रीकृष्ण का कारागार मानकर उन्हें वहीं सदा के लिए बाँध लेना चाहता है।
भावार्थ (संक्षेप)
इस अष्टकम का केंद्रीय भाव यह है कि श्रीकृष्ण संसार के साधारण चोर नहीं, बल्कि सर्वोच्च चोर हैं — जो भक्तों के पाप, मोह, भवबंधन, यमपाश और अहंकार तक को चुरा लेते हैं। वे धन, मान और इन्द्रियों को हरकर जीव को पूर्णतः शरणागत बना देते हैं। भक्त यह स्वीकार करता है कि प्रभु ने उसका सब कुछ चुरा लिया है और अब वह उन्हें अपने हृदय-रूपी कारागार में भक्तिरूपी बंधन से बाँधकर सदा के लिए रोक लेना चाहता है।

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श्री अमरनाथ अष्टकम् - Shree Amarnath Ashtakam
परिचय
श्री अमरनाथ अष्टकम् की रचना स्वामी वरदानन्द भारती ने की है। यह अष्टकम् हिमालय स्थित अमरनाथ ज्योतिर्लिंग में विराजमान भगवान शिव के दिव्य, करुणामय और सर्वव्यापक स्वरूप का वर्णन करता है। इसमें शिव के तपस्वी, लोकमंगलकारी और भक्तवत्सल रूप का अत्यंत सुंदर चित्रण है।
भावार्थ
इस अष्टकम् में साधक भगवान अमरनाथ से प्रार्थना करता है कि वे समस्त लोकों के कल्याण हेतु सदा उपस्थित रहने वाले, भक्तों के हृदय में वास करने वाले, और करुणा के सागर हैं। शिव ही जन्म-मृत्यु, भय और अज्ञान से रक्षा करने वाले परम आश्रय हैं।
अर्थ (संक्षिप्त व्याख्या)
अमरनाथ – अमरत्व के दाता शिव
भागीरथी सलिल – गंगाजल से युक्त जटाएँ
त्रिनेत्र – तीनों कालों के द्रष्टा
गिरिजासमेत – माता पार्वती सहित
भक्तकल्पतरु – भक्तों की कामनाएँ पूर्ण करने वाले
अद्वय प्रभु – एकमेव परब्रह्म

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श्री रंगनाथ अष्टकम - Shree Ranganatha Ashtakam
परिचय
श्री रङ्गनाथाष्टकम् भगवान श्रीरङ्गनाथ (भगवान विष्णु के शयन मुद्रा स्वरूप) की दिव्य स्तुति है। इसमें भगवान के आनन्दरूप, ब्रह्मस्वरूप, योगनिद्रा, क्षीरसागरशायी तथा भक्तवत्सल स्वरूप का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया गया है। यह अष्टकम विशेष रूप से भक्ति, शांति और मोक्ष की प्राप्ति हेतु पाठ किया जाता है।
भावार्थ
इस अष्टकम में भक्त अपने मन को श्रीरंगनाथ के दिव्य स्वरूप में रमाने की प्रार्थना करता है। वे कावेरी तट पर विराजमान, लक्ष्मीजी के निवास, योगनिद्रा में स्थित तथा क्षीरसागर में शयन करने वाले हैं। ब्रह्मा, व्यास, सनकादि मुनि भी जिनकी वंदना करते हैं, ऐसे श्रीरंगराज भक्तों के हृदय में निवास करते हैं। जो उनका स्मरण करता है, उसे सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति तथा अंततः परम पद की प्राप्ति होती है।

