जया एकादशी 2026 व्रत: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि व कथा

सनातन धर्म में एकादशी व्रत का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। हर वर्ष चौबीस एकादशी आती है किन्तु जब अधिकमास आता है तब इनकी संख्या 24 से बढ़कर 26 हो जाती है। हर एकादशी का अपना ही अलग अलग महत्व होता है। आइये जानते हैं आने वाली इस वर्ष की विशेष फलदाई जया एकादशी जो की माघ मास के शुक्ल पक्ष में आती है। शास्त्रों के अनुसार जया एकादशी आपके सभी पापों का नाश करनी वाली और मोक्ष प्रदान करने वाली है। जो भी इस एकादशी का पालन विधिपूर्वक और नियम पालन के साथ करता है और जया एकादशी की कथा पढ़ता या सुनता है वो श्री हरी की विशेष कृपा का पात्र बनता है।

By: RevivingCultures
Published on: 21 January 2026 at 11:58 pm / Updated on: 24 May 2026 at 11:09 pm
जया एकादशी 2026 व्रत: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि व कथा

आइये जानते हैं जया एकादशी का महत्व, व्रत कथा, व्रत के विधि विधान

जया एकादशी का महत्व

माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहते है। श्री कृष्ण ने खुद इस एकादशी का महत्व युधिष्ठिर को बताया था। पद्मा पुराण के अनुसार जो भी जया एकादशी का पालन श्रद्धापूर्वक करता है वो भूत-प्रेत और पिशाच जैसे योनि से मुक्त हो जाता है और मोक्ष के द्वार भी उसके लिए खुल जाते है। यह एकादशी मन की पवित्रता बनाये रखने और हमारे द्वारा जाने अनजाने में किये गए पापों के प्रायश्चित का विशेष साधन है। यह व्रत ना केवल हमें मानसिक पापों से मुक्ति दिलाता है साथ ही साथ हमें श्री हरी के धाम में वास भी मिलता है और विष्णु जी और माँ लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और इस व्रत को करने से घर में शांति और सुख-समृद्धि भी आती है।

जया एकादशी 2026 की तिथि, शुभ मुहूर्त और पारण का समय

हिन्दू पंचांग क अनुसार जया एकादशी 28 जनवरी की शाम 4 बजकर 35 मिनट से शुरू होगी और 29 जनवरी की दोपहर 1 बजकर 55 मिनट पर इसका समापन होगा इसलिए जया एकादशी का व्रत 29 जनवरी को रखा जायेगा।

पारण का शुभ समय - 30 जनवरी द्वादशी को सुबह 7 बजकर 10 मिनट से 10 बजकर 47 मिनट के बीच किया जायेगा।

जया एकादशी को करने की पूजा विधि क्या है।

  • व्रत करने वाले स्त्री या पुरुष को सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद पीले वस्त्र धारण करने चाहिए।
  • भगवान श्री हरी के सामने हथेली में जल लेकर व्रत का संकलप ले।
  • भगवान श्री हरी को पीले फूल, पीले फल ,तुलसी दल और पंचामृत अर्पित करें।
  • व्रती को "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय " और विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए।
  • एकादशी व्रत कथा का पाठ और आरती कीजिये।

जया एकादशी पर क्या करें क्या ना करें

क्या करें?

  • विचारों को सात्विक रखिये, जरूरतमंदों को दान आदि करें।
  • भजन कीर्तन और विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें।

क्या ना करें

  • एकादशी पर चावल का सेवन गलती से भी ना करें तामसिक भोजन से दूर रह।
  • क्रोध करने से बचे और किसी की भी बुराई ना करें इससे हमारे सारे पुण्य नष्ट हो जाते हैं।

जया एकादशी व्रत कथा

पद्य पुराण के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर ने अपनी जिज्ञासा व्यक्त करते हुए भगवान से पूछा की है भगवन ! अब आप कृपा करके माघ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में बताइये इसको करने से किस फल की प्राप्ति होती है इस एकादशी का क्या नाम है। इसकी कथा और विधि के बारे में बताइये। तब श्री कृष्ण ने महाराज युधिष्ठिर को इसके बारे में बताते हुए कहा था कि है राजन इस एकादशी को जया एकादशी कहते है और इस व्रत को करने से मनुष्य सभी पापों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है अब आगे मैं तुम्हे इसकी कथा बताता हूँ ।

एक बार की बात है । स्वर्गलोक में देवराज इन्द्र और देवगण पारिजात वृक्षों से युक्त नंदनवन में अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे । गन्धर्वों के नायक देवराज इन्द्र ने अपनी प्रसन्नता के लिए वन में विहार करते हुए बड़े हर्ष के साथ नृत्य का आयोजन किया । गन्धर्व उसमें गान कर रहे थे, जिसमे चित्रसेन और उसकी पत्नी मालिनी और पुत्र माल्यवान थे तथा पुष्पदंत और उसकी पुत्री पुष्पवन्ती उपस्थित थे । माल्यवान और पुष्पवन्ती दोनों एक दूसरे के रूप पर अत्यन्त मोहित हो गए । ये दोनों भी इन्द्र की प्रसन्नता के लिए नृत्य करने आये थे । इन दोनों का गान हो रहा था । इनके साथ अप्सराएँ भी थीं । परस्पर अनुराग दृष्टि होने के कारण ये दोनों मोह के वशीभूत हो गये । चित्त में भ्रान्ति आ गयी इसलिए वे शुद्ध गान ना गा सके । कभी ताल भंग हो जाता था तो कभी गीत बंद हो जाता था । इन्द्र इनके प्रेम को समाज गए और इसे अपना अपमान समझकर इंद्र क्रोधित हो गये । अत: उन दोनों को श्राप देते हुए बोले : ‘ओ मूर्खो ! तुम दोनों पर धिक्कार है ! तुम दोनों पतित हो और मेरी आज्ञाभंग करनेवाले हो, अत: तुम दोनों मृत्यु लोक में जाकर पति पत्नी के रुप में रहते हुए पिशाच हो जाओ और अपने कर्मों का फल भोगो ।’

इन्द्र के इस प्रकार श्राप देने पर उन दोनों को मन में बड़ा दु:ख हुआ । वे हिमालय पर्वत पर चले गये और पिशाचयोनि को पाकर भयंकर दु:ख भोगने लगे । शारीरिक पातक से उत्पन्न ताप से पीड़ित होकर दोनों ही पर्वत की कन्दराओं में विचरते रहते थे । एक दिन पिशाच ने अपनी पत्नी पिशाचीनी से कहा : ‘हमने कौन सा पाप किया है, जिससे यह पिशाचयोनि प्राप्त हुई है ? नरक का कष्ट अत्यन्त भयंकर है तथा पिशाचयोनि भी बहुत दु:ख देनेवाली है । अत: पूर्ण प्रयत्न करके पाप से बचना चाहिए ।’

इस प्रकार चिन्तामग्न होकर वे दोनों दु:ख के कारण सूखते जा रहे थे । दैवयोग से उन्हें माघ मास के शुक्लपक्ष की एकादशी की तिथि प्राप्त हो गयी । ‘जया’ नाम से विख्यात वह तिथि सब तिथियों में उत्तम है । उस दिन उन दोनों ने सब प्रकार के आहार त्याग दिये, जल पान तक नहीं किया । किसी जीव की हिंसा नहीं की, यहाँ तक कि खाने के लिए फल तक नहीं काटा । निरन्तर दु:ख से युक्त होकर वे एक पीपल के समीप बैठे रहे । सूर्यास्त हो गया । उनके प्राण हर लेने वाली भयंकर रात्रि उपस्थित हुई । उन्हें नींद नहीं आयी । दूसरे दिन सूर्यादय हुआ और द्वादशी का दिन आया । इस प्रकार उस पिशाच दंपति के द्वारा ‘जया’ के उत्तम व्रत का पालन हो गया । उन्होंने रात में जागरण भी किया था । उस व्रत के प्रभाव से तथा भगवान विष्णु की शक्ति से उन दोनों का पिशाचत्व दूर हो गया । पुष्पवन्ती और माल्यवान अपने पूर्वरुप में आ गये । उनके हृदय में वही पुराना स्नेह उमड़ रहा था । उनके शरीर पर पहले जैसे ही अलंकार शोभा पा रहे थे । वे दोनों मनोहर रुप धारण करके विमान पर बैठे और स्वर्गलोक में चले गये । वहाँ देवराज इन्द्र के सामने जाकर दोनों ने बड़ी प्रसन्नता के साथ उन्हें प्रणाम किया । उन्हें इस रुप में उपस्थित देखकर इन्द्र को बड़ा विस्मय हुआ ! उन्होंने पूछा: ‘बताओ, किस पुण्य के प्रभाव से तुम दोनों का पिशाचत्व दूर हुआ है? तुम मेरे श्राप को प्राप्त हो चुके थे, फिर किस देवता ने तुम्हें उससे छुटकारा दिलाया है?’

माल्यवान बोला : स्वामि ! भगवान वासुदेव की कृपा तथा ‘जया’ नामक एकादशी के व्रत से हमारा पिशाचत्व दूर हुआ है ।

इन्द्र ने कहा : … तो अब तुम दोनों मेरे कहने से सुधापान करो । जो लोग एकादशी के व्रत में तत्पर और भगवान श्रीकृष्ण के शरणागत होते हैं, वे हमारे भी पूजनीय होते हैं ।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं हे राजन् ! इस कारण एकादशी का व्रत करना चाहिए ।‘जया’ ब्रह्महत्या का पाप भी दूर करनेवाली है । जिसने ‘जया’ का व्रत किया है, उसने सब प्रकार के दान दे दिये और सम्पूर्ण यज्ञों का अनुष्ठान कर लिया । इस माहात्म्य के पढ़ने और सुनने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है ।

जय एकादशी व्रत कथा सम्पूर्ण हुई बोलो

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे !