श्री अमरनाथ अष्टकम् - Shree Amarnath Ashtakam

श्री अमरनाथ अष्टकम् की रचना स्वामी वरदानन्द भारती ने की है। यह अष्टकम् हिमालय स्थित अमरनाथ ज्योतिर्लिंग में विराजमान भगवान शिव के दिव्य, करुणामय और सर्वव्यापक स्वरूप का वर्णन करता है। इसमें शिव के तपस्वी, लोकमंगलकारी और भक्तवत्सल रूप का अत्यंत सुंदर चित्रण है।

भागीरथीसलिलसान्द्रजटाकलापम्, शीतांशुकान्तिरमणीयविशालभालम्
कर्पूरदुग्धहिमहंसनिभं स्वतोजं, नित्यं भजाम्यमरनाथमहं दयालुम् ॥१॥

गौरीपतिं पशुपतिं वरदं त्रिनेत्रं, भूताधिपं सकललोकपतिं सुरेशम्
शार्दूलचर्मचितिभस्मविभूषिताङ्गं, नित्यं भजाम्यमरनाथमहं दयालुम् ॥२॥

गन्धर्वयक्षरसुरकिन्नरसिद्धसङ्घैः, संस्तूयमानमनिशं श्रुतिपूतमन्त्रैः
सर्वत्रसर्वहृदयैकनिवासिनं तं, नित्यं भजाम्यमरनाथमहं दयालुम् ॥३॥

व्योमानिलानलजलावनिसोमसूर्य, होत्रीभिरष्टतनुभिर्जगदेकनाथः
यस्तिष्ठतीह जनमङ्गलधारणाय, तं प्रार्थयाम्यमरनाथमहं दयालुम् ॥४॥

शैलेन्द्रतुङ्गशिखरे गिरिजासमेतं, प्रालेयदुर्गमगुहासु सदा वसन्तम्
श्रीमद्गजाननविराजितदक्षिणाङ्कं, नित्यं भजाम्यमरनाथमहं दयालुम् ॥५॥

वाग्बुद्धिचित्तकरणैश्च तपोभिरुग्रैः, शक्यं समाकलयितुं न यदीयरूपम्
तं भक्तिभावसुलभं शरणं नतानां, नित्यं भजाम्यमरनाथमहं दयालुम् ॥६॥

आद्यन्तहीनमखिलाधिपतिं गिरीशं, भक्तप्रियं हितकरं प्रभुमद्वयैकम्
सृष्टिस्थितिप्रलयलीलमनन्तशक्तिं, नित्यं भजाम्यमरनाथमहं दयालुम् ॥७॥

हे पार्वतीश वृषभध्वज शूलपाणे, हे नीलकण्ठ मदनान्तक शुभ्रमूर्ते
हे भक्तकल्पतरुरूप सुखैकसिन्धो, मां पाहि पाहि भवतोऽमरनाथ नित्यम् ॥८॥

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भक्ति रस के और अष्टकम् - AshtakamMore Bhajans

श्री नारायण कवच - Shree Narayan Kavach
श्री नारायण कवच - Shree Narayan Kavach

परिचय श्री नारायण कवच भगवान विष्णु की दिव्य रक्षात्मक स्तुति है, जिसका वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण के षष्ठ स्कंध में प्राप्त होता है। यह पावन कवच देवताओं के गुरु विश्वरूप द्वारा देवराज इन्द्र को बताया गया था, जब असुरों के भय से देवता अत्यंत चिंतित हो गए थे। इस स्तोत्र में भगवान श्रीहरि के विभिन्न अवतारों — जैसे मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, राम और कृष्ण — का स्मरण करके साधक अपनी रक्षा की प्रार्थना करता है। नारायण कवच केवल एक स्तोत्र नहीं बल्कि भगवान विष्णु की शरणागति, विश्वास और दिव्य संरक्षण का अद्भुत मंत्र है। ऐसा माना जाता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक इसका पाठ करने से भय, रोग, शत्रु बाधा, नकारात्मक शक्तियों और जीवन के अनेक संकटों से रक्षा प्राप्त होती है। यह कवच भक्त के भीतर साहस, आत्मबल और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास का संचार करता है। भावार्थ इस पवित्र स्तोत्र में भक्त भगवान नारायण से प्रार्थना करता है कि वे अपने दिव्य स्वरूप और विभिन्न अवतारों के माध्यम से उसकी हर दिशा में रक्षा करें। भक्त अपने शरीर, मन, बुद्धि और प्राणों को भगवान को समर्पित करते हुए उनसे निवेदन करता है कि वे उसे जल, स्थल, आकाश, वन, युद्ध, रोग, भय, शत्रु, ग्रह दोष और अदृश्य संकटों से सुरक्षित रखें। नारायण कवच का मुख्य संदेश यह है कि जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा से भगवान विष्णु का स्मरण करता है, उसके जीवन के सभी भय और बाधाएँ धीरे-धीरे समाप्त हो जाती हैं। यह स्तोत्र सिखाता है कि संसार में चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियाँ क्यों न आ जाएँ, यदि मनुष्य भगवान की शरण में रहता है तो उसे दिव्य संरक्षण अवश्य प्राप्त होता है। भगवान के नाम, उनके अस्त्र-शस्त्र और उनके अवतारों का स्मरण साधक के जीवन में आध्यात्मिक शक्ति, मानसिक शांति और आत्मविश्वास प्रदान करता है।