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श्री बिमला देवी अष्टकम - Shree Bimala Devi Ashtakam
परिचय
श्री बिमला देवी अष्टकम देवी विमला की स्तुति है, जो जगन्नाथ धाम की अधिष्ठात्री शक्ति मानी जाती हैं। वे आदिशक्ति, त्रिपुरा, महेश्वरी तथा करुणामयी माता के रूप में भक्तों की रक्षा करती हैं। यह अष्टकम उनकी कृपा, संरक्षण और आध्यात्मिक उन्नति के लिए पाठ किया जाता है।
भावार्थ
इस अष्टकम में देवी विमला को समस्त मंगलों की दात्री, दारिद्र्य और भय का नाश करने वाली, ज्ञान और शांति प्रदान करने वाली बताया गया है। वे भक्तों के दुःखों को दूर कर सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक कल्याण देती हैं। जो भक्त श्रद्धा से उनका स्मरण करता है, उसे देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
फल
इस अष्टकम का श्रद्धापूर्वक नित्य पाठ करने से दारिद्र्य, भय और संकटों का नाश होता है। भक्त को ज्ञान, शांति, धर्म, श्रद्धा और समृद्धि प्राप्त होती है।

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श्री शिवनामावल्यष्टकम् - Shree Shiv Naamavali Astakam
परिचय
श्री शिवनामावल्य अष्टकम् भगवान शिव के अनेक दिव्य नामों का स्तवन है। इसमें शिव के विभिन्न स्वरूपों — चन्द्रचूड़, नीलकण्ठ, विश्वनाथ, पशुपति, मृत्युंजय आदि — का स्मरण करते हुए संसार रूपी दुःख से रक्षा की प्रार्थना की गई है। यह स्तोत्र विशेष रूप से भय, संकट और दारिद्र्य निवारण के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है।
भावार्थ
इस अष्टकम में भक्त भगवान शिव के विभिन्न नामों का उच्चारण करते हुए उनसे प्रार्थना करता है कि वे संसार के दुःख, भय और क्लेश से उसकी रक्षा करें। शिव को करुणामय, दीनबन्धु, त्रिनेत्रधारी, कैलासवासी और गंगाधर रूप में वर्णित किया गया है। वे शरणागतों की रक्षा करने वाले और दारिद्र्य व दुःख को नष्ट करने वाले हैं।
फल
जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस शिवनामावल्य अष्टकम् का नित्य पाठ करता है, उसके जीवन के कष्ट, भय और बाधाएँ दूर होती हैं। उसे मानसिक शांति, साहस और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।

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लिङ्गाष्टकम् - Lingashtakam
परिचय
“लिङ्गाष्टकम्” भगवान शिव की महिमा का वर्णन करने वाला एक प्रसिद्ध स्तोत्र है। इसमें शिवलिंग के दिव्य स्वरूप, उसकी पवित्रता और भक्तों के कल्याणकारी प्रभाव का गुणगान किया गया है। यह स्तोत्र विशेष रूप से शिवरात्रि, श्रावण मास, प्रदोष व्रत तथा दैनिक शिव पूजन में श्रद्धा से पाठ किया जाता है।
भावार्थ
इस स्तोत्र में शिवलिंग को सृष्टि का कारण, पापों का नाश करने वाला, बुद्धि और कल्याण प्रदान करने वाला बताया गया है। प्रत्येक श्लोक में शिवलिंग के विभिन्न दिव्य गुणों का वर्णन है — जैसे ब्रह्मा और विष्णु द्वारा पूजित, रावण के अहंकार का विनाश करने वाला, दक्ष यज्ञ का संहारक और भक्तों के कष्टों का हरण करने वाला। अंत में कहा गया है कि जो व्यक्ति श्रद्धा से शिव के समीप बैठकर इस लिङ्गाष्टकम् का पाठ करता है, वह शिवलोक को प्राप्त करता है और भगवान शिव के साथ आनंदित होता है।
पाठ का फल
जो श्रद्धा और भक्ति से लिङ्गाष्टकम् का नियमित पाठ करता है, उसके पाप नष्ट होते हैं, दरिद्रता दूर होती है और अंततः शिव कृपा से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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श्री वैद्यनाथ अष्टकम - Shree Vaidyanath Ashtakam
परिचय
श्री वैद्यनाथ अष्टकम भगवान शिव के वैद्यनाथ स्वरूप की स्तुति है। इसमें शिव को समस्त रोगों के नाशक, करुणामय, त्रिलोचन, त्रिपुरान्तक तथा भक्तप्रिय बताया गया है। यह अष्टकम विशेष रूप से शारीरिक एवं मानसिक रोगों से मुक्ति और आयु, आरोग्य एवं सौभाग्य की प्राप्ति के लिए पाठ किया जाता है।
भावार्थ
इस अष्टकम में भगवान शिव के उस स्वरूप का वर्णन है जो संसार रूपी भवरोग के वैद्य हैं। वे गंगाधर, नीलकण्ठ, त्रिनेत्रधारी और त्रिपुरासुर के संहारक हैं। वे दुष्टों का नाश करने वाले तथा भक्तों पर कृपा करने वाले हैं। वे समस्त रोगों का नाश करते हैं और अंध, बहरे, लंगड़े अथवा रोगग्रस्त प्राणियों को भी सुख प्रदान करते हैं। जो उनके शरण में आता है, उसे आरोग्य, संतति, सौभाग्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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श्री भवानी अष्टकम् - Shree Bhavani Ashtakam
परिचय
भवानी अष्टकम् की रचना आदि शंकराचार्य ने की है। यह अष्टकम् माँ भवानी / आदिशक्ति के प्रति पूर्ण शरणागति का भाव प्रकट करता है। साधक स्वीकार करता है कि संसार में कोई भी स्थायी सहारा नहीं है — एकमात्र आश्रय माँ भवानी ही हैं।
भावार्थ
यह अष्टकम् बताता है कि जब सभी संबंध, ज्ञान, कर्म और साधन असहाय प्रतीत हों, तब भी माँ भवानी जीव की एकमात्र गति हैं। वह हर संकट, भय, पाप और दुःख से रक्षा करने वाली करुणामयी शक्ति हैं।
अर्थ (संक्षिप्त व्याख्या)
गतिस्त्वं – मेरी एकमात्र शरण
भवाब्धि – संसार रूपी सागर
कुसंसार पाश – मोह और बंधन
शरण्ये – शरण देने वाली
आदिशक्ति – समस्त शक्तियों की मूल

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श्री गोपीजन वल्लभाष्टकम - Shree Gopijan Vallabhashtakam
परिचय
श्री गोपीजनवल्लभ अष्टकम भगवान श्रीकृष्ण के उस मधुर स्वरूप की स्तुति है, जो गोपियों के प्रिय, भक्तों के जीवनाधार और लीला पुरुषोत्तम हैं। इसमें उनके बालरूप, गोपाल लीलाएँ, कंस वध तथा भक्तों पर कृपा का सुंदर वर्णन है।
भावार्थ
इस अष्टकम में भगवान श्रीकृष्ण के कमलनयन, करुणामय और मधुर हास्ययुक्त स्वरूप का वंदन किया गया है। वे बकासुर और कंस जैसे दैत्यों का संहार करने वाले हैं तथा गोप-बालकों के जीवन के आधार हैं। वे यमुना तट पर क्रीड़ा करने वाले, पीताम्बरधारी, मनोहर किशोर रूपधारी हैं। वे भक्तों के लिए सहज प्राप्त होने वाले और समस्त शुभ लक्षणों से युक्त परम पुरुष हैं। देवकीनन्दन श्रीकृष्ण शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करने वाले चतुर्भुज रूप में भी भक्तों की रक्षा करते हैं।
फल
जो श्रद्धा और भक्ति से इस गोपीजनवल्लभ अष्टकम का नित्य पाठ करता है, उसे भगवान श्रीकृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त होती है। उसके जीवन में भक्ति, आनंद, प्रेम और आध्यात्मिक उन्नति का विकास होता है।

