श्री नरसिम्हा कवच - Shree Narasimha Kavacha

नृसिंह कवच एक अत्यंत प्रभावशाली और पवित्र स्तोत्र है, जो भगवान नृसिंह की कृपा और संरक्षण प्राप्त करने के लिए किया जाता है। यह कवच भक्त प्रह्लाद द्वारा प्रकट किया गया माना जाता है और इसमें भगवान के उग्र तथा करुणामय दोनों स्वरूपों का वर्णन मिलता है। इस स्तोत्र में भगवान नृसिंह को सर्वव्यापी रक्षक के रूप में स्मरण किया गया है, जो अपने भक्तों को हर प्रकार के भय, संकट, नकारात्मक शक्तियों और अनिष्ट प्रभावों से बचाते हैं।

नृसिंह कवचं वक्ष्येऽ प्रह्लादनोदितं पुरा।
सर्वरक्षाकरणं पुण्यं सर्वोप्रविनाशनम्॥

अर्थ - मैं अब भगवान नृसिंह के उस दिव्य कवच का वर्णन करता हूँ, जिसे प्रह्लाद महाराज ने प्रकट किया था। यह अत्यंत पवित्र और कल्याणकारी है, जो साधक के सभी प्रकार के संकटों, भय और बाधाओं का नाश करता है तथा उसे हर दिशा से दिव्य सुरक्षा प्रदान करता है।

 

सर्वसंपत्करं चैव स्वर्गमोक्षप्रदायकम्।
ध्यात्वा नृसिंहं देवेशं हेमसिंहासनस्थितम्॥

अर्थ - यह कवच सभी प्रकार की संपत्ति, ऐश्वर्य और सुख प्रदान करने वाला है तथा अंततः स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति कराता है। इसका पाठ करने से पूर्व साधक को स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान भगवान नृसिंह का ध्यान करना चाहिए, जो समस्त देवताओं के ईश्वर हैं।

 

विवृतास्यं त्रिनयनं शरदिन्दुसमप्रभम्।
लक्ष्म्यालिङ्गितवामाङ्गं विभूतिभिरुपाश्रितम्॥

अर्थ - भगवान का मुख खुला हुआ है, उनके तीन नेत्र हैं और वे शरद ऋतु के चंद्रमा के समान उज्ज्वल हैं। उनके बाएँ भाग में माता लक्ष्मी विराजमान हैं और उनका स्वरूप समस्त दिव्य ऐश्वर्यों से युक्त है।

 

चतुर्भुजं कोमलाङ्गं स्वर्णकुण्डलशोभितम्।
ऊरोजशोभितोरस्कं रत्नकेयूरमुद्रितम्॥

अर्थ - भगवान की चार भुजाएँ हैं, उनका शरीर अत्यंत कोमल और सुंदर है। वे स्वर्ण कुंडलों से सुशोभित हैं, उनका वक्षस्थल तेजस्वी है और उनकी भुजाएँ रत्नजड़ित आभूषणों से अलंकृत हैं।

 

तप्तकाञ्चनसंकाशं पीतनिर्मलवाससम्।
इन्द्रादिसुरमौलिस्थस्फुरन्माणिक्यदीप्तिभिः॥

अर्थ - भगवान का स्वरूप तपे हुए सोने के समान चमकदार है और उन्होंने निर्मल पीले वस्त्र धारण किए हैं। वे इन्द्र आदि देवताओं के मुकुटों में जड़े माणिक्यों की ज्योति से और भी अधिक तेजस्वी प्रतीत होते हैं।

 

विराजितपदद्वन्द्वं शङ्खचक्रादिहेतिभिः।
गरुत्मता विनयात्स्तुत्यमानं मुदा अन्वितम्॥

अर्थ - भगवान के दोनों चरण अत्यंत सुंदर और तेजस्वी हैं, और वे शंख, चक्र आदि दिव्य आयुधों से सुसज्जित हैं। गरुड़ जी अत्यंत विनम्रता और आनंद के साथ उनकी स्तुति कर रहे हैं।

 

