गुरु अष्टकम् - Guru Ashtakam
श्री गुरु अष्टकम् वैष्णव परंपरा का अत्यंत पावन स्तोत्र है, जिसकी रचना श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने की थी। यह स्तुति सद्गुरु को भगवान श्रीकृष्ण की कृपा का साक्षात् माध्यम मानते हुए उनके श्रीचरणों में पूर्ण शरणागति का भाव प्रकट करती है। इसमें गुरु को अज्ञानरूपी अग्नि से संसार को बचाने वाला, भक्ति का मार्ग दिखाने वाला और राधा-कृष्ण प्रेम का दाता बताया गया है।
संसार-दावानल-लीढ-लोक-त्राणाय कारुण्य-घनाघनत्वम् ।
प्राप्तस्य कल्याण-गुणार्णवस्य वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ॥१॥
महाप्रभोः कीर्तन-नृत्य-गीत-वादित्र-माद्यन्-मनसो रसेन ।
रोमाञ्च-कम्पाश्रु-तरंग-भाजो वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ॥२॥
श्री-विग्रहाराधन-नित्य-नाना-श्रृंगार-तन्-मन्दिर-मार्जनादौ ।
युक्तस्य भक्तांश्च नियुञ्जतोऽपि वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ॥३॥
चतुर्विध-श्रीभगवत्-प्रसाद-स्वाद्वन्न-तृप्तान् हरि-भक्त-सङ्घान् ।
कृत्वैव तृप्तिं भजतः सदैव वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ॥४॥
श्रीराधिका-माधवयोरपार-माधुर्य-लीला-गुण-रूप-नाम्नाम् ।
प्रतिक्षणास्वादन-लोलुपस्य वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ॥५॥
निकुञ्ज-यूनो रति-केलि-सिद्ध्यै या यालिभिर् युक्तिरपेक्षणीया ।
तत्रातिदक्ष्याद् अति-वल्लभस्य वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ॥६॥
साक्षाद्धरित्वेन समस्त-शास्त्रैरुक्तस्तथा भाव्यत एव सद्भिः ।
किन्तु प्रभोर् यः प्रिय एव तस्य वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ॥७॥
यस्य प्रसादाद् भगवत्-प्रसादो यस्याप्रसादान् न गतिः कुतोऽपि ।
ध्यायन् स्तुवंस् तस्य यशस् त्रि-सन्ध्यं वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ॥८॥
अन्य लोकप्रिय भजन
सभी देखें
सारे जहाँ के मालिक तेरा ही आसरा है - Saare Jahan Ke Malik Tera Hi Aasara Hai
परिचय यह अत्यंत भावपूर्ण और आत्मसमर्पण से भरा भजन परमात्मा के प्रति पूर्ण विश्वास, श्रद्धा और स्वीकार भाव को प्रकट करता है। भजन में भक्त ईश्वर को समस्त संसार का स्वामी मानते हुए कहता है कि उसका एकमात्र सहारा केवल वही प्रभु हैं। जीवन में सुख आए या दुःख, सफलता मिले या कठिनाई — हर परिस्थिति को प्रभु की इच्छा मानकर स्वीकार करना ही सच्ची भक्ति है। भजन के शब्द मनुष्य को यह प्रेरणा देते हैं कि ईश्वर हमारी हर स्थिति, हर पीड़ा और हर भावना को बिना कहे समझते हैं। भक्त अपने जीवन की मजबूरियों, दुःखों और संघर्षों को प्रभु के चरणों में समर्पित कर देता है और उनकी इच्छा में ही अपनी खुशी खोज लेता है। सरल भाषा और गहरे आध्यात्मिक भावों से भरा यह भजन मन को शांति, धैर्य और प्रभु के प्रति अटूट विश्वास से भर देता है। भावार्थ इस भजन में भक्त कहता है कि संसार में उसका सबसे बड़ा सहारा केवल परमात्मा हैं और वही उसके जीवन का आधार हैं। भक्त प्रभु की हर इच्छा को स्वीकार करते हुए कहता है कि जो कुछ भी उसके जीवन में घट रहा है, वह सब भगवान की रज़ा से ही हो रहा है। इसलिए वह हर परिस्थिति में संतोष और समर्पण का भाव रखता है। भजन यह भी बताता है कि भगवान अपने भक्त के मन की हर बात जानते हैं। भक्त चाहे अपनी पीड़ा शब्दों में व्यक्त न कर पाए, फिर भी प्रभु उसकी हर मजबूरी और हर भावना को समझते हैं। जीवन में आने वाले दुःख और सुख दोनों को ईश्वर की कृपा मानकर स्वीकार करना ही सच्चे भक्त का गुण है। अंत में भक्त भगवान से कोई शिकायत नहीं करता, बल्कि इस बात के लिए भी उनका धन्यवाद करता है कि उन्होंने उसे इस संसार में भेजा और अपने स्मरण का अवसर दिया। यह भजन पूर्ण समर्पण, धैर्य, संतोष और प्रभु की इच्छा में प्रसन्न रहने का सुंदर संदेश देता है।
राधा नाम परम सुख दायी - Radha Naam Param Sukhdai
परिचय यह एक अत्यंत सरल, मधुर और भावपूर्ण राधा भजन है, जिसमें श्री राधा नाम की महिमा का वर्णन किया गया है। इस भजन में भक्त अपने जीवन को राधा नाम के जप में समर्पित करने की भावना व्यक्त करता है। भजन की पंक्तियों में ब्रज भूमि के प्रति प्रेम, संतों के दर्शन की इच्छा और संसार से विरक्ति का भाव स्पष्ट रूप से झलकता है। यह भजन भक्ति के शांत और मधुर रस को प्रकट करता है। भावार्थ इस भजन का मुख्य भाव यह है कि “राधा” नाम का स्मरण ही जीवन का सबसे बड़ा सुख और आनंद देने वाला है। भक्त यह चाहता है कि उसका पूरा जीवन राधा नाम जपते हुए बीते और वह ब्रजधाम में रहकर संतों का संग प्राप्त करे। भजन यह सिखाता है कि जब मन संसार की मोह-माया से हटकर राधा नाम में लग जाता है, तब सच्चा सुख और शांति प्राप्त होती है। यही भक्ति का सर्वोच्च मार्ग है।
नख पर धार लियो गिरिराज - Nakh Pe Dhaar Liyo Giriraj
परिचय यह अत्यंत भक्तिमय और उत्साहपूर्ण कृष्ण भजन भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला का सुंदर वर्णन करता है। भजन में उस दिव्य प्रसंग को गाया गया है जब श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर सम्पूर्ण ब्रजवासियों की रक्षा की थी। इसी अद्भुत लीला के कारण उन्हें “गिरधारी” नाम प्राप्त हुआ। भजन में इन्द्र के अहंकार, मूसलधार वर्षा और श्रीकृष्ण की करुणामयी रक्षा का अत्यंत सरल और मधुर चित्रण किया गया है। यह भजन भक्तों को भगवान की शक्ति, करुणा और अपने भक्तों के प्रति उनके प्रेम का अनुभव कराता है। साथ ही यह संदेश भी देता है कि भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए हर संकट में उनके साथ खड़े रहते हैं। भावार्थ इस भजन में वर्णन किया गया है कि जब ब्रजवासियों ने भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर इन्द्र की पूजा छोड़कर गोवर्धन पर्वत की पूजा की, तब इन्द्र को बहुत क्रोध आया। अपने अहंकार में आकर इन्द्र ने ब्रज में मूसलधार वर्षा आरंभ कर दी ताकि सम्पूर्ण ब्रज डूब जाए। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर सभी ब्रजवासियों, गौओं और जीवों को उसके नीचे सुरक्षित आश्रय दिया। इन्द्र आश्चर्यचकित रह गया कि इतनी प्रचंड वर्षा के बाद भी ब्रज का कुछ नहीं बिगड़ा। तब उसे अपनी भूल और अहंकार का एहसास हुआ। भजन यह संदेश देता है कि भगवान अपने भक्तों की सदैव रक्षा करते हैं और अहंकार का अंत निश्चित है। श्रीकृष्ण की यह लीला प्रेम, संरक्षण और दिव्य शक्ति का प्रतीक है। “गिरधारी” नाम भगवान की उसी महान कृपा और गोवर्धन धारण लीला की याद दिलाता है।
हरि गुण गाके जीवन बनाले पगला - Hari Gun Gake Jivan Banale Pagla
परिचय यह भजन मानव जीवन के सच्चे उद्देश्य को सरल और प्रभावी शब्दों में समझाने वाला एक प्रेरणादायक भजन है। इसमें बताया गया है कि यह जीवन अनमोल है और इसे व्यर्थ न गंवाकर भगवान के गुणों का गान करते हुए सार्थक बनाना चाहिए। भजन के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि भक्ति ही वह मार्ग है, जो जीवन को सही दिशा और सच्चा आनंद प्रदान करता है। भावार्थ इस भजन में कहा गया है कि यदि मनुष्य भगवान का भजन नहीं करता, तो उसका जीवन व्यर्थ हो जाता है और वह कहीं का नहीं रहता। इतिहास और पुराणों के उदाहरण देकर बताया गया है कि गणिका, अजामिल, गिद्ध (जटायु) और शबरी जैसे साधारण या पापी माने जाने वाले भी भगवान के गुण गाकर और उनकी शरण में आकर सिद्ध हो गए। इससे यह शिक्षा मिलती है कि चाहे कोई भी हो, यदि वह सच्चे मन से भगवान का स्मरण करे, तो उसका जीवन सुधर सकता है और उसे मुक्ति का मार्ग मिल सकता है।
भक्ति रस के और इस्कॉन भजन - Iskcon BhajanMore Bhajans

परिचय नृसिंह कवच एक अत्यंत प्रभावशाली और पवित्र स्तोत्र है, जो भगवान नृसिंह की कृपा और संरक्षण प्राप्त करने के लिए किया जाता है। यह कवच भक्त प्रह्लाद द्वारा प्रकट किया गया माना जाता है और इसमें भगवान के उग्र तथा करुणामय दोनों स्वरूपों का वर्णन मिलता है। इस स्तोत्र में भगवान नृसिंह को सर्वव्यापी रक्षक के रूप में स्मरण किया गया है, जो अपने भक्तों को हर प्रकार के भय, संकट, नकारात्मक शक्तियों और अनिष्ट प्रभावों से बचाते हैं। इसका नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में साहस, आत्मविश्वास, आध्यात्मिक शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि एक दिव्य सुरक्षा कवच है जो साधक के तन, मन और जीवन को संतुलन और शांति प्रदान करता है। भावार्थ नृसिंह कवच का मुख्य भाव यह है कि भगवान नृसिंह अपने भक्तों के लिए सर्वोच्च रक्षक हैं, जो हर दिशा, हर परिस्थिति और जीवन के प्रत्येक अंग की रक्षा करते हैं। इस स्तोत्र में भक्त भगवान से प्रार्थना करता है कि वे उसके सिर से लेकर पांव तक, उसके मन, बुद्धि, इंद्रियों और जीवन के हर पहलू को सुरक्षित रखें। यह भक्ति केवल भय से मुक्ति की याचना नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण और विश्वास का प्रतीक है। कवच यह सिखाता है कि जब मनुष्य सच्चे मन से भगवान की शरण में जाता है, तो कोई भी संकट या बाधा उसे नुकसान नहीं पहुंचा सकती। इसमें भगवान के विभिन्न स्वरूपों के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि वे हर दिशा में उपस्थित हैं और हर स्थिति में अपने भक्त की रक्षा करते हैं। अंततः यह स्तोत्र यह संदेश देता है कि श्रद्धा, विश्वास और भक्ति के साथ किया गया स्मरण व्यक्ति को न केवल भौतिक सुख देता है, बल्कि उसे आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष की ओर भी अग्रसर करता है।

परिचय यह दिव्य स्तुति ब्रह्म संहिता से ली गई है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण के “गोविन्द” स्वरूप की महिमा का अत्यंत सुंदर वर्णन किया गया है। “गोविन्द” का अर्थ है—इंद्रियों को आनंद देने वाले, गौओं और पृथ्वी के रक्षक, तथा समस्त जीवों के पालनकर्ता। इन श्लोकों में भगवान के रूप, गुण और उनकी अनंत शक्तियों का वर्णन किया गया है। एक ओर उनके मधुर और मनोहर स्वरूप—बांसुरी बजाने वाले, मोरपंख धारण करने वाले श्रीकृष्ण—का चित्रण है, तो दूसरी ओर उनकी सर्वव्यापकता और सर्वशक्तिमत्ता का भी वर्णन मिलता है। भावार्थ इन श्लोकों का मुख्य भाव भगवान श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम, श्रद्धा और पूर्ण समर्पण को व्यक्त करना है। पहले श्लोक में उनके अद्भुत सौंदर्य का वर्णन है—उनकी बांसुरी, उनकी कमल जैसी आंखें और उनका श्यामल स्वरूप भक्त के मन को मोह लेता है। दूसरे श्लोक में उनकी दिव्यता और सर्वशक्तिमत्ता का वर्णन है। भगवान का शरीर साधारण नहीं, बल्कि पूर्णतः चेतन और आनंदमय है। वे अपने किसी भी अंग से कोई भी कार्य कर सकते हैं—यह उनकी अनंत शक्ति का प्रतीक है। बार-बार “गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि” कहना यह दर्शाता है कि भक्त का मन पूरी तरह भगवान में लीन हो गया है और वह हर क्षण केवल उन्हीं का स्मरण और भजन करना चाहता है।

यह वैष्णव भजन “श्रीगुरुचरण पद्म” श्रीगुरुदेव की महिमा, करुणा और अनन्य कृपा का भावपूर्ण वर्णन करता है। गुरु को भक्ति का आश्रय, भवसागर से पार लगाने वाला और दिव्य ज्ञान प्रदान करने वाला माना गया है। इस भजन में गुरु के चरणों में पूर्ण शरणागति, निष्ठा और प्रेम-भक्ति का सुंदर भाव प्रकट होता है। यह भजन साधकों को गुरु-कृपा द्वारा कृष्ण-प्राप्ति के मार्ग पर दृढ़ करता है।

भजन का परिचय यह भजन “जय श्री कृष्णा बोलो, जय राधे” ब्रज वैष्णव परंपरा का अत्यंत सरल और मधुर नाम-स्मरण भजन है। इसमें भक्तों को श्रीकृष्ण और श्रीराधा के पावन नामों का उच्चारण करने के लिए प्रेरित किया गया है। यह भजन समूह कीर्तन और व्यक्तिगत साधना — दोनों के लिए उपयुक्त है और बहुत कम शब्दों में गहन भक्ति भाव प्रकट करता है। भजन का भावार्थ इस भजन का भाव यह है कि श्रीकृष्ण और श्रीराधा के नाम का स्मरण करने मात्र से मन शुद्ध होता है और हृदय में प्रेम का संचार होता है। “जय” का उच्चारण आनंद, कृतज्ञता और उत्सव भाव को दर्शाता है। राधे नाम का बार-बार उच्चारण यह दर्शाता है कि श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त करने का सहज मार्ग श्रीराधा की शरण है। यह भजन सरल होते हुए भी भक्त को गहरे आत्मिक अनुभव की ओर ले जाता है। यह भजन कब और कहाँ गाया जाता है यह भजन विशेष रूप से वृन्दावन, बरसाना और ब्रज क्षेत्र में नाम-संकीर्तन, राधाष्टमी, जन्माष्टमी और दैनिक जप के समय गाया जाता है। इस्कॉन मंदिरों, वैष्णव सत्संगों और घर में की जाने वाली साधना में भी यह भजन अत्यंत लोकप्रिय है।

भजन का परिचय यह भजन “भज मन राधे राधे गोविंदा” ब्रज वैष्णव परंपरा का अत्यंत सरल, मधुर और प्रभावशाली नाम-स्मरण भजन है। इसमें भक्त अपने मन को उपदेश देता है कि वह संसार की चंचलता छोड़कर श्रीराधा और श्रीकृष्ण के पावन नामों का निरंतर स्मरण करे। राधा और गोविंद का संयुक्त नाम जप वैष्णव भक्ति में सर्वोच्च माना गया है। भजन का भावार्थ इस भजन का मूल भाव यह है कि मनुष्य का मन बार-बार विषयों की ओर भटकता है, इसलिए उसे प्रेमपूर्वक समझाया गया है कि वह केवल राधे–राधे गोविंदा का जप करे। राधा नाम के साथ गोविंद का स्मरण यह दर्शाता है कि श्रीकृष्ण तक पहुँचने का सरल और सुलभ मार्ग श्रीराधा की कृपा है। यह भजन भक्त के हृदय में माधुर्य, प्रेम, दीनता और पूर्ण समर्पण का भाव उत्पन्न करता है। निरंतर दोहराव नाम-जप को सहज, गहन और रसपूर्ण बनाता है। यह भजन कब और कहाँ गाया जाता है यह भजन विशेष रूप से वृन्दावन, बरसाना और ब्रज क्षेत्र में नाम-संकीर्तन, राधाष्टमी, जन्माष्टमी, होली और दैनिक साधना के समय गाया जाता है। इस्कॉन मंदिरों, वैष्णव सत्संगों और व्यक्तिगत जप के लिए यह भजन अत्यंत उपयुक्त है।

परिचय भज गौरांग कहो गौरांग एक अत्यंत भावपूर्ण वैष्णव भजन है, जो श्री चैतन्य महाप्रभु (गौरांग प्रभु) और हरे कृष्ण महामंत्र की महिमा का गुणगान करता है। इस भजन में नाम-स्मरण, नृत्य, प्रेम-भक्ति और हरिनाम की शक्ति को सरल शब्दों में व्यक्त किया गया है। यह भजन वैष्णव परंपरा में नाम-संकीर्तन का प्रतीक माना जाता है। भजन / पाठ का फल इस भजन का श्रद्धा से गायन या श्रवण करने से: मन में नाम-स्मरण की रुचि बढ़ती है जीवन के क्लेश, दुःख और भय दूर होते हैं कृष्ण-प्रेम और वैराग्य का विकास होता है चित्त शुद्ध होकर आनंद और शांति की अनुभूति होती है भक्त को गौरांग प्रभु और श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है कलियुग में यह भजन मोक्ष का सरल साधन माना गया है

भज मन राधे राधे गोविन्द भजन का परिचय यह भजन “भज मन राधे राधे गोविन्द” ब्रज भक्ति परंपरा का एक अत्यंत मधुर और सरल भजन है, जो भक्त को सीधे राधा-कृष्ण नाम-स्मरण की ओर प्रेरित करता है। इस भजन में मन को उपदेश दिया गया है कि वह संसार की चंचलता छोड़कर श्रीराधा और श्रीकृष्ण के पावन नामों का निरंतर जप करे। राधा और गोविन्द का संयुक्त स्मरण वैष्णव भक्ति में सर्वोच्च माना गया है, क्योंकि श्रीराधा के बिना गोविन्द की प्राप्ति संभव नहीं मानी जाती। भजन का भावार्थ इस भजन का मुख्य भाव यह है कि मनुष्य का मन बार-बार विषयों की ओर भटकता है, इसलिए उसे प्रेमपूर्वक समझाया गया है कि वह राधे-राधे गोविन्द का स्मरण करे। “राधे-राधे गोविन्द, गोविन्द-राधे” का उच्चारण यह दर्शाता है कि राधा और कृष्ण एक-दूसरे से अभिन्न हैं। यह भजन भक्त के हृदय में माधुर्य, प्रेम और दीनता का भाव उत्पन्न करता है। जय-जय का उच्चारण आनंद, कृतज्ञता और उत्सव भाव को प्रकट करता है, जिससे नाम-जप और भी रसपूर्ण बन जाता है। यह भजन कब और कहाँ गाया जाता है यह भजन विशेष रूप से वृन्दावन, बरसाना और ब्रज क्षेत्र में नाम-संकीर्तन, राधाष्टमी, होली, जन्माष्टमी और दैनिक भजन-साधना के समय गाया जाता है। इस्कॉन मंदिरों और वैष्णव सत्संगों में भी इसे समूह कीर्तन के रूप में गाया जाता है। यह भजन व्यक्तिगत जप और सामूहिक कीर्तन — दोनों के लिए अत्यंत उपयुक्त है।

हरे कृष्ण महामंत्र वैष्णव परंपरा का अत्यंत पावन और प्रभावशाली मंत्र है, जिसे इस्कॉन (ISKCON) द्वारा पूरे विश्व में प्रचारित किया गया है। इस महामंत्र का नियमित जप करने से मन की अशांति दूर होती है, चित्त शुद्ध होता है और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम व भक्ति का भाव जागृत होता है। कलियुग में इसे आत्मिक उन्नति, शांति और मोक्ष प्राप्ति का सबसे सरल साधन माना गया है। #HareKrishna #HareKrishnaMahaMantra #ISKCON #KrishnaBhakti #NaamJapa #BhaktiYoga #Vaishnav #SanatanDharma

गुरु-वैष्णव वंदना भजन का परिचय यह भजन “हरि हराये नमः कृष्ण यादवाय नमः” गौड़ीय वैष्णव परंपरा की एक अत्यंत पावन और अनिवार्य वंदना है। यह भजन भगवान श्रीकृष्ण के नामों के स्मरण के साथ-साथ श्री गुरु, वैष्णवों, पंच-तत्त्व और षड् गोस्वामियों के चरणों में विनम्र नमन व्यक्त करता है। इस भजन को वैष्णव साधना में नाम-संकीर्तन का द्वार माना जाता है। भजन का भावार्थ इस भजन में भक्त सबसे पहले श्रीहरि और श्रीकृष्ण के अनेक नामों का जप करता है, जिससे मन शुद्ध होता है और अहंकार का क्षय होता है। इसके पश्चात श्री चैतन्य महाप्रभु, नित्यानंद प्रभु, अद्वैत आचार्य और समस्त गुरु-वैष्णव परंपरा के प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाती है। षड् गोस्वामियों के चरणों में वंदन कर यह स्वीकार किया गया है कि उन्हीं की कृपा से राधा-कृष्ण की नित्य लीलाओं का ज्ञान प्राप्त होता है। भक्त स्वयं को उनका दास मानते हुए उनके चरणों की धूल को जीवन का परम लक्ष्य बताता है। यह भजन कब और कहाँ गाया जाता है यह भजन इस्कॉन मंदिरों, गौड़ीय मठों और वैष्णव सत्संगों में कीर्तन प्रारंभ करने से पहले अनिवार्य रूप से गाया जाता है। गुरु पूजा, एकादशी, वैष्णव तिथियाँ और नाम-संकीर्तन के अवसरों पर इसका विशेष महत्व है।

शचीसुताष्टकम् श्री चैतन्य महाप्रभु की दिव्य महिमा का अत्यंत भावपूर्ण संस्कृत स्तोत्र है, जिसकी रचना सार्वभौम भट्टाचार्य ने की थी। इस स्तोत्र में श्री चैतन्य महाप्रभु को शचीमाता के पुत्र, नवगौर स्वरूप, प्रेमावतार और कलियुग के युगधर्म प्रवर्तक के रूप में प्रणाम किया गया है। इस स्तुति में महाप्रभु के नव-नव भाव, नव प्रेम, हरिनाम संकीर्तन, करुणा, नृत्य-कीर्तन और भक्तवत्सल स्वरूप का सुंदर वर्णन मिलता है। वे हरिनाम को धारण करने वाले, भक्तों के अश्रुओं से विगलित होने वाले और संसार के ताप को हरने वाले बताए गए हैं। शचीसुताष्टकम् यह स्पष्ट करता है कि कलियुग में हरिनाम संकीर्तन ही सर्वोच्च धर्म है। यह स्तोत्र वैष्णव साधकों के लिए श्रद्धा, विनय और प्रेम-भक्ति को जाग्रत करने वाला है। इसके पाठ और श्रवण से हृदय में नाम-रुचि, भक्ति-रस और चैतन्य महाप्रभु के चरणों में दृढ़ आश्रय उत्पन्न होता है।