अष्टकम् - Ashtakam

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श्री नारायण कवच - Shree Narayan Kavach

श्री नारायण कवच - Shree Narayan Kavach

परिचय श्री नारायण कवच भगवान विष्णु की दिव्य रक्षात्मक स्तुति है, जिसका वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण के षष्ठ स्कंध में प्राप्त होता है। यह पावन कवच देवताओं के गुरु विश्वरूप द्वारा देवराज इन्द्र को बताया गया था, जब असुरों के भय से देवता अत्यंत चिंतित हो गए थे। इस स्तोत्र में भगवान श्रीहरि के विभिन्न अवतारों — जैसे मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, राम और कृष्ण — का स्मरण करके साधक अपनी रक्षा की प्रार्थना करता है। नारायण कवच केवल एक स्तोत्र नहीं बल्कि भगवान विष्णु की शरणागति, विश्वास और दिव्य संरक्षण का अद्भुत मंत्र है। ऐसा माना जाता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक इसका पाठ करने से भय, रोग, शत्रु बाधा, नकारात्मक शक्तियों और जीवन के अनेक संकटों से रक्षा प्राप्त होती है। यह कवच भक्त के भीतर साहस, आत्मबल और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास का संचार करता है। भावार्थ इस पवित्र स्तोत्र में भक्त भगवान नारायण से प्रार्थना करता है कि वे अपने दिव्य स्वरूप और विभिन्न अवतारों के माध्यम से उसकी हर दिशा में रक्षा करें। भक्त अपने शरीर, मन, बुद्धि और प्राणों को भगवान को समर्पित करते हुए उनसे निवेदन करता है कि वे उसे जल, स्थल, आकाश, वन, युद्ध, रोग, भय, शत्रु, ग्रह दोष और अदृश्य संकटों से सुरक्षित रखें। नारायण कवच का मुख्य संदेश यह है कि जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा से भगवान विष्णु का स्मरण करता है, उसके जीवन के सभी भय और बाधाएँ धीरे-धीरे समाप्त हो जाती हैं। यह स्तोत्र सिखाता है कि संसार में चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियाँ क्यों न आ जाएँ, यदि मनुष्य भगवान की शरण में रहता है तो उसे दिव्य संरक्षण अवश्य प्राप्त होता है। भगवान के नाम, उनके अस्त्र-शस्त्र और उनके अवतारों का स्मरण साधक के जीवन में आध्यात्मिक शक्ति, मानसिक शांति और आत्मविश्वास प्रदान करता है।

श्री रंगनाथ अष्टकम - Shree Ranganatha Ashtakam

श्री रंगनाथ अष्टकम - Shree Ranganatha Ashtakam

परिचय श्री रङ्गनाथाष्टकम् भगवान श्रीरङ्गनाथ (भगवान विष्णु के शयन मुद्रा स्वरूप) की दिव्य स्तुति है। इसमें भगवान के आनन्दरूप, ब्रह्मस्वरूप, योगनिद्रा, क्षीरसागरशायी तथा भक्तवत्सल स्वरूप का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया गया है। यह अष्टकम विशेष रूप से भक्ति, शांति और मोक्ष की प्राप्ति हेतु पाठ किया जाता है। भावार्थ इस अष्टकम में भक्त अपने मन को श्रीरंगनाथ के दिव्य स्वरूप में रमाने की प्रार्थना करता है। वे कावेरी तट पर विराजमान, लक्ष्मीजी के निवास, योगनिद्रा में स्थित तथा क्षीरसागर में शयन करने वाले हैं। ब्रह्मा, व्यास, सनकादि मुनि भी जिनकी वंदना करते हैं, ऐसे श्रीरंगराज भक्तों के हृदय में निवास करते हैं। जो उनका स्मरण करता है, उसे सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति तथा अंततः परम पद की प्राप्ति होती है।

श्री अमरनाथ अष्टकम् - Shree Amarnath Ashtakam

श्री अमरनाथ अष्टकम् - Shree Amarnath Ashtakam

परिचय श्री अमरनाथ अष्टकम् की रचना स्वामी वरदानन्द भारती ने की है। यह अष्टकम् हिमालय स्थित अमरनाथ ज्योतिर्लिंग में विराजमान भगवान शिव के दिव्य, करुणामय और सर्वव्यापक स्वरूप का वर्णन करता है। इसमें शिव के तपस्वी, लोकमंगलकारी और भक्तवत्सल रूप का अत्यंत सुंदर चित्रण है। भावार्थ इस अष्टकम् में साधक भगवान अमरनाथ से प्रार्थना करता है कि वे समस्त लोकों के कल्याण हेतु सदा उपस्थित रहने वाले, भक्तों के हृदय में वास करने वाले, और करुणा के सागर हैं। शिव ही जन्म-मृत्यु, भय और अज्ञान से रक्षा करने वाले परम आश्रय हैं। अर्थ (संक्षिप्त व्याख्या) अमरनाथ – अमरत्व के दाता शिव भागीरथी सलिल – गंगाजल से युक्त जटाएँ त्रिनेत्र – तीनों कालों के द्रष्टा गिरिजासमेत – माता पार्वती सहित भक्तकल्पतरु – भक्तों की कामनाएँ पूर्ण करने वाले अद्वय प्रभु – एकमेव परब्रह्म