श्री रंगनाथ अष्टकम - Shree Ranganatha Ashtakam
श्री रंगनाथ अष्टकम - Shree Ranganatha Ashtakam

परिचय श्री रङ्गनाथाष्टकम् भगवान श्रीरङ्गनाथ (भगवान विष्णु के शयन मुद्रा स्वरूप) की दिव्य स्तुति है। इसमें भगवान के आनन्दरूप, ब्रह्मस्वरूप, योगनिद्रा, क्षीरसागरशायी तथा भक्तवत्सल स्वरूप का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया गया है। यह अष्टकम विशेष रूप से भक्ति, शांति और मोक्ष की प्राप्ति हेतु पाठ किया जाता है। भावार्थ इस अष्टकम में भक्त अपने मन को श्रीरंगनाथ के दिव्य स्वरूप में रमाने की प्रार्थना करता है। वे कावेरी तट पर विराजमान, लक्ष्मीजी के निवास, योगनिद्रा में स्थित तथा क्षीरसागर में शयन करने वाले हैं। ब्रह्मा, व्यास, सनकादि मुनि भी जिनकी वंदना करते हैं, ऐसे श्रीरंगराज भक्तों के हृदय में निवास करते हैं। जो उनका स्मरण करता है, उसे सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति तथा अंततः परम पद की प्राप्ति होती है।

श्री बिमला देवी अष्टकम - Shree Bimala Devi Ashtakam
श्री बिमला देवी अष्टकम - Shree Bimala Devi Ashtakam

परिचय श्री बिमला देवी अष्टकम देवी विमला की स्तुति है, जो जगन्नाथ धाम की अधिष्ठात्री शक्ति मानी जाती हैं। वे आदिशक्ति, त्रिपुरा, महेश्वरी तथा करुणामयी माता के रूप में भक्तों की रक्षा करती हैं। यह अष्टकम उनकी कृपा, संरक्षण और आध्यात्मिक उन्नति के लिए पाठ किया जाता है। भावार्थ इस अष्टकम में देवी विमला को समस्त मंगलों की दात्री, दारिद्र्य और भय का नाश करने वाली, ज्ञान और शांति प्रदान करने वाली बताया गया है। वे भक्तों के दुःखों को दूर कर सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक कल्याण देती हैं। जो भक्त श्रद्धा से उनका स्मरण करता है, उसे देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। फल इस अष्टकम का श्रद्धापूर्वक नित्य पाठ करने से दारिद्र्य, भय और संकटों का नाश होता है। भक्त को ज्ञान, शांति, धर्म, श्रद्धा और समृद्धि प्राप्त होती है।

श्री शिवनामावल्यष्टकम् - Shree Shiv Naamavali Astakam
श्री शिवनामावल्यष्टकम् - Shree Shiv Naamavali Astakam

परिचय श्री शिवनामावल्य अष्टकम् भगवान शिव के अनेक दिव्य नामों का स्तवन है। इसमें शिव के विभिन्न स्वरूपों — चन्द्रचूड़, नीलकण्ठ, विश्वनाथ, पशुपति, मृत्युंजय आदि — का स्मरण करते हुए संसार रूपी दुःख से रक्षा की प्रार्थना की गई है। यह स्तोत्र विशेष रूप से भय, संकट और दारिद्र्य निवारण के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। भावार्थ इस अष्टकम में भक्त भगवान शिव के विभिन्न नामों का उच्चारण करते हुए उनसे प्रार्थना करता है कि वे संसार के दुःख, भय और क्लेश से उसकी रक्षा करें। शिव को करुणामय, दीनबन्धु, त्रिनेत्रधारी, कैलासवासी और गंगाधर रूप में वर्णित किया गया है। वे शरणागतों की रक्षा करने वाले और दारिद्र्य व दुःख को नष्ट करने वाले हैं। फल जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस शिवनामावल्य अष्टकम् का नित्य पाठ करता है, उसके जीवन के कष्ट, भय और बाधाएँ दूर होती हैं। उसे मानसिक शांति, साहस और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।