स्वहृत्कमलसंवासं कृत्वा तु कवचं पठेत्।
नृसिंहो मे शिरः पातु लोकरक्षार्थसम्भवः॥

अर्थ - अपने हृदय रूपी कमल में भगवान नृसिंह को स्थापित करके इस कवच का पाठ करना चाहिए। वे भगवान, जो समस्त लोकों की रक्षा के लिए प्रकट हुए हैं, मेरे मस्तक की रक्षा करें।

 

सर्वगोऽपि स्तम्भवासः फलं मे रक्षतु ध्वनिम्।
नृसिंहो मे दृशौ पातु सोमसूर्याग्निलोचनः॥

अर्थ - यद्यपि भगवान सर्वव्यापी हैं, फिर भी वे स्तंभ में प्रकट हुए। वे मेरी वाणी और कर्मों के फल की रक्षा करें तथा सूर्य, चंद्र और अग्नि के समान नेत्रों वाले भगवान मेरी आँखों की रक्षा करें।

 

श्रुति मे पातु नरहरिर्मुनिवर्यस्तुतिप्रियः।
नासां मे सिंहनासस्तु मुखं लक्ष्मीमुखप्रियः॥

अर्थ - श्रेष्ठ मुनियों द्वारा स्तुति प्रिय भगवान नरहरि मेरी श्रवण शक्ति की रक्षा करें। सिंह के समान नासिका वाले भगवान मेरी नाक की रक्षा करें और लक्ष्मी जी को प्रिय भगवान मेरे मुख की रक्षा करें।

 

सर्वविद्याधिपः पातु नृसिंहो रसनां मम।
वक्त्रं पातु इन्दुवदनः सदा प्रह्लादवन्दितः॥

अर्थ - समस्त विद्याओं के अधिपति भगवान नृसिंह मेरी जिह्वा की रक्षा करें। चंद्रमा के समान मुख वाले और प्रह्लाद द्वारा सदैव पूजित भगवान मेरे मुख की रक्षा करें।

 

नृसिंहः पातु मे कण्ठं स्कन्धौ भूभरणान्तकृत्।
दिव्यास्त्रशोभितभुजो नृसिंहः पातु मे भुजौ॥

अर्थ - भगवान नृसिंह मेरे कंठ की रक्षा करें, जो पृथ्वी का भार हरने वाले हैं। उनके दिव्य अस्त्रों से शोभायमान भुजाएँ मेरे कंधों और भुजाओं की रक्षा करें।

 

करौ मे देववरदो नृसिंहः पातु सर्वतः।
हृदयं योगिसाध्यश्च निवासं पातु मे हरिः॥

अर्थ - देवताओं को वर देने वाले भगवान नृसिंह मेरे हाथों की रक्षा करें और मुझे चारों ओर से सुरक्षित रखें। योगियों द्वारा प्राप्त होने वाले भगवान हरि मेरे हृदय और निवास स्थान की रक्षा करें।

 

मध्यं पातु हिरण्याक्षवक्षःकुक्षिविदारणः।
नाभिं मे पातु नृहरिः स्वनाभिब्रह्मसंस्तुतः॥

अर्थ - जिन्होंने हिरण्याक्ष के वक्ष और पेट को विदीर्ण किया, वे भगवान मेरी कमर की रक्षा करें। जिनकी नाभि से ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए, वे मेरी नाभि की रक्षा करें।

 

ब्रह्माण्डकोटयः कत्यां यस्यासौ पातु मे कटिम्।
गुह्यं मे पातु गुह्यानां मन्त्राणां गुह्यरूपधृत्॥

अर्थ - जिनकी कटि पर अनगिनत ब्रह्मांड स्थित हैं, वे मेरी कटि की रक्षा करें। जो समस्त रहस्यों के ज्ञाता हैं, वे मेरे गुप्त अंगों की रक्षा करें।

 

उरू मनोभवः पातु जानुनी नररूपधृत्।
जङ्घे पातु धराभारहर्ता योऽसौ नृकेसरी॥

अर्थ - मनोभाव स्वरूप भगवान मेरी जांघों की रक्षा करें। मनुष्य रूप धारण करने वाले भगवान मेरे घुटनों की रक्षा करें और नृकेसरी (नरसिंह) मेरी पिंडलियों की रक्षा करें।