श्री बिमला देवी अष्टकम - Shree Bimala Devi Ashtakam

श्री बिमला देवी अष्टकम - Shree Bimala Devi Ashtakam

परिचय श्री बिमला देवी अष्टकम देवी विमला की स्तुति है, जो जगन्नाथ धाम की अधिष्ठात्री शक्ति मानी जाती हैं। वे आदिशक्ति, त्रिपुरा, महेश्वरी तथा करुणामयी माता के रूप में भक्तों की रक्षा करती हैं। यह अष्टकम उनकी कृपा, संरक्षण और आध्यात्मिक उन्नति के लिए पाठ किया जाता है। भावार्थ इस अष्टकम में देवी विमला को समस्त मंगलों की दात्री, दारिद्र्य और भय का नाश करने वाली, ज्ञान और शांति प्रदान करने वाली बताया गया है। वे भक्तों के दुःखों को दूर कर सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक कल्याण देती हैं। जो भक्त श्रद्धा से उनका स्मरण करता है, उसे देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। फल इस अष्टकम का श्रद्धापूर्वक नित्य पाठ करने से दारिद्र्य, भय और संकटों का नाश होता है। भक्त को ज्ञान, शांति, धर्म, श्रद्धा और समृद्धि प्राप्त होती है।

श्री शिवनामावल्यष्टकम् - Shree Shiv Naamavali Astakam

श्री शिवनामावल्यष्टकम् - Shree Shiv Naamavali Astakam

परिचय श्री शिवनामावल्य अष्टकम् भगवान शिव के अनेक दिव्य नामों का स्तवन है। इसमें शिव के विभिन्न स्वरूपों — चन्द्रचूड़, नीलकण्ठ, विश्वनाथ, पशुपति, मृत्युंजय आदि — का स्मरण करते हुए संसार रूपी दुःख से रक्षा की प्रार्थना की गई है। यह स्तोत्र विशेष रूप से भय, संकट और दारिद्र्य निवारण के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। भावार्थ इस अष्टकम में भक्त भगवान शिव के विभिन्न नामों का उच्चारण करते हुए उनसे प्रार्थना करता है कि वे संसार के दुःख, भय और क्लेश से उसकी रक्षा करें। शिव को करुणामय, दीनबन्धु, त्रिनेत्रधारी, कैलासवासी और गंगाधर रूप में वर्णित किया गया है। वे शरणागतों की रक्षा करने वाले और दारिद्र्य व दुःख को नष्ट करने वाले हैं। फल जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस शिवनामावल्य अष्टकम् का नित्य पाठ करता है, उसके जीवन के कष्ट, भय और बाधाएँ दूर होती हैं। उसे मानसिक शांति, साहस और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।

लिङ्गाष्टकम् - Lingashtakam

लिङ्गाष्टकम् - Lingashtakam

परिचय “लिङ्गाष्टकम्” भगवान शिव की महिमा का वर्णन करने वाला एक प्रसिद्ध स्तोत्र है। इसमें शिवलिंग के दिव्य स्वरूप, उसकी पवित्रता और भक्तों के कल्याणकारी प्रभाव का गुणगान किया गया है। यह स्तोत्र विशेष रूप से शिवरात्रि, श्रावण मास, प्रदोष व्रत तथा दैनिक शिव पूजन में श्रद्धा से पाठ किया जाता है। भावार्थ इस स्तोत्र में शिवलिंग को सृष्टि का कारण, पापों का नाश करने वाला, बुद्धि और कल्याण प्रदान करने वाला बताया गया है। प्रत्येक श्लोक में शिवलिंग के विभिन्न दिव्य गुणों का वर्णन है — जैसे ब्रह्मा और विष्णु द्वारा पूजित, रावण के अहंकार का विनाश करने वाला, दक्ष यज्ञ का संहारक और भक्तों के कष्टों का हरण करने वाला। अंत में कहा गया है कि जो व्यक्ति श्रद्धा से शिव के समीप बैठकर इस लिङ्गाष्टकम् का पाठ करता है, वह शिवलोक को प्राप्त करता है और भगवान शिव के साथ आनंदित होता है। पाठ का फल जो श्रद्धा और भक्ति से लिङ्गाष्टकम् का नियमित पाठ करता है, उसके पाप नष्ट होते हैं, दरिद्रता दूर होती है और अंततः शिव कृपा से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

श्री वैद्यनाथ अष्टकम - Shree Vaidyanath Ashtakam

श्री वैद्यनाथ अष्टकम - Shree Vaidyanath Ashtakam

परिचय श्री वैद्यनाथ अष्टकम भगवान शिव के वैद्यनाथ स्वरूप की स्तुति है। इसमें शिव को समस्त रोगों के नाशक, करुणामय, त्रिलोचन, त्रिपुरान्तक तथा भक्तप्रिय बताया गया है। यह अष्टकम विशेष रूप से शारीरिक एवं मानसिक रोगों से मुक्ति और आयु, आरोग्य एवं सौभाग्य की प्राप्ति के लिए पाठ किया जाता है। भावार्थ इस अष्टकम में भगवान शिव के उस स्वरूप का वर्णन है जो संसार रूपी भवरोग के वैद्य हैं। वे गंगाधर, नीलकण्ठ, त्रिनेत्रधारी और त्रिपुरासुर के संहारक हैं। वे दुष्टों का नाश करने वाले तथा भक्तों पर कृपा करने वाले हैं। वे समस्त रोगों का नाश करते हैं और अंध, बहरे, लंगड़े अथवा रोगग्रस्त प्राणियों को भी सुख प्रदान करते हैं। जो उनके शरण में आता है, उसे आरोग्य, संतति, सौभाग्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

श्री भवानी अष्टकम् - Shree Bhavani Ashtakam

श्री भवानी अष्टकम् - Shree Bhavani Ashtakam

परिचय भवानी अष्टकम् की रचना आदि शंकराचार्य ने की है। यह अष्टकम् माँ भवानी / आदिशक्ति के प्रति पूर्ण शरणागति का भाव प्रकट करता है। साधक स्वीकार करता है कि संसार में कोई भी स्थायी सहारा नहीं है — एकमात्र आश्रय माँ भवानी ही हैं। भावार्थ यह अष्टकम् बताता है कि जब सभी संबंध, ज्ञान, कर्म और साधन असहाय प्रतीत हों, तब भी माँ भवानी जीव की एकमात्र गति हैं। वह हर संकट, भय, पाप और दुःख से रक्षा करने वाली करुणामयी शक्ति हैं। अर्थ (संक्षिप्त व्याख्या) गतिस्त्वं – मेरी एकमात्र शरण भवाब्धि – संसार रूपी सागर कुसंसार पाश – मोह और बंधन शरण्ये – शरण देने वाली आदिशक्ति – समस्त शक्तियों की मूल

श्री गोपीजन वल्लभाष्टकम - Shree Gopijan Vallabhashtakam

श्री गोपीजन वल्लभाष्टकम - Shree Gopijan Vallabhashtakam

परिचय श्री गोपीजनवल्लभ अष्टकम भगवान श्रीकृष्ण के उस मधुर स्वरूप की स्तुति है, जो गोपियों के प्रिय, भक्तों के जीवनाधार और लीला पुरुषोत्तम हैं। इसमें उनके बालरूप, गोपाल लीलाएँ, कंस वध तथा भक्तों पर कृपा का सुंदर वर्णन है। भावार्थ इस अष्टकम में भगवान श्रीकृष्ण के कमलनयन, करुणामय और मधुर हास्ययुक्त स्वरूप का वंदन किया गया है। वे बकासुर और कंस जैसे दैत्यों का संहार करने वाले हैं तथा गोप-बालकों के जीवन के आधार हैं। वे यमुना तट पर क्रीड़ा करने वाले, पीताम्बरधारी, मनोहर किशोर रूपधारी हैं। वे भक्तों के लिए सहज प्राप्त होने वाले और समस्त शुभ लक्षणों से युक्त परम पुरुष हैं। देवकीनन्दन श्रीकृष्ण शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करने वाले चतुर्भुज रूप में भी भक्तों की रक्षा करते हैं। फल जो श्रद्धा और भक्ति से इस गोपीजनवल्लभ अष्टकम का नित्य पाठ करता है, उसे भगवान श्रीकृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त होती है। उसके जीवन में भक्ति, आनंद, प्रेम और आध्यात्मिक उन्नति का विकास होता है।

श्री पार्वतीवल्लभ अष्टकम् - Shree Parvati Vallabham Ashtakam

श्री पार्वतीवल्लभ अष्टकम् - Shree Parvati Vallabham Ashtakam

परिचय श्री पार्वतीवल्लभ अष्टकम् भगवान शिव की स्तुति है, जिसमें उन्हें पार्वती के प्रिय, नीलकण्ठ, भूतनाथ और महेश्वर के रूप में वंदन किया गया है। इस अष्टकम में शिव के वैराग्य, करुणा, तत्त्वज्ञान और भक्तरक्षक स्वरूप का वर्णन है। यह स्तोत्र विशेष रूप से कष्ट निवारण और शिवभक्ति की दृढ़ता के लिए पाठ किया जाता है। भावार्थ इस अष्टकम में भगवान शिव के दिव्य और विरक्त स्वरूप का ध्यान किया गया है। वे श्मशानवासी, भस्मधारी, नागाभूषणधारी तथा त्रिनेत्रधारी हैं। वे भक्तों के रक्षक, कष्टों के नाशक और दीनों पर कृपा करने वाले हैं। जो श्रद्धा से उनका स्मरण करता है, उसे भय और दुःख से मुक्ति प्राप्त होती है। फल इस अष्टकम का नित्य श्रद्धापूर्वक पाठ करने से कष्ट, भय और संकट दूर होते हैं। भक्त को शिवकृपा, आंतरिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

श्रीकालिकाष्टकम् - Shree Kali Ashtakam

श्रीकालिकाष्टकम् - Shree Kali Ashtakam

परिचय यह माँ काली का अत्यंत गूढ़ एवं तांत्रिक भाव से युक्त अष्टकम् है, जिसमें उनके उग्र तथा करुणामयी दोनों दिव्य स्वरूपों का वर्णन किया गया है। इसमें माँ के श्मशानवासी, महाकाल-सहचरी और जगन्मोहिनी रूप का प्रभावशाली चित्रण मिलता है। यह स्तोत्र विशेष रूप से काली पूजा, दीपावली की रात्रि, नवरात्रि तथा तांत्रिक साधना में श्रद्धा एवं भक्ति के साथ पाठ किया जाता है। भावार्थ इस अष्टकम् में माँ काली के उग्र स्वरूप का वर्णन है — गले में मुंडमाला, रक्ताभ जिह्वा, श्मशान में निवास और महाकाल के साथ अद्वैत एकत्व। उनका यह रूप संसार के भय, अज्ञान और अधर्म के विनाश का प्रतीक है। साथ ही, उन्हें भक्तों पर असीम कृपा करने वाली, इच्छाओं को पूर्ण करने वाली तथा मोक्ष प्रदान करने वाली आदिशक्ति बताया गया है। देवता भी उनके वास्तविक स्वरूप को पूर्णतः नहीं जान पाते — वे अनादि, अनन्त और परम रहस्यमयी हैं। अंत में कहा गया है कि जो साधक श्रद्धा और ध्यानपूर्वक इस अष्टकम् का पाठ करता है, उसे सिद्धियाँ, सफलता तथा अंततः मुक्ति की प्राप्ति होती है।

अच्युताष्टकं - Achyutashtakam

अच्युताष्टकं - Achyutashtakam

परिचय श्री अच्युताष्टकम् भगवान विष्णु एवं श्रीकृष्ण के विविध नामों और दिव्य लीलाओं का मधुर स्तवन है। इसमें अच्युत, केशव, माधव, गोविन्द, राम, नारायण आदि नामों के माध्यम से भगवान के अनेक अवतारों और स्वरूपों का स्मरण किया गया है। यह अष्टकम भक्ति, प्रेम और ईश्वर-स्मरण को दृढ़ करने वाला है। भावार्थ इस अष्टकम में भक्त भगवान के अनेक नामों का कीर्तन करते हुए उनके राम और कृष्ण दोनों रूपों का वंदन करता है। वे सीतापति राम के रूप में दुष्टों का विनाश करते हैं तथा कृष्ण रूप में कंस, केशी और पूतना का संहार करते हैं। वे गोपिकाओं के प्रिय, द्रौपदी के रक्षक, भक्तवत्सल और करुणामय हैं। भक्त उनके सौन्दर्य, श्यामल रूप, पीताम्बर और अलंकारों का ध्यान करता है और उनसे सदैव रक्षा की प्रार्थना करता है। फल जो भक्त प्रेमपूर्वक प्रतिदिन श्री अच्युताष्टकम् का पाठ करता है, उसकी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। भगवान हरि शीघ्र ही उस भक्त के वश में होकर उसे अपनी कृपा और प्रेम प्रदान करते हैं।

श्री बालकृष्ण अष्टकम् - Shree Bala Krishna Ashtakam

श्री बालकृष्ण अष्टकम् - Shree Bala Krishna Ashtakam

परिचय यह बालकृष्ण अष्टकम् भगवान श्रीकृष्ण के बाल-लीलामय, करुणामय और मोहक स्वरूप का स्तवन है। इसमें कुचेल-पालन, गोपाल-लीलाएँ, माखन-चोरी का माधुर्य और वेणुनाद की रमणीयता का भावपूर्ण वर्णन है। भावार्थ भक्त बालकृष्ण को शरण लेता है—जो नीलवर्ण, मंदहास्य, करुणासागर और सर्वरक्षक हैं। उनके स्मरण से मन शुद्ध होता है, भय-क्लेश मिटते हैं और जीवन में सौभाग्य, शांति व भक्ति का उदय होता है। अर्थ (संक्षिप्त व्याख्या) बाल जार चोर – बालकृष्ण की माखन-चोरी लीला वेणुनाद – बाँसुरी का मधुर नाद गोपाल – ग्वालबालों के स्वामी निरञ्जन – निर्विकार, पवित्र विष्णुलोक – परम पद/मोक्ष

श्री नृसिंहाष्टकम्-  Shree Narasimha Ashtakam

श्री नृसिंहाष्टकम्- Shree Narasimha Ashtakam

परिचय श्री नरसिंह अष्टकम् भगवान नृसिंह (श्रीहरि विष्णु का उग्र-करुणामय अवतार) की स्तुति में रचित अष्टकम् है। इसमें भगवान के रक्षक, भक्तवत्सल, पापविनाशक और मोक्षदाता स्वरूप का अत्यंत प्रभावशाली वर्णन किया गया है। भावार्थ यह अष्टकम् बताता है कि भगवान नरसिंह अपने भक्तों की रक्षा हेतु किसी भी सीमा तक जाते हैं। वे पापों का नाश करने वाले, भय हरने वाले और संसार सागर से पार लगाने वाले हैं। संकट, रोग, भय और मृत्यु के समय उनका स्मरण परम कल्याणकारी है। अर्थ (संक्षिप्त व्याख्या) नरसिंह – आधा सिंह, आधा मनुष्य, भक्त रक्षक भवाम्बुधि – संसार रूपी सागर तुङ्गनख – तीक्ष्ण नख शरण्य – शरण देने वाले कामद – भक्तों की कामनाएँ पूर्ण करने वाले पातकभयघ्न – पाप और भय का नाश करने वाले

अधरं मधुरं मधुराष्टकं - Adharam Madhuram Madhurashtakam

अधरं मधुरं मधुराष्टकं - Adharam Madhuram Madhurashtakam

परिचय  अधरं मधुरं स्तोत्रम् भगवान श्रीकृष्ण की माधुर्य-लीला का अत्यंत सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है। इसमें श्रीकृष्ण के स्वरूप, वाणी, नेत्र, हास्य, चाल, लीला, वंशी, यमुना, गोपियों और सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त उनके मधुर भाव का वर्णन किया गया है। यह स्तोत्र भक्ति रस से परिपूर्ण है और मन को प्रेम, शांति और आनंद से भर देता है। भावार्थ  इस स्तोत्र में यह बताया गया है कि भगवान श्रीकृष्ण का हर अंग, हर क्रिया और हर लीला मधुर है। उनके अधर, मुख, नेत्र, हास्य, वाणी, चाल, वस्त्र, आचरण, संगीत, नृत्य, विश्राम, रूप, अलंकार—सब कुछ मधुर है। यमुना का जल, कमल, गोपियाँ, माला, वंशी, मित्रता और प्रेम—सब श्रीकृष्ण के सान्निध्य से मधुर बन जाते हैं। भाव यह है कि जो भी श्रीकृष्ण से जुड़ जाता है, वह स्वयं भी माधुर्य से भर उठता है। पाठ का फल  अधरं मधुरं स्तोत्र का श्रद्धा से पाठ करने से निम्न फल प्राप्त होते हैं: मन में प्रेम, शांति और भक्ति भाव की वृद्धि होती है मानसिक तनाव, चिंता और नकारात्मक भाव दूर होते हैं हृदय में कृष्ण प्रेम और वैराग्य का उदय होता है गृहस्थ जीवन में मधुरता और सौहार्द बढ़ता है भक्त को श्रीकृष्ण की अनुकंपा और कृपा प्राप्त होती है ध्यान, जप और साधना में मन शीघ्र एकाग्र होता है

श्री रामाष्टकम् - Shree Ram Ashtakam

श्री रामाष्टकम् - Shree Ram Ashtakam

परिचय श्री रामाष्टकम् की रचना महर्षि वेदव्यास द्वारा की गई है। यह अष्टकम् भगवान श्रीराम के सगुण-निर्गुण, ब्रह्मस्वरूप और करुणामय तत्व का अद्भुत वर्णन करता है। इसमें श्रीराम को परब्रह्म, गुरु, तारक और मोक्षदाता के रूप में स्वीकार किया गया है। भावार्थ यह अष्टकम् बताता है कि श्रीराम केवल अयोध्या के राजा नहीं, बल्कि परम सत्य और अद्वैत ब्रह्म हैं। उनका स्मरण समस्त पापों का नाश करता है, भय दूर करता है और अंततः जीव को मोक्ष प्रदान करता है। अर्थ (संक्षिप्त व्याख्या) राममद्वयम् – अद्वैत ब्रह्म स्वरूप राम समस्तपापखण्डनम् – सभी पापों का नाश भवाब्धि पोत – संसार सागर से पार कराने वाली नौका महावाक्यबोधक – उपनिषदों द्वारा प्रतिपादित ब्रह्म भवच्छिदम् – जन्म-मरण से मुक्ति देने वाले

कृष्णप्रेममयी राधा युगलाष्टकम् - Krishna Prem Mayi Radha Yugalashtakam

कृष्णप्रेममयी राधा युगलाष्टकम् - Krishna Prem Mayi Radha Yugalashtakam

परिचय युगलाष्टकम् श्रीराधा–कृष्ण के दिव्य युगल स्वरूप का अत्यंत मधुर और भावपूर्ण स्तवन है। इसमें राधा और कृष्ण को एक-दूसरे का प्रेम, प्राण, धन, चेतना और आश्रय बताया गया है। यह रचना वैष्णव परंपरा में युगल भक्ति और माधुर्य भाव का श्रेष्ठ उदाहरण मानी जाती है, जहाँ राधा और कृष्ण को अलग नहीं बल्कि एकात्म रूप में पूजा जाता है। भावार्थ युगलाष्टकम् का मूल भाव यह है कि श्रीराधा और श्रीकृष्ण परस्पर पूर्णतः अभिन्न हैं। राधा का सर्वस्व कृष्ण हैं और कृष्ण का सर्वस्व राधा हैं। उनका प्रेम, प्राण, चेतना, निवास, वस्त्र और राज्य सब एक-दूसरे में स्थित है। भक्त यह स्वीकार करता है कि उसके जीवन का वास्तविक धन और उसकी शाश्वत गति केवल राधा–कृष्ण युगल ही हैं। पाठ का फल युगलाष्टकम् का नित्य श्रद्धा और प्रेमपूर्वक पाठ करने से— राधा–कृष्ण के प्रति प्रेम और माधुर्य भाव की वृद्धि होती है मन में शांति, कोमलता और भक्तिरस का संचार होता है अहंकार, भय और द्वेष का नाश होता है भक्ति में स्थिरता और गहराई आती है अंततः भक्त को राधा–कृष्ण की कृपा और दिव्य सान्निध्य प्राप्त होता है