लिङ्गाष्टकम् - Lingashtakam
लिङ्गाष्टकम् - Lingashtakam

परिचय “लिङ्गाष्टकम्” भगवान शिव की महिमा का वर्णन करने वाला एक प्रसिद्ध स्तोत्र है। इसमें शिवलिंग के दिव्य स्वरूप, उसकी पवित्रता और भक्तों के कल्याणकारी प्रभाव का गुणगान किया गया है। यह स्तोत्र विशेष रूप से शिवरात्रि, श्रावण मास, प्रदोष व्रत तथा दैनिक शिव पूजन में श्रद्धा से पाठ किया जाता है। भावार्थ इस स्तोत्र में शिवलिंग को सृष्टि का कारण, पापों का नाश करने वाला, बुद्धि और कल्याण प्रदान करने वाला बताया गया है। प्रत्येक श्लोक में शिवलिंग के विभिन्न दिव्य गुणों का वर्णन है — जैसे ब्रह्मा और विष्णु द्वारा पूजित, रावण के अहंकार का विनाश करने वाला, दक्ष यज्ञ का संहारक और भक्तों के कष्टों का हरण करने वाला। अंत में कहा गया है कि जो व्यक्ति श्रद्धा से शिव के समीप बैठकर इस लिङ्गाष्टकम् का पाठ करता है, वह शिवलोक को प्राप्त करता है और भगवान शिव के साथ आनंदित होता है। पाठ का फल जो श्रद्धा और भक्ति से लिङ्गाष्टकम् का नियमित पाठ करता है, उसके पाप नष्ट होते हैं, दरिद्रता दूर होती है और अंततः शिव कृपा से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

श्री वैद्यनाथ अष्टकम - Shree Vaidyanath Ashtakam
श्री वैद्यनाथ अष्टकम - Shree Vaidyanath Ashtakam

परिचय श्री वैद्यनाथ अष्टकम भगवान शिव के वैद्यनाथ स्वरूप की स्तुति है। इसमें शिव को समस्त रोगों के नाशक, करुणामय, त्रिलोचन, त्रिपुरान्तक तथा भक्तप्रिय बताया गया है। यह अष्टकम विशेष रूप से शारीरिक एवं मानसिक रोगों से मुक्ति और आयु, आरोग्य एवं सौभाग्य की प्राप्ति के लिए पाठ किया जाता है। भावार्थ इस अष्टकम में भगवान शिव के उस स्वरूप का वर्णन है जो संसार रूपी भवरोग के वैद्य हैं। वे गंगाधर, नीलकण्ठ, त्रिनेत्रधारी और त्रिपुरासुर के संहारक हैं। वे दुष्टों का नाश करने वाले तथा भक्तों पर कृपा करने वाले हैं। वे समस्त रोगों का नाश करते हैं और अंध, बहरे, लंगड़े अथवा रोगग्रस्त प्राणियों को भी सुख प्रदान करते हैं। जो उनके शरण में आता है, उसे आरोग्य, संतति, सौभाग्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

श्री भवानी अष्टकम् - Shree Bhavani Ashtakam
श्री भवानी अष्टकम् - Shree Bhavani Ashtakam

परिचय भवानी अष्टकम् की रचना आदि शंकराचार्य ने की है। यह अष्टकम् माँ भवानी / आदिशक्ति के प्रति पूर्ण शरणागति का भाव प्रकट करता है। साधक स्वीकार करता है कि संसार में कोई भी स्थायी सहारा नहीं है — एकमात्र आश्रय माँ भवानी ही हैं। भावार्थ यह अष्टकम् बताता है कि जब सभी संबंध, ज्ञान, कर्म और साधन असहाय प्रतीत हों, तब भी माँ भवानी जीव की एकमात्र गति हैं। वह हर संकट, भय, पाप और दुःख से रक्षा करने वाली करुणामयी शक्ति हैं। अर्थ (संक्षिप्त व्याख्या) गतिस्त्वं – मेरी एकमात्र शरण भवाब्धि – संसार रूपी सागर कुसंसार पाश – मोह और बंधन शरण्ये – शरण देने वाली आदिशक्ति – समस्त शक्तियों की मूल

श्री गोपीजन वल्लभाष्टकम - Shree Gopijan Vallabhashtakam
श्री गोपीजन वल्लभाष्टकम - Shree Gopijan Vallabhashtakam

