मैं तो गोवर्धन कु जाऊ मेरी वीर - Mai To Govardhan Ku Jau Meri Veer
परिचय
यह अत्यंत मधुर और भक्तिरस से भरा गोवर्धन भजन भक्त के मन में बसे ब्रज प्रेम और गिरिराज गोवर्धन के प्रति अटूट श्रद्धा का सुंदर चित्रण करता है। इस भजन में भक्त अपने मन की तीव्र इच्छा व्यक्त करता है कि वह गोवर्धन धाम जाकर गिरिराज जी की परिक्रमा करे, मानसी गंगा में स्नान करे और संतों की सेवा कर भगवान के दर्शन प्राप्त करे।
भजन में ब्रजभक्ति की सरलता और प्रेममयी भावना झलकती है। भक्त का मन संसार में कहीं नहीं लगता और वह बार-बार केवल गोवर्धन जाने की ही इच्छा प्रकट करता है। गिरिराज महाराज की परिक्रमा, संत सेवा और हरि दर्शन की लालसा इस भजन को अत्यंत भावपूर्ण बना देती है।
यह भजन केवल तीर्थ यात्रा का वर्णन नहीं बल्कि भगवान श्रीकृष्ण और ब्रजधाम के प्रति गहरी भक्ति, प्रेम और समर्पण का दिव्य प्रतीक है।
भावार्थ
इस भजन में भक्त कहता है कि उसका मन किसी भी प्रकार से नहीं मानता और वह केवल गोवर्धन धाम जाना चाहता है। वह गिरिराज जी की सात कोस परिक्रमा करना, मानसी गंगा में स्नान करना और संतों को भोजन कराना चाहता है।
भक्त के हृदय में श्रीकृष्ण के दर्शन की तीव्र लालसा है और वह ब्रजभूमि की सेवा को ही अपने जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य मानता है। उसका मन संसारिक इच्छाओं से हटकर केवल हरि भक्ति में रम गया है।
यह भजन दर्शाता है कि सच्चा भक्त भगवान और उनके धाम के प्रति इतना प्रेम रखता है कि उसका मन हर समय उसी स्मरण और दर्शन की अभिलाषा में लगा रहता है।