Kevalashtakam - कैवल्याष्टकम्

Kevalashtakam - कैवल्याष्टकम्

कैवल्याष्टकम् (जिसे केवलाष्टक भी कहा जाता है) भगवान श्रीहरि के नाम-महात्म्य को प्रकट करने वाला अत्यंत प्रभावशाली वैष्णव स्तोत्र है। इस अष्टक में यह प्रतिपादित किया गया है कि समस्त संसार माया से आवृत है और इस भवसागर से पार उतरने का एकमात्र सत्य और शाश्वत साधन “हरि नाम” ही है। यह स्तोत्र भक्ति, वैराग्य और आत्मबोध का सार प्रस्तुत करता है। भावार्थ (संक्षेप) इस कैवल्याष्टकम् का केंद्रीय भाव यह है कि हरि का नाम ही सर्वश्रेष्ठ साधन और परम सत्य है। यह नाम सबसे अधिक मधुर, मंगलकारी और पावन है। यह अष्टकम् संसार की नश्वरता और जीवन की अनिश्चितता को स्पष्ट करते हुए बताता है कि सभी दुःखों से मुक्ति का एकमात्र उपाय भगवान के नाम का निरंतर स्मरण और कीर्तन है। हरि-नाम ही गुरु, पिता, माता और सच्चा बंधु है। बाल्यकाल से लेकर जीवन के अंतिम क्षण तक नाम-स्मरण करने से चित्त शुद्ध होता है और साधक को शुद्ध चिदानन्द स्वरूप का अनुभव प्राप्त होता है।

श्री षड् गोस्वामी अष्टकम् - Shree Sadgoswami Astakam

श्री षड् गोस्वामी अष्टकम् - Shree Sadgoswami Astakam

षड् गोस्वामी अष्टकम् वैष्णव परंपरा का एक अत्यंत पूज्य अष्टकम् है, जिसमें श्री रूप गोस्वामी, श्री सनातन गोस्वामी, श्री रघुनाथ भट्ट गोस्वामी, श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, श्री जीव गोस्वामी और श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी — इन छह महान संतों की दिव्य भक्ति, त्याग, विद्वत्ता और श्री राधा-कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम का वर्णन किया गया है। यह अष्टकम् श्री चैतन्य महाप्रभु की भक्ति-धारा का सार प्रस्तुत करता है। भावार्थ (संक्षेप) इस अष्टकम् का केंद्रीय भाव यह है कि षड् गोस्वामीजन पूर्ण वैराग्य को धारण कर, सांसारिक वैभव त्यागकर, केवल श्री राधा-कृष्ण की प्रेममयी भक्ति में निरंतर लीन रहे। वे नाम-संकीर्तन, नृत्य, गायन और शास्त्र-चिंतन में रत रहकर जीवों के कल्याण हेतु भक्ति-मार्ग की स्थापना करते हैं। वृंदावन में निवास कर वे राधा-कृष्ण की लीलाओं का निरंतर स्मरण करते हुए प्रेमोन्माद की अवस्था में विचरण करते हैं और समस्त संसार को भक्ति का अमृत प्रदान करते हैं।

 चौराष्टकम् - Chaurastakam

चौराष्टकम् - Chaurastakam

चौराग्रगण्य पुरुषाष्टकम् भगवान श्रीकृष्ण के उस अलौकिक रूप का स्तवन है जिसमें वे नवनीतचौर — अर्थात् माखन चोर — के रूप में प्रकट होते हैं। यह अष्टकम केवल बाह्य लीलाओं का वर्णन नहीं करता, बल्कि यह बताता है कि श्रीकृष्ण भक्तों के पाप, अहंकार, आसक्ति और बंधनों को चुरा लेने वाले परम करुणामय भगवान हैं। इस अष्टकम में भक्त स्वयं अपने हृदय को श्रीकृष्ण का कारागार मानकर उन्हें वहीं सदा के लिए बाँध लेना चाहता है। भावार्थ (संक्षेप) इस अष्टकम का केंद्रीय भाव यह है कि श्रीकृष्ण संसार के साधारण चोर नहीं, बल्कि सर्वोच्च चोर हैं — जो भक्तों के पाप, मोह, भवबंधन, यमपाश और अहंकार तक को चुरा लेते हैं। वे धन, मान और इन्द्रियों को हरकर जीव को पूर्णतः शरणागत बना देते हैं। भक्त यह स्वीकार करता है कि प्रभु ने उसका सब कुछ चुरा लिया है और अब वह उन्हें अपने हृदय-रूपी कारागार में भक्तिरूपी बंधन से बाँधकर सदा के लिए रोक लेना चाहता है।

