लग रही आस करूं ब्रजवास - Lag Rahi Aas Karu Brajwas
परिचय
यह अत्यंत मधुर और भावपूर्ण ब्रज भजन श्रीगोवर्धन धाम, वृन्दावन और ब्रजवास की दिव्य अभिलाषा को प्रकट करता है। इस भजन में भक्त अपने हृदय की उस गहरी इच्छा को व्यक्त करता है जिसमें वह संसार के सभी मोह त्यागकर केवल गोवर्धन की तलहटी में रहकर भजन, सत्संग और प्रभु सेवा में जीवन बिताना चाहता है।
भजन में ब्रजभूमि की महिमा, संत संगति, यमुना तट और श्रीकृष्ण दर्शन की लालसा का अत्यंत सुंदर चित्रण किया गया है। भक्त अपने आपको इतना भाग्यशाली मानता है कि यदि उसे ब्रज की धूल, ब्रज की गलियाँ और गोवर्धन की शरण मिल जाए, तो उसका जीवन सफल हो जाए।
यह भजन केवल ब्रजवास की इच्छा नहीं बल्कि पूर्ण वैराग्य, भक्ति और श्रीकृष्ण प्रेम की गहन अनुभूति का दिव्य स्वरूप है। इसमें भक्त का मन पूरी तरह ब्रजधाम और गिरिराज महाराज की भक्ति में समर्पित दिखाई देता है।
भावार्थ
इस भजन में भक्त कहता है कि उसकी सबसे बड़ी इच्छा ब्रज में निवास करने की है, विशेषकर गोवर्धन पर्वत की तलहटी में। वहाँ रहकर वह भगवान का भजन, ध्यान और संतों का सत्संग करना चाहता है।
भक्त ब्रज की गलियों की धूल को भी अपने लिए पवित्र मानता है और उसकी आँखें केवल श्रीहरि के दर्शन की अभिलाषा रखती हैं। वह संसारिक सुखों की अपेक्षा ब्रज की साधारण जीवनशैली को श्रेष्ठ मानता है।
भजन यह भी दर्शाता है कि सच्चा भक्त बैकुंठ जैसे दिव्य लोकों की भी इच्छा नहीं करता, बल्कि केवल ब्रजधाम और गिरिराज जी की शरण चाहता है। अंत में भक्त पूर्ण समर्पण भाव से भगवान गोवर्धनधारी से अपनी लाज रखने की प्रार्थना करता है।