परमा एकादशी 2026: कब है व्रत? जानें तिथि, महत्व, पूजा विधि और जरूरी नियम
अधिकमास (मलमास) के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को परमा एकादशी कहते है जो की इस बार 11 जून को आ रही हैं। मलमास के संयोग से परमा एकादशी का महत्व और फल दोनों अत्यधिक बढ़ जाते है क्यूंकि यह दुर्लभ एकादशी तीन साल में एक बार आती है तो आइये आगे जानते हैं परमा एकादशी के बारे में।
Published on: 8 June 2026 at 10:10 am / Updated on: 11 June 2026 at 10:00 am

परमा एकादशी का विशेष महत्व, पूजा विधि विधान, मंत्र, भोग और पारण का समय एवं कथा !
भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को बताया की अधिक मास के कृष्ण पक्ष में जो एकादशी आती है वह "हरिवल्लभा" या फिर "परमा एकदशी" के नाम से जानी जाती है ’परमा’ शब्द का अर्थ 'सर्वोच्च' या 'सबसे उत्तम' होता है इसी कारण इस एकादशी को सभी एकादशियों में विशेष फलदायी माना गया है। पुराणों के अनुसार यह व्रत दरिद्रता और पापों से मुक्ति दिलाने वाला है। इसी व्रत के प्रभाव से राजा हरिष्चन्द्र ने भी अपना खोया हुआ वैभव वापस पाया था। जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक से इस व्रत का पालन करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्यफल प्राप्त होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि जो भक्त इस दिन भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी की आराधना करता है, उसे मृत्यु के पश्चात बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।
परमा एकादशी 2026 की तिथि, शुभ मुहूर्त और पारण का समय
हिन्दू पंचांग के अनुसार परमा एकादशी व्रत की -
- तिथि प्रारंभ : 11 जून 2026, 12:57 AM
- एकादशी तिथि समाप्त : 11 जून 2026, 10:36 PM.
- व्रत पारण का समय : 12 जून - 05:23 AM से 10:02 AM
पूजा विधि
- सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठे और स्नान आदि से निवृत होकर साफ़ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
- भगवान् विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा - अर्चना करें।
- धूप, दीप, गंध, और पीले पुष्पों से पूजा करें।
- भगवान् विष्णु की पूजा में तुलसी का होना बहुत महत्वपूर्ण है क्यूंकि इसके बिना भगवान् भोग स्वीकार नहीं करते।
- व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- परमा एकादशी पर ब्राह्मणों, जरूरतमंदों एवं दीन-हीन, असहाय लोगों को भोजन एवं दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करना चाहिए।
- अगले दिन द्वादशी पर समय के अनुसार पारण करें अन्यथा यदि आपने समयानुसार व्रत का पारण नहीं किया तो आपका व्रत सम्पूर्ण नहीं माना जायेगा ।
- धार्मिक मान्यतायों के अनुसार इस रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। भक्तजन भजन-कीर्तन, मंत्र जाप और भगवान के ध्यान में रात्रि व्यतीत करें ।
क्या करें और क्या नहीं करना चाहिए
- सनातन संस्कृति में दान को धर्म का प्रमुख आधार माना गया है। विशेष रूप से परमा एकादशी के दिन किया गया दान अक्षय पुण्य प्रदान करने वाला बताया गया है। धार्मिक ग्रंथो में वर्णित है कि इस दिन जरूरतमंदों की सहायता करने से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
- गरीबों को वस्त्र, जल , धन और अन्न का दान अवश्य करें और साथ ही साथ धार्मिक ग्रंथो का दान भी अवश्य करना चाहिए।
- इस माह में दीप दान अवश्य करें
