गिरधर लाल तेरे लाढ लाढाऊ - Girdhar Lal Tere Ladh Ladhau
परिचय
यह अत्यंत मधुर और प्रेमरस से परिपूर्ण श्रीकृष्ण भजन भक्त और भगवान के गहरे आत्मिक प्रेम का सुंदर चित्रण करता है। इस भजन में भक्त अपने हृदय को श्रीगिरधर लाल का मंदिर बनाकर उन्हें उसमें सदा विराजमान करने की प्रार्थना करता है।
भजन में भक्त का निष्कपट प्रेम, आत्मीयता और समर्पण झलकता है। वह श्रीकृष्ण को केवल भगवान ही नहीं बल्कि अपना प्रिय मित्र और जीवन का आधार मानता है। भक्त चाहता है कि उसका मन सदा प्रभु के दर्शन, स्मरण और रसपूर्ण भक्ति में डूबा रहे।
यह भजन राधा-कृष्ण प्रेम, माधुर्य भक्ति और आत्मिक मिलन की अत्यंत सुंदर अनुभूति कराता है। इसमें भक्त अपने आराध्य के साथ एकांत प्रेम और दिव्य निकटता का भाव व्यक्त करता है।
भावार्थ
इस bhajan में भक्त श्रीगिरधर लाल से कहता है कि वह अपने हृदय रूपी कुंज को उनका मंदिर बनाना चाहता है, जहाँ वे श्रीराधा जी के साथ सदैव निवास करें। भक्त का मन प्रभु के सुंदर स्वरूप और उनकी लीलाओं के दर्शन में निरंतर मग्न रहना चाहता है।
भक्त यह भी कहता है कि उसका और प्रभु का संबंध अत्यंत आत्मीय है। वह अपने आराध्य को संसार की बुरी दृष्टि से बचाकर अपने हृदय में छिपाए रखना चाहता है।
अंत में भक्त स्वीकार करता है कि श्रीकृष्ण ही उसके आराध्य, मित्र और जीवन के सबसे प्रिय हैं। वह प्रार्थना करता है कि उसके हृदय से कभी भी कृष्ण प्रेम और गोपीभाव का रस दूर न हो।