 

सुरराज्यप्रदः पातु पादौ मे नृहरिश्वरः।
सहस्रशीर्षा पुरुषः पातु मे सर्वशः तनुम्॥

अर्थ - स्वर्ग का राज्य देने वाले भगवान मेरे चरणों की रक्षा करें। सहस्र शीश वाले परम पुरुष मेरे पूरे शरीर की हर दिशा से रक्षा करें।

 

महोग्रः पूर्वतः पातु महावीरग्रजोऽग्नितः।
महाविष्णुर्दक्षिणे तु महाज्वालास्तु नैऋते॥

अर्थ - अत्यंत उग्र स्वरूप भगवान पूर्व दिशा से मेरी रक्षा करें। अग्नि दिशा से महावीर स्वरूप भगवान रक्षा करें, दक्षिण दिशा से महाविष्णु और नैऋत्य दिशा से तेजस्वी रूप मेरी रक्षा करें।

 

पश्चिमे पातु सर्वेशो दिशि मे सर्वतोमुखः।
नृसिंहः पातु वायव्यां सौम्यां कृष्णविग्रहः॥

अर्थ - पश्चिम दिशा से सर्वेश्वर मेरी रक्षा करें, जिनका मुख सर्वत्र है। वायव्य दिशा से भगवान नृसिंह रक्षा करें और उत्तर दिशा से सौम्य रूप वाले भगवान रक्षा करें।

 

ईशान्यां पातु भद्रो मे सर्वमङ्गलदायकः।
संसारभयदः पातु मृत्युर्मृत्युर्नृकेसरी॥

अर्थ - ईशान दिशा से सर्वमंगल देने वाले भगवान मेरी रक्षा करें। जो मृत्यु के भी मृत्यु हैं, वे भगवान नृकेसरी मुझे संसार के भय और मृत्यु के डर से बचाएं।

 

इदं नृसिंहकवचं प्रह्लादमुखमण्डितम्।
भक्तिमान्यः पठेन्नित्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते॥

अर्थ - यह नृसिंह कवच प्रह्लाद के मुख से प्रकट हुआ है। जो भक्त इसका नित्य पाठ करता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

 

पुत्रवान् धनवान् लोके दीर्घायुरुपजायते।
यं यं कामयते कामं तं तं प्राप्नोत्यसंशयम्॥

अर्थ - इसका पाठ करने वाला व्यक्ति पुत्र, धन और दीर्घायु प्राप्त करता है। वह जो भी इच्छा करता है, वह बिना संदेह पूर्ण होती है।

 

सर्वत्र जयमाप्नोति सर्वत्र विजयी भवेत्।
भूम्यन्तरिक्षदिव्यानां ग्रहाणां विनिवारणम्॥

अर्थ - यह कवच साधक को हर जगह विजय दिलाता है और उसे विजयी बनाता है। यह पृथ्वी, आकाश और दिव्य लोकों के ग्रहों के दुष्प्रभाव को दूर करता है।

 

वृश्चिकोर्गसम्भूतविषापहरणं परम्।
ब्रह्मरक्षासराक्षाणां दूरोत्सारणकारणम्॥

अर्थ - यह सर्प और बिच्छुओं के विष का नाश करने वाला है तथा ब्रह्मराक्षस, यक्ष आदि दुष्ट शक्तियों को दूर भगाने वाला है।

 

भूर्जे वा तलपत्रे वा कवचं लिखितं शुभम्।
करमूले धृतं येन सिद्धयेयुः कर्मसिद्धयः॥

अर्थ - इस कवच को भोजपत्र या ताड़पत्र पर लिखकर धारण करने से सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं और जीवन में सफलता प्राप्त होती है।

 

देवासुरमनुष्येषु स्वं स्वमेव जयं लभेत्।
एकसंध्यं त्रिसंध्यं वा यः पठेन्नियतः नरः॥

अर्थ - जो व्यक्ति नियमित रूप से एक बार या तीन बार इसका पाठ करता है, वह देवता, असुर और मनुष्यों में भी विजयी होता है।

 

सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति।
द्वात्रिंशतिसहस्राणि पाठाच्छुद्धात्मनां नृणाम्॥

अर्थ - शुद्ध मन से इसका बार-बार पाठ करने वाला व्यक्ति समस्त मंगलों में श्रेष्ठ मंगल, भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त करता है।

 

कवचस्यास्य मन्त्रस्य मन्त्रसिद्धिः प्रजायते।
अनेन मन्त्रराजेन कृत्वा भस्माभिमन्त्रणम्॥

अर्थ - यह कवच मंत्रों का राजा है और इसके अभ्यास से मंत्र सिद्धि प्राप्त होती है। इससे अभिमंत्रित भस्म भी अत्यंत प्रभावशाली होती है।

 

तिलकं बिभ्र्याद्यस्तु तस्य ग्रहभयं हरेत्।
त्रिवारं जपमानस्तु दत्तं वार्यभिमन्त्र्य च॥

अर्थ - इसका तिलक धारण करने और जल को अभिमंत्रित करके पीने से सभी प्रकार के ग्रह दोष और भय दूर हो जाते हैं।

 

प्रशयेद्यं नरं मन्त्रं नृसिंहध्यानमाचरेत्।
तस्य रोगाः प्रणश्यन्ति ये च स्युः कुक्षिसम्भवाः॥

अर्थ - जो व्यक्ति भगवान नृसिंह का ध्यान करते हुए इस मंत्र का जप करता है, उसके सभी रोग, विशेषकर पेट से संबंधित रोग नष्ट हो जाते हैं।

 

किमत्र बहुनोक्तेन नृसिंहसदृशो भवेत्।
मनसा चिन्तितं यत्तु स तच्चाप्नोत्यसंशयम्॥

अर्थ - अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है, यह कवच साधक को भगवान नृसिंह के समान शक्तिशाली बना देता है। वह जो भी मन में सोचता है, वह अवश्य प्राप्त करता है।

 

गर्जन्तं गार्जयन्तं निजभुजपटलं स्फोटयन्तं हरन्तं दीप्यन्तं तपयन्तं दिवि भुवि दैतिजं क्षेपयन्तं क्षिपन्तम्।
क्रन्दन्तं रोषयन्तं दिशि दिशि सततं संहरन्तं भ्रमन्तं विक्षन्तं घूर्णयन्तं करनिकरशतैर्दिव्यसिंहं नमामि॥

अर्थ - मैं उस दिव्य सिंह स्वरूप भगवान को प्रणाम करता हूँ, जो प्रचंड गर्जना करते हैं और अपनी असंख्य भुजाओं से दैत्यों का संहार करते हैं। वे समस्त दिशाओं में घूमते हुए दुष्टों का नाश करते हैं, संसार को प्रकाशित करते हैं और अपने भक्तों की रक्षा करते हुए सम्पूर्ण ब्रह्मांड का पालन करते हैं।

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गुरु अष्टकम् - Guru Ashtakam
गुरु अष्टकम् - Guru Ashtakam

परिचय श्री गुरु अष्टकम् वैष्णव परंपरा का अत्यंत पावन स्तोत्र है, जिसकी रचना श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने की थी। यह स्तुति सद्गुरु को भगवान श्रीकृष्ण की कृपा का साक्षात् माध्यम मानते हुए उनके श्रीचरणों में पूर्ण शरणागति का भाव प्रकट करती है। इसमें गुरु को अज्ञानरूपी अग्नि से संसार को बचाने वाला, भक्ति का मार्ग दिखाने वाला और राधा-कृष्ण प्रेम का दाता बताया गया है। भावार्थ इस स्तुति का भाव यह है कि सद्गुरु की कृपा से ही जीव संसाररूपी दावानल से मुक्त होकर भक्ति के मार्ग पर अग्रसर होता है। गुरु न केवल शास्त्रज्ञान प्रदान करते हैं, बल्कि अपने आचरण, सेवा और प्रेम के द्वारा भक्त को राधा-कृष्ण की मधुर लीलाओं से जोड़ते हैं। गुरु की प्रसन्नता से ही भगवान की प्रसन्नता प्राप्त होती है, और उनकी कृपा के बिना मोक्ष या भक्ति की सिद्धि संभव नहीं है।

भज गौरांग कहो गौरांग - Bhaj Gaurang Kaha Gaurang
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परिचय भज गौरांग कहो गौरांग एक अत्यंत भावपूर्ण वैष्णव भजन है, जो श्री चैतन्य महाप्रभु (गौरांग प्रभु) और हरे कृष्ण महामंत्र की महिमा का गुणगान करता है। इस भजन में नाम-स्मरण, नृत्य, प्रेम-भक्ति और हरिनाम की शक्ति को सरल शब्दों में व्यक्त किया गया है। यह भजन वैष्णव परंपरा में नाम-संकीर्तन का प्रतीक माना जाता है। भजन / पाठ का फल इस भजन का श्रद्धा से गायन या श्रवण करने से: मन में नाम-स्मरण की रुचि बढ़ती है जीवन के क्लेश, दुःख और भय दूर होते हैं कृष्ण-प्रेम और वैराग्य का विकास होता है चित्त शुद्ध होकर आनंद और शांति की अनुभूति होती है भक्त को गौरांग प्रभु और श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है कलियुग में यह भजन मोक्ष का सरल साधन माना गया है

 राधे राधे गोविन्द - Radhe Radhe Govinda
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भज मन राधे राधे गोविन्द भजन का परिचय यह भजन “भज मन राधे राधे गोविन्द” ब्रज भक्ति परंपरा का एक अत्यंत मधुर और सरल भजन है, जो भक्त को सीधे राधा-कृष्ण नाम-स्मरण की ओर प्रेरित करता है। इस भजन में मन को उपदेश दिया गया है कि वह संसार की चंचलता छोड़कर श्रीराधा और श्रीकृष्ण के पावन नामों का निरंतर जप करे। राधा और गोविन्द का संयुक्त स्मरण वैष्णव भक्ति में सर्वोच्च माना गया है, क्योंकि श्रीराधा के बिना गोविन्द की प्राप्ति संभव नहीं मानी जाती। भजन का भावार्थ इस भजन का मुख्य भाव यह है कि मनुष्य का मन बार-बार विषयों की ओर भटकता है, इसलिए उसे प्रेमपूर्वक समझाया गया है कि वह राधे-राधे गोविन्द का स्मरण करे। “राधे-राधे गोविन्द, गोविन्द-राधे” का उच्चारण यह दर्शाता है कि राधा और कृष्ण एक-दूसरे से अभिन्न हैं। यह भजन भक्त के हृदय में माधुर्य, प्रेम और दीनता का भाव उत्पन्न करता है। जय-जय का उच्चारण आनंद, कृतज्ञता और उत्सव भाव को प्रकट करता है, जिससे नाम-जप और भी रसपूर्ण बन जाता है। यह भजन कब और कहाँ गाया जाता है यह भजन विशेष रूप से वृन्दावन, बरसाना और ब्रज क्षेत्र में नाम-संकीर्तन, राधाष्टमी, होली, जन्माष्टमी और दैनिक भजन-साधना के समय गाया जाता है। इस्कॉन मंदिरों और वैष्णव सत्संगों में भी इसे समूह कीर्तन के रूप में गाया जाता है। यह भजन व्यक्तिगत जप और सामूहिक कीर्तन — दोनों के लिए अत्यंत उपयुक्त है।

हरे कृष्ण महामंत्र - Hare Krishna Mahamantra
हरे कृष्ण महामंत्र - Hare Krishna Mahamantra

हरे कृष्ण महामंत्र वैष्णव परंपरा का अत्यंत पावन और प्रभावशाली मंत्र है, जिसे इस्कॉन (ISKCON) द्वारा पूरे विश्व में प्रचारित किया गया है। इस महामंत्र का नियमित जप करने से मन की अशांति दूर होती है, चित्त शुद्ध होता है और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम व भक्ति का भाव जागृत होता है। कलियुग में इसे आत्मिक उन्नति, शांति और मोक्ष प्राप्ति का सबसे सरल साधन माना गया है। #HareKrishna #HareKrishnaMahaMantra #ISKCON #KrishnaBhakti #NaamJapa #BhaktiYoga #Vaishnav #SanatanDharma

हरि हराये नमः कृष्ण यादवाय नमः - Hari Haraye Namah Krishna Yadvay Namah
हरि हराये नमः कृष्ण यादवाय नमः - Hari Haraye Namah Krishna Yadvay Namah

गुरु-वैष्णव वंदना भजन का परिचय यह भजन “हरि हराये नमः कृष्ण यादवाय नमः” गौड़ीय वैष्णव परंपरा की एक अत्यंत पावन और अनिवार्य वंदना है। यह भजन भगवान श्रीकृष्ण के नामों के स्मरण के साथ-साथ श्री गुरु, वैष्णवों, पंच-तत्त्व और षड् गोस्वामियों के चरणों में विनम्र नमन व्यक्त करता है। इस भजन को वैष्णव साधना में नाम-संकीर्तन का द्वार माना जाता है। भजन का भावार्थ इस भजन में भक्त सबसे पहले श्रीहरि और श्रीकृष्ण के अनेक नामों का जप करता है, जिससे मन शुद्ध होता है और अहंकार का क्षय होता है। इसके पश्चात श्री चैतन्य महाप्रभु, नित्यानंद प्रभु, अद्वैत आचार्य और समस्त गुरु-वैष्णव परंपरा के प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाती है। षड् गोस्वामियों के चरणों में वंदन कर यह स्वीकार किया गया है कि उन्हीं की कृपा से राधा-कृष्ण की नित्य लीलाओं का ज्ञान प्राप्त होता है। भक्त स्वयं को उनका दास मानते हुए उनके चरणों की धूल को जीवन का परम लक्ष्य बताता है। यह भजन कब और कहाँ गाया जाता है यह भजन इस्कॉन मंदिरों, गौड़ीय मठों और वैष्णव सत्संगों में कीर्तन प्रारंभ करने से पहले अनिवार्य रूप से गाया जाता है। गुरु पूजा, एकादशी, वैष्णव तिथियाँ और नाम-संकीर्तन के अवसरों पर इसका विशेष महत्व है।

शचीसुताष्टकम् - Sacisutastaka -  Sri Sachi-Suta Ashtakam
शचीसुताष्टकम् - Sacisutastaka - Sri Sachi-Suta Ashtakam

शचीसुताष्टकम् श्री चैतन्य महाप्रभु की दिव्य महिमा का अत्यंत भावपूर्ण संस्कृत स्तोत्र है, जिसकी रचना सार्वभौम भट्टाचार्य ने की थी। इस स्तोत्र में श्री चैतन्य महाप्रभु को शचीमाता के पुत्र, नवगौर स्वरूप, प्रेमावतार और कलियुग के युगधर्म प्रवर्तक के रूप में प्रणाम किया गया है। इस स्तुति में महाप्रभु के नव-नव भाव, नव प्रेम, हरिनाम संकीर्तन, करुणा, नृत्य-कीर्तन और भक्तवत्सल स्वरूप का सुंदर वर्णन मिलता है। वे हरिनाम को धारण करने वाले, भक्तों के अश्रुओं से विगलित होने वाले और संसार के ताप को हरने वाले बताए गए हैं। शचीसुताष्टकम् यह स्पष्ट करता है कि कलियुग में हरिनाम संकीर्तन ही सर्वोच्च धर्म है। यह स्तोत्र वैष्णव साधकों के लिए श्रद्धा, विनय और प्रेम-भक्ति को जाग्रत करने वाला है। इसके पाठ और श्रवण से हृदय में नाम-रुचि, भक्ति-रस और चैतन्य महाप्रभु के चरणों में दृढ़ आश्रय उत्पन्न होता है।