परिचय श्री गोपीजनवल्लभ अष्टकम भगवान श्रीकृष्ण के उस मधुर स्वरूप की स्तुति है, जो गोपियों के प्रिय, भक्तों के जीवनाधार और लीला पुरुषोत्तम हैं। इसमें उनके बालरूप, गोपाल लीलाएँ, कंस वध तथा भक्तों पर कृपा का सुंदर वर्णन है। भावार्थ इस अष्टकम में भगवान श्रीकृष्ण के कमलनयन, करुणामय और मधुर हास्ययुक्त स्वरूप का वंदन किया गया है। वे बकासुर और कंस जैसे दैत्यों का संहार करने वाले हैं तथा गोप-बालकों के जीवन के आधार हैं। वे यमुना तट पर क्रीड़ा करने वाले, पीताम्बरधारी, मनोहर किशोर रूपधारी हैं। वे भक्तों के लिए सहज प्राप्त होने वाले और समस्त शुभ लक्षणों से युक्त परम पुरुष हैं। देवकीनन्दन श्रीकृष्ण शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करने वाले चतुर्भुज रूप में भी भक्तों की रक्षा करते हैं। फल जो श्रद्धा और भक्ति से इस गोपीजनवल्लभ अष्टकम का नित्य पाठ करता है, उसे भगवान श्रीकृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त होती है। उसके जीवन में भक्ति, आनंद, प्रेम और आध्यात्मिक उन्नति का विकास होता है।

श्री पार्वतीवल्लभ अष्टकम् - Shree Parvati Vallabham Ashtakam
श्री पार्वतीवल्लभ अष्टकम् - Shree Parvati Vallabham Ashtakam

परिचय श्री पार्वतीवल्लभ अष्टकम् भगवान शिव की स्तुति है, जिसमें उन्हें पार्वती के प्रिय, नीलकण्ठ, भूतनाथ और महेश्वर के रूप में वंदन किया गया है। इस अष्टकम में शिव के वैराग्य, करुणा, तत्त्वज्ञान और भक्तरक्षक स्वरूप का वर्णन है। यह स्तोत्र विशेष रूप से कष्ट निवारण और शिवभक्ति की दृढ़ता के लिए पाठ किया जाता है। भावार्थ इस अष्टकम में भगवान शिव के दिव्य और विरक्त स्वरूप का ध्यान किया गया है। वे श्मशानवासी, भस्मधारी, नागाभूषणधारी तथा त्रिनेत्रधारी हैं। वे भक्तों के रक्षक, कष्टों के नाशक और दीनों पर कृपा करने वाले हैं। जो श्रद्धा से उनका स्मरण करता है, उसे भय और दुःख से मुक्ति प्राप्त होती है। फल इस अष्टकम का नित्य श्रद्धापूर्वक पाठ करने से कष्ट, भय और संकट दूर होते हैं। भक्त को शिवकृपा, आंतरिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

श्रीकालिकाष्टकम् - Shree Kali Ashtakam
श्रीकालिकाष्टकम् - Shree Kali Ashtakam

परिचय यह माँ काली का अत्यंत गूढ़ एवं तांत्रिक भाव से युक्त अष्टकम् है, जिसमें उनके उग्र तथा करुणामयी दोनों दिव्य स्वरूपों का वर्णन किया गया है। इसमें माँ के श्मशानवासी, महाकाल-सहचरी और जगन्मोहिनी रूप का प्रभावशाली चित्रण मिलता है। यह स्तोत्र विशेष रूप से काली पूजा, दीपावली की रात्रि, नवरात्रि तथा तांत्रिक साधना में श्रद्धा एवं भक्ति के साथ पाठ किया जाता है। भावार्थ इस अष्टकम् में माँ काली के उग्र स्वरूप का वर्णन है — गले में मुंडमाला, रक्ताभ जिह्वा, श्मशान में निवास और महाकाल के साथ अद्वैत एकत्व। उनका यह रूप संसार के भय, अज्ञान और अधर्म के विनाश का प्रतीक है। साथ ही, उन्हें भक्तों पर असीम कृपा करने वाली, इच्छाओं को पूर्ण करने वाली तथा मोक्ष प्रदान करने वाली आदिशक्ति बताया गया है। देवता भी उनके वास्तविक स्वरूप को पूर्णतः नहीं जान पाते — वे अनादि, अनन्त और परम रहस्यमयी हैं। अंत में कहा गया है कि जो साधक श्रद्धा और ध्यानपूर्वक इस अष्टकम् का पाठ करता है, उसे सिद्धियाँ, सफलता तथा अंततः मुक्ति की प्राप्ति होती है।