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श्री पार्वतीवल्लभ अष्टकम् - Shree Parvati Vallabham Ashtakam
परिचय
श्री पार्वतीवल्लभ अष्टकम् भगवान शिव की स्तुति है, जिसमें उन्हें पार्वती के प्रिय, नीलकण्ठ, भूतनाथ और महेश्वर के रूप में वंदन किया गया है। इस अष्टकम में शिव के वैराग्य, करुणा, तत्त्वज्ञान और भक्तरक्षक स्वरूप का वर्णन है। यह स्तोत्र विशेष रूप से कष्ट निवारण और शिवभक्ति की दृढ़ता के लिए पाठ किया जाता है।
भावार्थ
इस अष्टकम में भगवान शिव के दिव्य और विरक्त स्वरूप का ध्यान किया गया है। वे श्मशानवासी, भस्मधारी, नागाभूषणधारी तथा त्रिनेत्रधारी हैं। वे भक्तों के रक्षक, कष्टों के नाशक और दीनों पर कृपा करने वाले हैं। जो श्रद्धा से उनका स्मरण करता है, उसे भय और दुःख से मुक्ति प्राप्त होती है।
फल
इस अष्टकम का नित्य श्रद्धापूर्वक पाठ करने से कष्ट, भय और संकट दूर होते हैं। भक्त को शिवकृपा, आंतरिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

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श्रीकालिकाष्टकम् - Shree Kali Ashtakam
परिचय
यह माँ काली का अत्यंत गूढ़ एवं तांत्रिक भाव से युक्त अष्टकम् है, जिसमें उनके उग्र तथा करुणामयी दोनों दिव्य स्वरूपों का वर्णन किया गया है। इसमें माँ के श्मशानवासी, महाकाल-सहचरी और जगन्मोहिनी रूप का प्रभावशाली चित्रण मिलता है। यह स्तोत्र विशेष रूप से काली पूजा, दीपावली की रात्रि, नवरात्रि तथा तांत्रिक साधना में श्रद्धा एवं भक्ति के साथ पाठ किया जाता है।
भावार्थ
इस अष्टकम् में माँ काली के उग्र स्वरूप का वर्णन है — गले में मुंडमाला, रक्ताभ जिह्वा, श्मशान में निवास और महाकाल के साथ अद्वैत एकत्व। उनका यह रूप संसार के भय, अज्ञान और अधर्म के विनाश का प्रतीक है। साथ ही, उन्हें भक्तों पर असीम कृपा करने वाली, इच्छाओं को पूर्ण करने वाली तथा मोक्ष प्रदान करने वाली आदिशक्ति बताया गया है। देवता भी उनके वास्तविक स्वरूप को पूर्णतः नहीं जान पाते — वे अनादि, अनन्त और परम रहस्यमयी हैं। अंत में कहा गया है कि जो साधक श्रद्धा और ध्यानपूर्वक इस अष्टकम् का पाठ करता है, उसे सिद्धियाँ, सफलता तथा अंततः मुक्ति की प्राप्ति होती है।

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अच्युताष्टकं - Achyutashtakam
परिचय
श्री अच्युताष्टकम् भगवान विष्णु एवं श्रीकृष्ण के विविध नामों और दिव्य लीलाओं का मधुर स्तवन है। इसमें अच्युत, केशव, माधव, गोविन्द, राम, नारायण आदि नामों के माध्यम से भगवान के अनेक अवतारों और स्वरूपों का स्मरण किया गया है। यह अष्टकम भक्ति, प्रेम और ईश्वर-स्मरण को दृढ़ करने वाला है।
भावार्थ
इस अष्टकम में भक्त भगवान के अनेक नामों का कीर्तन करते हुए उनके राम और कृष्ण दोनों रूपों का वंदन करता है। वे सीतापति राम के रूप में दुष्टों का विनाश करते हैं तथा कृष्ण रूप में कंस, केशी और पूतना का संहार करते हैं। वे गोपिकाओं के प्रिय, द्रौपदी के रक्षक, भक्तवत्सल और करुणामय हैं। भक्त उनके सौन्दर्य, श्यामल रूप, पीताम्बर और अलंकारों का ध्यान करता है और उनसे सदैव रक्षा की प्रार्थना करता है।
फल
जो भक्त प्रेमपूर्वक प्रतिदिन श्री अच्युताष्टकम् का पाठ करता है, उसकी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। भगवान हरि शीघ्र ही उस भक्त के वश में होकर उसे अपनी कृपा और प्रेम प्रदान करते हैं।

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श्री बालकृष्ण अष्टकम् - Shree Bala Krishna Ashtakam
परिचय
यह बालकृष्ण अष्टकम् भगवान श्रीकृष्ण के बाल-लीलामय, करुणामय और मोहक स्वरूप का स्तवन है। इसमें कुचेल-पालन, गोपाल-लीलाएँ, माखन-चोरी का माधुर्य और वेणुनाद की रमणीयता का भावपूर्ण वर्णन है।
भावार्थ
भक्त बालकृष्ण को शरण लेता है—जो नीलवर्ण, मंदहास्य, करुणासागर और सर्वरक्षक हैं। उनके स्मरण से मन शुद्ध होता है, भय-क्लेश मिटते हैं और जीवन में सौभाग्य, शांति व भक्ति का उदय होता है।
अर्थ (संक्षिप्त व्याख्या)
बाल जार चोर – बालकृष्ण की माखन-चोरी लीला
वेणुनाद – बाँसुरी का मधुर नाद
गोपाल – ग्वालबालों के स्वामी
निरञ्जन – निर्विकार, पवित्र
विष्णुलोक – परम पद/मोक्ष

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श्री नृसिंहाष्टकम्- Shree Narasimha Ashtakam
परिचय
श्री नरसिंह अष्टकम् भगवान नृसिंह (श्रीहरि विष्णु का उग्र-करुणामय अवतार) की स्तुति में रचित अष्टकम् है। इसमें भगवान के रक्षक, भक्तवत्सल, पापविनाशक और मोक्षदाता स्वरूप का अत्यंत प्रभावशाली वर्णन किया गया है।
भावार्थ
यह अष्टकम् बताता है कि भगवान नरसिंह अपने भक्तों की रक्षा हेतु किसी भी सीमा तक जाते हैं। वे पापों का नाश करने वाले, भय हरने वाले और संसार सागर से पार लगाने वाले हैं। संकट, रोग, भय और मृत्यु के समय उनका स्मरण परम कल्याणकारी है।
अर्थ (संक्षिप्त व्याख्या)
नरसिंह – आधा सिंह, आधा मनुष्य, भक्त रक्षक
भवाम्बुधि – संसार रूपी सागर
तुङ्गनख – तीक्ष्ण नख
शरण्य – शरण देने वाले
कामद – भक्तों की कामनाएँ पूर्ण करने वाले
पातकभयघ्न – पाप और भय का नाश करने वाले