- एकादशी व्रत में केवल अन्न त्यागना नहीं है। इस दिन मन, वचन और कर्म की पवित्रता का भी ध्यान रखना चाहिए. झूठ बोलने, विवाद करने और किसी का अपमान करने से बचना चाहिए।
मंत्र
व्रत रखने वाले पुरुष या स्त्री को "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय " का और महा मंत्र का जाप अवश्य करना चाहिए और तुलसी दल लेकर विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए। इस दिन भगवान् के नाम का जाप करें,और रात्रि में शयन ना करके भगवान् का संकीर्तन करें ।
भोग
परमा एकादशी पर भगवान विष्णु को सात्विक और शुद्ध शाकाहारी भोग अर्पित किया जाता है। परमा एकादशी पर भगवान को केसरिया पेड़े का भोग जरूर लगाए और साथ ही साथ पंचामृत , मखाना खीर, मौसमी फल आम, केला या पपीता शामिल हैं। भोग शुद्ध देसी घी और सेंधा नमक से बना होना चाहिए और विशेष ध्यान रखें की उसमे तुलसी दल अवश्य हो अन्यथा भगवान आपका भोग स्वीकार नहीं करेंगे क्यूंकि भगवान विष्णु को तुलसी अत्यंत प्रिये हैं।
व्रत कथा
परमा एकादशी व्रत कथा : अर्जुन ने पूछा- जनार्दन ! कृष्ण पक्ष के अधिकमास में कौन सी एकादशी आती है ? मैं उसका माहात्म्य सुनना चाहता हूं। उसे बताने की कृपा कीजिये ।
श्री हरी बोले, हे राजन्! अधिकमास में कृष्ण पक्ष में जो एकादशी आती है वह परमा एकादशी कहलाती है। वैसे तो प्रत्येक वर्ष 24 एकादशियां होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है, तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। आगे की कथा कहता हूँ प्राचीन काल में काम्पिल्य नगर में सुमेधा नाम का एक अत्यंत धर्मात्मा और विद्वान ब्राह्मण रहता था | उसकी पत्नी का नाम पवित्रा था जो अत्यंत पतिव्रता और गुणी थी | वे दोनों ब्राह्मणों को भोजन कराने और अतिथियों का सत्कार करने के लिए हमेशा तैयार रहते थे, फिर भी उनके पास धन की कमी थी |
एक दिन धन की कमी और गरीबी से तंग आकर, सुमेधा ने अपनी पत्नी से कहा कि वे परदेश जाकर धन कमाएंगे| यह सुनकर पवित्रा ने अत्यंत विनम्रता से कहा की "हे स्वामी" मनुष्य को अपने पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार ही फल मिलता है। जो भाग्य में नहीं है, वह कहीं भी नहीं मिल सकता। इसलिए हमें गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए यहीं रहकर संतोष करना चाहिए।" पति ने पत्नी की बात मान ली और वे दोनों वहीं रुक गए |
कुछ समय बाद उस नगर में महर्षि कौण्डिन्य का आना हुआ | ब्राह्मण दम्पति ने अत्यंत श्रद्धा के साथ ऋषि की सेवा की. उनकी सेवा से प्रसन्न होकर महर्षि कौण्डिन्य ने उन्हें गरीबी और दरिद्रता मिटाने का एक उपाय बताया |उन्होंने कहा की "अधिक मास (मलमास) के कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत 'परमा एकादशी' कहलाता है. यह व्रत सभी पापों का नाश करता है और दरिद्रता दूर कर धन-धान्य प्रदान करता है|
महर्षि कौण्डिन्य के निर्देशानुसार, सुमेधा और उनकी पत्नी ने पांच दिनों तक विधि-विधान से परमा एकादशी का व्रत किया. इस दौरान उन्होंने रात में जागरण किया और भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की.
व्रत के प्रभाव से पांचवें दिन धन के देवता कुबेर प्रकट हुए और कुबेर देव ने सुमेधा को उनके पूर्व जन्मों के पुण्य और इस व्रत की महिमा का फल दिया, जिससे उनकी सारी दरिद्रता हमेशा के लिए समाप्त हो गई. उन्हें जीवन में सभी भौतिक सुख प्राप्त हुए और अंत में वे बैकुंठ लोक को गए |
परमा एकादशी व्रत कथा सम्पूर्ण हुई - बोलो हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे , हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे !