कब रखा जायेगा इस बार की निर्जला एकादशी का व्रत 24 या 25 जून? जानें सही तिथि

आइये जानते हैं की  निर्जला एकादशी सभी एकादशियों  में सबसे महत्वपूर्ण स्थान क्यों रखती है सिर्फ इस एकादशी को करने से कैसे सभी वर्षभर में आने वाली एकादशियों का फल प्राप्त होता है?

By: Reviving Cultures
Published on: 14 June 2026 at 9:33 pm / Updated on: 14 June 2026 at 9:41 pm
कब रखा जायेगा इस बार की निर्जला एकादशी का व्रत 24 या 25 जून? जानें सही तिथि

निर्जला एकादशी का महत्व , पूजा विधि, व्रत नियम ,कथा एवं पारण का समय 

निर्जला एकादशी जिसे  "पांडव निर्जला एकादशी" और  "भीमसेनी एकादशी"  के नाम से भी जाना जाता है।  हिन्दू धर्म में एकादशी व्रत की बहुत महत्वता है किन्तु इन सभी एकादशियों में जेष्ठ शुक्ल पक्ष में आने वाली निर्जला एकादशी सबसे श्रेष्ठ मानी जाती है। जैसा की नाम से ही पता चलता है निर्जला मतलब बिना जल और अन्न के रखा जाने वाला व्रत। यह व्रत सभी एकादशी में  सबसे कठिन एकादशी व्रत होता है ] निर्जला एकादशी में अन्न और जल ग्रहण करना वर्जित है यह व्रत संयम और धैर्य का प्रतिक भी है।  विष्णु भगवान् को समर्पित यह निर्जला एकादशी का व्रत विशेष फलदायी होता है जो लोग वर्ष में कोई भी एकादशी व्रत नहीं रखते या फिर एकादशी रखने वालों से व्रत के समय कुछ त्रुटियां हो जाती हैं  तो इस निर्जला एकादशी के व्रत को करके 25 एकादशियों का फल प्राप्त कर सकते हैं।  जो लोग नियम पालन और विधि विधान से इस व्रत को करते हैं वह सभी पापों से मुक्त हो जाते है और भगवान की विशेष कृपा के पात्र बनते है एवं अंत में वैकुण्ठ धाम प्राप्त करते हैं। 

निर्जला एकादशी  2026 की तिथि, शुभ मुहूर्त और पारण का समय

हिन्दू पंचांग के अनुसार निर्जला एकादशी व्रत की -

तिथि प्रारंभ :  24 जून 2026, 06:12 PM
एकादशी तिथि समाप्त : 25 जून 2026, 08:09 PM
व्रत पारण का समय : 26 जून - 05:25 AM से 10:04 AM 

निर्जला एकादशी पूजा विधि विधान और नियम 

  • सुबह  ब्रह्म मुहूर्त में उठे और स्नान आदि से निवृत होकर  साफ़ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें। 
  • निर्जला एकादशी में सिर्फ पवित्रीकरण के समय जल आचमन के अलावा अगले दिन सूर्योदय तक पानी नहीं पीएं।
  • भगवान् विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा - अर्चना करें।
  • धूप, दीप, गंध, और पीले पुष्पों से पूजा करें।
  • भगवान् विष्णु की पूजा में तुलसी का होना अत्यंत महत्वपूर्ण है क्यूंकि इसके बिना भगवान् भोग स्वीकार नहीं करते।  
  • व्रत कथा पढ़ें या सुनें। 
  • निर्जला एकादशी पर ब्राह्मणों, जरूरतमंदों एवं दीन-हीन, असहाय लोगों को भोजन एवं दान-दक्षिणा का दान करें ।
  • अगले दिन द्वादशी पर सूर्योदय के बाद ब्राह्मण आदि को भोजन कराने के उपरांत ही व्रत का पारण करें । 
  • एकादशी व्रत में रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। भक्तजन भजन-कीर्तन, मंत्र जाप और भगवान श्री हरी के ध्यान में रात्रि व्यतीत करें । 
  • निर्जला एकादशी पर तुलसी के पौधे पर जल न चढ़ाये क्यूंकि इस दिन तुलसी माता भी निर्जला व्रत रखती हैं। 
  • इस दिन मंदिर में जल से भरा घड़ा , वस्त्र, छाता, आदि का दान अवश्य करें।

मंत्र

व्रत रखने वाले पुरुष या स्त्री को "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय " का और महा मंत्र का जाप अवश्य करना चाहिए और तुलसी दल लेकर विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए। इस दिन भगवान् के नाम का जाप करें,और रात्रि में शयन ना करके भगवान् का संकीर्तन करें।

निर्जला एकादशी व्रत कथा और माहात्म्य

युधिष्ठिर ने कहा - हे जनार्दन अब जेष्ठ के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है उसका वर्णन कीजिये। 

भगवान श्रीकृष्ण बोले—
"राजन्! इसका वर्णन परम धर्मात्मा सत्यवतीनन्दन व्यासजी करेंगे, क्योंकि वे सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद-वेदांगो  के पारंगत विद्वान हैं।"

तब वेदव्यासजी कहने लगे—

"दोनों ही पक्षों की एकादशियों में भोजन न करें। द्वादशी को स्नान आदि से पवित्र होकर भगवान केशव की पूजा करके नित्यकर्म सम्पन्न होने के पश्चात् पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्त में स्वयं भोजन करें। राजन्! जन्माशौच और मरणाशौच में भी एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए।"

यह सुनकर भीमसेन बोले—

"परम बुद्धिमान पितामह! मेरी उत्तम बात सुनिये। राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव — ये एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी हमेशा यही कहते हैं कि 'भीमसेन! तुम भी एकादशी को न खाया करो।' किन्तु मैं इन लोगों से यही कह दिया करता हूँ कि 'मुझसे भूख नहीं सही जायेगी।'"

भीमसेन की बात सुनकर व्यासजी ने कहा—

"यदि तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और नरक को दूषित समझते हो तो दोनों पक्षों की एकादशियों को भोजन न करना।"

भीमसेन बोले—

"महाबुद्धिमान पितामह! मैं आपके सामने सच्ची बात कहता हूँ, एक बार भोजन करके भी मुझसे व्रत नहीं किया जा सकता। फिर उपवास करके तो मैं रह ही कैसे सकता हूँ। मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है; अतः जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ तभी यह शान्त होती है। इसीलिये महात्मन्! मैं वर्षभर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ, जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथा जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ। ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये। मैं उसका यथोचित रूप से पालन करूँगा।"

व्यासजी ने कहा—

"भीम! ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष राशि पर हो या मिथुन राशि पर; शुक्ल पक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो। केवल कुल्ला या आचमन करने के लिये मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर और किसी प्रकार का जल विद्वान पुरुष मुख में न डाले, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है।"

"एकादशी के सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्योदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है। तत्पश्चात् द्वादशी को निर्मल प्रातःकाल में स्नान करके ब्राह्मणों को विधिपूर्वक जल और सुवर्ण का दान करे। इस प्रकार सब कार्य पूरा करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ भोजन करे।"

"वर्षभर में जितनी एकादशियाँ होती हैं, उन सबका फल निर्जला एकादशी के सेवन से मनुष्य प्राप्त कर लेता है; इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है।"

"शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान केशव ने मुझसे कहा था कि 'यदि मानव सबको छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाय और एकादशी को निराहार रहे तो वह सब पापों से छूट जाता है।'"

"एकादशी व्रत करने वाले पुरुष के पास विशालकाय, विकराल आकृति और काले रंग वाले दण्ड-पाशधारी भयंकर यमदूत नहीं जाते। अन्तकाल में पीताम्बरधारी, सौम्य स्वभाव वाले, हाथों में सुदर्शन धारण करने वाले और मन के समान वेगशाली विष्णुदूत आकर इस वैष्णव पुरुष को भगवान विष्णु के धाम में ले जाते हैं।"

"अतः निर्जला एकादशी को पूर्ण यत्न करके उपवास करना चाहिए। तुम भी सब पापों की शान्ति के लिये यत्न के साथ उपवास और श्रीहरि का पूजन करो।"

"स्त्री हो या पुरुष, यदि उसने मेरु पर्वत के बराबर भी महान पाप किया हो तो वह सब एकादशी के प्रभाव से भस्म हो जाता है।"

"जो मनुष्य उस दिन जल के नियम का पालन करता है, वह पुण्य का भागी होता है। उसे एक-एक पहर में करोड़-करोड़ स्वर्णमुद्रा दान करने का फल प्राप्त होता है।"

"जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न खाता है, वह पाप भोजन करता है। इस लोक में वह चाण्डाल के समान होता है और मरने पर दुर्गति को प्राप्त होता है।"

"जो ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष में एकादशी का उपवास करके दान देंगे, वे परम पद को प्राप्त होंगे। जिन्होंने एकादशी का उपवास किया है, वे ब्रह्महत्या, शराबी, चोर तथा गुरुद्रोही होने पर भी सब पातकों से मुक्त हो जाते हैं।" निर्जला एकादशी  के दिन अन्न, वस्त्र , गौ , जल, शय्या, सुन्दर आसन, कमण्डलु, तथा छाता दान करना चाहिए।  

"देवदेव हृषीकेश! संसार-सागर से तारने वाले प्रभो! इस जल के घट का दान करने से आप मुझे परम गति की प्राप्ति कराइये।"
" भीमसेन ! जेष्ठ मास में शुक्ल पक्ष की जो शुभ एकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिए तथा उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणो को शक्कर के साथ घड़े दान करने चाहिए।  ऐसा करने से मनुष्य भगवान् विष्णु के समीप पहुंचकर आनदं का अनुभव करता है। 
तत्पश्चात् ब्राह्मण भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करे। जो इस प्रकार पूर्ण रूप से पापनाशिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर अनामय पद को प्राप्त होता है।

यह सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ एकादशी का व्रत आरम्भ कर दिया। तभी से यह लोक में 'पाण्डव-द्वादशी' के नाम से भी विख्यात हुई।

निर्जला एकादशी व्रत कथा समाप्त हुई बोलो 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ,  हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे !