मोर मुकुट माथे तिलक विराजे - Mor Mukut Mathe Tilak Viraje
परिचय
यह अत्यंत मधुर और भक्तिरस से परिपूर्ण भजन श्रीबांके बिहारी जी की मनमोहक छवि और उनकी दिव्य माधुर्य लीलाओं का सुंदर वर्णन करता है। इस भजन में भक्त भगवान श्रीकृष्ण के मोर मुकुट, तिलक, कुंडल और मधुर मुरली वादन की छवि का भावपूर्ण गुणगान करता है।
भजन में श्रीकृष्ण की सुंदरता और उनकी मोहिनी मुस्कान का ऐसा वर्णन है, जिसे देखकर भक्त का मन प्रेम और आनंद में डूब जाता है। राधा रानी को रिझाने वाली मुरली की मधुर ध्वनि भक्त के हृदय को भी भक्ति रस से भर देती है।
यह भजन मीरा बाई की प्रेममयी भक्ति की भावना को भी प्रकट करता है, जहाँ भगवान की दिव्य छवि देखकर भक्त आत्मविभोर हो जाता है। यह भजन श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम, समर्पण और माधुर्य भक्ति का सुंदर उदाहरण है।
भावार्थ
इस भजन में भक्त श्रीकृष्ण की सुंदर छवि का वर्णन करते हुए उन्हें बार-बार प्रणाम करता है। उनके सिर पर सजे मोर मुकुट, माथे के तिलक और सुंदर कुंडलों की शोभा भक्त के मन को मोह लेती है।
भक्त कहता है कि श्रीकृष्ण अपनी मधुर मुरली से राधा रानी को रिझाते हैं और उसी प्रकार भक्तों के हृदय को भी प्रेमरस से भर देते हैं।
अंत में मीरा बाई की भक्ति भावना का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि भगवान की इस सुंदर छवि के दर्शन से भक्त पूर्ण रूप से आनंद और प्रेम में मग्न हो जाता है। यही इस भजन का मुख्य भाव है।