श्री राधा अष्टकम् - Shree Radha Ashtakam

श्री राधा अष्टकम् - Shree Radha Ashtakam

परिचय श्री राधा अष्टकम् भगवान श्रीकृष्ण की परम प्रियतमा, महाशक्ति स्वरूपा श्रीराधा रानी की दिव्य स्तुति है। इस अष्टक में श्रीराधा को हरि-प्रेम की साक्षात् मूर्ति, वृन्दावन की अधीश्वरी और युगल लीला की मूल शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है। यह स्तुति भक्त को राधा-कृष्ण के नित्य प्रेम-तत्त्व से जोड़ती है और शुद्ध भक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। भावार्थ (संक्षेप) इस अष्टक में भक्त श्रीराधा रानी को अपने जीवन का सर्वस्व मानकर उनका नाम, रूप, गुण और लीला का निरन्तर स्मरण करने की प्रार्थना करता है। स्तुति का मुख्य भाव यह है कि श्रीकृष्ण स्वयं भी श्रीराधा के प्रेम से बँधे हुए हैं और उनकी कृपा से ही हरि-प्रेम की प्राप्ति संभव है। राधा-कृष्ण की युगल सेवा ही परम साध्य है—यही इसका केन्द्रीय भाव है। पाठ का फल श्री राधा अष्टकम् का श्रद्धा और नियमपूर्वक पाठ करने से हृदय में शुद्ध हरि-प्रेम का उदय होता है राधा-कृष्ण की कृपा सहज रूप से प्राप्त होती है सांसारिक आसक्ति का क्षय और वैराग्य की वृद्धि होती है अंततः भक्त को वृन्दावन धाम में युगल सेवा का अधिकारी बनाया जाता है यह पाठ भक्ति-मार्ग में तीव्र प्रगति प्रदान करता है।

श्री काशी विश्वनाथ अष्टकम् - Shree Kashi Vishwanath Ashtakam

श्री काशी विश्वनाथ अष्टकम् - Shree Kashi Vishwanath Ashtakam

परिचय श्री विश्वनाथ अष्टकम् भगवान शिव के काशी स्वरूप — श्री विश्वेश्वर / विश्वनाथ की स्तुति में रचित एक अत्यंत प्रसिद्ध अष्टकम् है। इस अष्टकम् में भगवान शिव को गंगा-जटाधारी, पार्वती सहित, त्रिनेत्रधारी, करुणामय और मोक्षदाता रूप में स्मरण किया गया है। काशी में इसका पाठ विशेष फलदायी माना गया है। भाव-सार इस अष्टकम् का मूल भाव यह है कि भगवान विश्वनाथ का स्मरण और भजन करने से पापों का नाश होता है वैराग्य और शांति प्राप्त होती है अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है गायन / पाठ का समय प्रातः ब्रह्ममुहूर्त सोमवार महाशिवरात्रि सावन मास काशी यात्रा के समय शिवलिंग पूजन के बाद पाठ से मिलने वाला फल (फलश्रुति का भाव) विद्या और बुद्धि की वृद्धि ऐश्वर्य और सुख की प्राप्ति यश और कीर्ति देह त्याग के पश्चात शिवलोक की प्राप्ति

श्री गुरु अष्टकम् - Shree Guru Ashtakam

श्री गुरु अष्टकम् - Shree Guru Ashtakam

परिचय श्री गुरु अष्टकम् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक अत्यंत भावपूर्ण स्तोत्र है, जिसमें यह प्रतिपादित किया गया है कि गुरु-भक्ति के बिना शरीर, धन, विद्या, यश, वैराग्य—सब निष्फल हैं। गायन-समय ब्रह्ममुहूर्त गुरुवार गुरु पूर्णिमा ध्यान या जप से पहले भाव-सार गुरु ही जीवन की परम गति हैं। गुरु-चरणों में मन न लगे तो सब उपलब्धियाँ अर्थहीन हैं।

श्री जगन्नाथाष्टकम् - Shree Jagannatha Ashtakam

श्री जगन्नाथाष्टकम् - Shree Jagannatha Ashtakam

जगन्नाथाष्टकम् – भजन का परिचय जगन्नाथाष्टकम् आदि शंकराचार्य जी द्वारा रचित एक अत्यंत पावन और प्रभावशाली स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) की करुणा, सौंदर्य, माधुर्य और सर्वव्यापकता का सुंदर वर्णन करता है। इस स्तोत्र में भगवान जगन्नाथ को वृन्दावन-विहारी, नीलाचल-निवासी, रथयात्रा में विराजमान और समस्त देवताओं द्वारा पूजित स्वरूप में नमन किया गया है। हर श्लोक के अंत में भक्त यही प्रार्थना करता है कि प्रभु जगन्नाथ सदा उसकी दृष्टि और हृदय में विराजमान रहें। जगन्नाथाष्टकम् का भावार्थ इस स्तोत्र का मूल भाव यह है कि भक्त को न राज्य चाहिए, न धन, न सांसारिक सुख, बल्कि केवल भगवान जगन्नाथ के दर्शन और उनकी शरण चाहिए। भगवान को यहाँ करुणा-सागर, दया-सिंधु, पापों का नाश करने वाला और दीन-हीन के एकमात्र सहायक के रूप में स्वीकार किया गया है। रथ पर आरूढ़ भगवान जगन्नाथ जब भक्तों की स्तुतियाँ सुनते हैं, तब वे अत्यंत करुणामय हो जाते हैं। कवि यह भाव प्रकट करता है कि संसार असार है और केवल प्रभु के चरणों में ही सच्चा आश्रय है। यह स्तोत्र वैराग्य, भक्ति और पूर्ण शरणागति का संदेश देता है। यह स्तोत्र कब और कहाँ पढ़ा जाता है जगन्नाथाष्टकम् का पाठ विशेष रूप से पुरी जगन्नाथ मंदिर रथयात्रा महोत्सव एकादशी, जन्माष्टमी प्रातःकालीन साधना और संध्या भजन के समय किया जाता है। इस्कॉन मंदिरों और वैष्णव परंपरा में यह स्तोत्र अत्यंत श्रद्धा से गाया और पढ़ा जाता है। जगन्नाथाष्टकम् की महिमा (फलश्रुति भाव) ऐसा माना गया है कि जो भक्त श्रद्धा और पवित्रता के साथ जगन्नाथाष्टकम् का नियमित पाठ करता है, उसके पाप नष्ट होते हैं, मन शुद्ध होता है और अंततः वह भगवान विष्णु के धाम को प्राप्त करता है।

 श्री गिरिराजअष्टकम् - Shree Giriraj Ashtakam

श्री गिरिराजअष्टकम् - Shree Giriraj Ashtakam

परिचय श्री गिरिराजधारी अष्टकम् भगवान श्रीकृष्ण के गोवर्धनधारी स्वरूप की स्तुति है। इस अष्टकम् में ब्रजलीला, माखनचोरी, रासलीला, वंशी-नाद, गोवर्धन लीला और करुणामय कृष्ण स्वरूप का सुंदर वर्णन मिलता है। भावार्थ (समग्र भाव) यह अष्टकम् दर्शाता है कि भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों की इच्छाओं को पूर्ण करने वाले, अहंकार का नाश करने वाले, करुणा, माधुर्य और रस से परिपूर्ण हैं। जो श्रद्धा से गिरिराजधारी का स्मरण करता है, उसके जीवन के कष्ट स्वतः दूर हो जाते हैं। गायन / पाठ का समय प्रातःकाल ब्रज / वृन्दावन स्मरण के समय एकादशी जन्माष्टमी गोवर्धन पूजा रासलीला अथवा कृष्ण भजन से पहले पाठ से प्राप्त फल भक्ति में वृद्धि मन की शांति अहंकार का नाश गृहस्थ जीवन में माधुर्य श्रीकृष्ण कृपा की प्राप्ति

श्री रुद्राष्टकम् - Shree Rudrashtakam

श्री रुद्राष्टकम् - Shree Rudrashtakam

परिचय रुद्राष्टकम् एक अत्यंत प्रसिद्ध शिव-अष्टकम् है, जिसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास जी ने की। इसमें भगवान शिव के निर्गुण, निराकार, महाकाल, करुणामय और सच्चिदानन्द स्वरूप का गूढ़ और भक्तिपूर्ण वर्णन किया गया है। भावार्थ यह अष्टकम् भक्त की पूर्ण शरणागति को दर्शाता है। साधक स्वीकार करता है कि उसे न योग आता है, न जप-तप, फिर भी वह शिव को ही अपना एकमात्र आश्रय मानता है। भगवान शिव ही जन्म-मृत्यु, दुःख और संसार के बंधनों से मुक्त करने वाले हैं। अर्थ (संक्षिप्त व्याख्या) निर्वाण रूपं – मोक्ष स्वरूप निर्गुण, निर्विकल्प – गुणों और कल्पनाओं से परे महाकाल – काल के भी स्वामी नीलकण्ठ – विषपान करने वाले  भवानीपति – माता पार्वती के स्वामी शम्भो – कल्याणकर्ता

श्री गोपाल अष्टकम - Shree Gopal Ashtakam

श्री गोपाल अष्टकम - Shree Gopal Ashtakam

परिचय यह रचना श्रीकृष्ण अष्टकम् है, जिसमें आठ पदों के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण के सौंदर्य, लीला, करुणा, भक्ति-वात्सल्य और ब्रह्मस्वरूप का वर्णन किया गया है। प्रत्येक श्लोक में ब्रजभूमि की माधुर्य परंपरा और वैष्णव रस की अनुभूति होती है। भावार्थ यह अष्टकम् बताता है कि श्रीकृष्ण केवल ईश्वर ही नहीं, बल्कि आनंद के साक्षात् स्वरूप हैं। वे भक्तों के दुःख हरने वाले, राधा के प्राणप्रिय, वंशी नाद से जीवों के हृदय को मोहित करने वाले और ब्रह्मज्ञान का सजीव रूप हैं। अर्थ (संक्षिप्त व्याख्या) विहरति स्वच्छन्दं – भगवान पूर्ण स्वतंत्र हैं आनन्द कन्दं – समस्त आनंद का मूल गिरिवर धरणं – गोवर्धन धारण करने वाले निजजन शरणं – भक्तों के आश्रय वंशी कृत नादं – वंशी के नाद से विषाद हरने वाले राधा उर हारं – श्रीराधा के हृदय के हार समान प्रिय गायन-समय  प्रातः ब्रह्ममुहूर्त संध्या आरती के समय जन्माष्टमी, रास पूर्णिमा, कार्तिक मास ध्यान या जप से पूर्व / बाद

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