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अधरं मधुरं मधुराष्टकं - Adharam Madhuram Madhurashtakam
परिचय
अधरं मधुरं स्तोत्रम् भगवान श्रीकृष्ण की माधुर्य-लीला का अत्यंत सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है। इसमें श्रीकृष्ण के स्वरूप, वाणी, नेत्र, हास्य, चाल, लीला, वंशी, यमुना, गोपियों और सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त उनके मधुर भाव का वर्णन किया गया है। यह स्तोत्र भक्ति रस से परिपूर्ण है और मन को प्रेम, शांति और आनंद से भर देता है।
भावार्थ
इस स्तोत्र में यह बताया गया है कि भगवान श्रीकृष्ण का हर अंग, हर क्रिया और हर लीला मधुर है।
उनके अधर, मुख, नेत्र, हास्य, वाणी, चाल, वस्त्र, आचरण, संगीत, नृत्य, विश्राम, रूप, अलंकार—सब कुछ मधुर है।
यमुना का जल, कमल, गोपियाँ, माला, वंशी, मित्रता और प्रेम—सब श्रीकृष्ण के सान्निध्य से मधुर बन जाते हैं।
भाव यह है कि जो भी श्रीकृष्ण से जुड़ जाता है, वह स्वयं भी माधुर्य से भर उठता है।
पाठ का फल
अधरं मधुरं स्तोत्र का श्रद्धा से पाठ करने से निम्न फल प्राप्त होते हैं:
मन में प्रेम, शांति और भक्ति भाव की वृद्धि होती है
मानसिक तनाव, चिंता और नकारात्मक भाव दूर होते हैं
हृदय में कृष्ण प्रेम और वैराग्य का उदय होता है
गृहस्थ जीवन में मधुरता और सौहार्द बढ़ता है
भक्त को श्रीकृष्ण की अनुकंपा और कृपा प्राप्त होती है
ध्यान, जप और साधना में मन शीघ्र एकाग्र होता है

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श्री रामाष्टकम् - Shree Ram Ashtakam
परिचय
श्री रामाष्टकम् की रचना महर्षि वेदव्यास द्वारा की गई है। यह अष्टकम् भगवान श्रीराम के सगुण-निर्गुण, ब्रह्मस्वरूप और करुणामय तत्व का अद्भुत वर्णन करता है। इसमें श्रीराम को परब्रह्म, गुरु, तारक और मोक्षदाता के रूप में स्वीकार किया गया है।
भावार्थ
यह अष्टकम् बताता है कि श्रीराम केवल अयोध्या के राजा नहीं, बल्कि परम सत्य और अद्वैत ब्रह्म हैं। उनका स्मरण समस्त पापों का नाश करता है, भय दूर करता है और अंततः जीव को मोक्ष प्रदान करता है।
अर्थ (संक्षिप्त व्याख्या)
राममद्वयम् – अद्वैत ब्रह्म स्वरूप राम
समस्तपापखण्डनम् – सभी पापों का नाश
भवाब्धि पोत – संसार सागर से पार कराने वाली नौका
महावाक्यबोधक – उपनिषदों द्वारा प्रतिपादित ब्रह्म
भवच्छिदम् – जन्म-मरण से मुक्ति देने वाले

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श्री जगन्नाथाष्टकम् - Shree Jagannatha Ashtakam
जगन्नाथाष्टकम् – भजन का परिचय
जगन्नाथाष्टकम् आदि शंकराचार्य जी द्वारा रचित एक अत्यंत पावन और प्रभावशाली स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) की करुणा, सौंदर्य, माधुर्य और सर्वव्यापकता का सुंदर वर्णन करता है।
इस स्तोत्र में भगवान जगन्नाथ को वृन्दावन-विहारी, नीलाचल-निवासी, रथयात्रा में विराजमान और समस्त देवताओं द्वारा पूजित स्वरूप में नमन किया गया है। हर श्लोक के अंत में भक्त यही प्रार्थना करता है कि प्रभु जगन्नाथ सदा उसकी दृष्टि और हृदय में विराजमान रहें।
जगन्नाथाष्टकम् का भावार्थ
इस स्तोत्र का मूल भाव यह है कि भक्त को न राज्य चाहिए, न धन, न सांसारिक सुख, बल्कि केवल भगवान जगन्नाथ के दर्शन और उनकी शरण चाहिए।
भगवान को यहाँ करुणा-सागर, दया-सिंधु, पापों का नाश करने वाला और दीन-हीन के एकमात्र सहायक के रूप में स्वीकार किया गया है।
रथ पर आरूढ़ भगवान जगन्नाथ जब भक्तों की स्तुतियाँ सुनते हैं, तब वे अत्यंत करुणामय हो जाते हैं। कवि यह भाव प्रकट करता है कि संसार असार है और केवल प्रभु के चरणों में ही सच्चा आश्रय है।
यह स्तोत्र वैराग्य, भक्ति और पूर्ण शरणागति का संदेश देता है।
यह स्तोत्र कब और कहाँ पढ़ा जाता है
जगन्नाथाष्टकम् का पाठ विशेष रूप से
पुरी जगन्नाथ मंदिर
रथयात्रा महोत्सव
एकादशी, जन्माष्टमी
प्रातःकालीन साधना और संध्या भजन
के समय किया जाता है।
इस्कॉन मंदिरों और वैष्णव परंपरा में यह स्तोत्र अत्यंत श्रद्धा से गाया और पढ़ा जाता है।
जगन्नाथाष्टकम् की महिमा (फलश्रुति भाव)
ऐसा माना गया है कि जो भक्त श्रद्धा और पवित्रता के साथ जगन्नाथाष्टकम् का नियमित पाठ करता है, उसके पाप नष्ट होते हैं, मन शुद्ध होता है और अंततः वह भगवान विष्णु के धाम को प्राप्त करता है।

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गुरु अष्टकम् - Guru Ashtakam
परिचय
श्री गुरु अष्टकम् वैष्णव परंपरा का अत्यंत पावन स्तोत्र है, जिसकी रचना श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने की थी। यह स्तुति सद्गुरु को भगवान श्रीकृष्ण की कृपा का साक्षात् माध्यम मानते हुए उनके श्रीचरणों में पूर्ण शरणागति का भाव प्रकट करती है। इसमें गुरु को अज्ञानरूपी अग्नि से संसार को बचाने वाला, भक्ति का मार्ग दिखाने वाला और राधा-कृष्ण प्रेम का दाता बताया गया है।
भावार्थ
इस स्तुति का भाव यह है कि सद्गुरु की कृपा से ही जीव संसाररूपी दावानल से मुक्त होकर भक्ति के मार्ग पर अग्रसर होता है। गुरु न केवल शास्त्रज्ञान प्रदान करते हैं, बल्कि अपने आचरण, सेवा और प्रेम के द्वारा भक्त को राधा-कृष्ण की मधुर लीलाओं से जोड़ते हैं। गुरु की प्रसन्नता से ही भगवान की प्रसन्नता प्राप्त होती है, और उनकी कृपा के बिना मोक्ष या भक्ति की सिद्धि संभव नहीं है।

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श्री षड् गोस्वामी अष्टकम् - Shree Sadgoswami Astakam
षड् गोस्वामी अष्टकम् वैष्णव परंपरा का एक अत्यंत पूज्य अष्टकम् है, जिसमें श्री रूप गोस्वामी, श्री सनातन गोस्वामी, श्री रघुनाथ भट्ट गोस्वामी, श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, श्री जीव गोस्वामी और श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी — इन छह महान संतों की दिव्य भक्ति, त्याग, विद्वत्ता और श्री राधा-कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम का वर्णन किया गया है। यह अष्टकम् श्री चैतन्य महाप्रभु की भक्ति-धारा का सार प्रस्तुत करता है।
भावार्थ (संक्षेप)
इस अष्टकम् का केंद्रीय भाव यह है कि षड् गोस्वामीजन पूर्ण वैराग्य को धारण कर, सांसारिक वैभव त्यागकर, केवल श्री राधा-कृष्ण की प्रेममयी भक्ति में निरंतर लीन रहे। वे नाम-संकीर्तन, नृत्य, गायन और शास्त्र-चिंतन में रत रहकर जीवों के कल्याण हेतु भक्ति-मार्ग की स्थापना करते हैं। वृंदावन में निवास कर वे राधा-कृष्ण की लीलाओं का निरंतर स्मरण करते हुए प्रेमोन्माद की अवस्था में विचरण करते हैं और समस्त संसार को भक्ति का अमृत प्रदान करते हैं।