Geet

गीत गोविन्द - Geet Govind
Bhajans

गीत गोविन्द - Geet Govind

परिचय यह पावन रचना महान भक्त कवि जयदेव द्वारा रचित अमर काव्य ग्रंथ गीत गोविन्द का मंगलाचरण भाग है। इसमें भगवान श्रीहरि के विविध रूपों, लीलाओं तथा अवतारों का अत्यंत मधुर और काव्यमय वर्णन किया गया है। प्रत्येक पद के अंत में “जय जय देव हरे” का गान भक्ति, प्रेम और पूर्ण समर्पण की भावना जागृत करता है। भावार्थ इस मंगलाचरण में कवि भगवान के उस दिव्य स्वरूप का वर्णन करते हैं जो लक्ष्मीजी के वक्ष पर शोभित हैं, वनमाला और कुण्डल से अलंकृत हैं। वे संसार के दुखों का नाश करने वाले और मुनियों के मन रूपी सरोवर के हंस हैं। वे कालिय नाग का दमन करने वाले, यदुवंश रूपी कमल के सूर्य तथा मधु, मुर और नरकासुर का संहार करने वाले हैं। राम रूप में रावण और दूषण का विनाश कर धर्म की रक्षा की। भगवान के नेत्र निर्मल कमल के समान हैं, वे तीनों लोकों के आधार हैं। अंत में कवि प्रार्थना करते हैं कि हम आपके चरणों में शरणागत हैं, कृपया हमारा कल्याण करें।
गोपी गीत - Gopi Geet
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गोपी गीत - Gopi Geet

परिचय श्रीकृष्ण गोपीगीत श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध का अत्यंत मधुर और हृदयस्पर्शी प्रसंग है। रासलीला के समय जब श्रीकृष्ण गोपिकाओं के मध्य से अन्तर्धान हो जाते हैं, तब व्रज की गोपिकाएँ विरह-वेदना से व्याकुल होकर उनका स्मरण करती हुई यह दिव्य गीत गाती हैं। यह केवल स्तुति नहीं, बल्कि आत्मा की परमात्मा के प्रति पुकार है। इस गीत में भक्त और भगवान के बीच की परम प्रेममयी स्थिति का चित्रण है, जहाँ प्रेम में अहंकार नहीं, केवल समर्पण और तड़प है। गोपिकाएँ श्रीकृष्ण को अपना जीवन, प्राण और सर्वस्व मानकर उन्हें पुनः दर्शन देने की विनती करती हैं। भावार्थ इन श्लोकों में गोपिकाएँ श्रीकृष्ण के रूप, माधुर्य, वंशी-नाद, चरणकमलों और उनके स्नेहपूर्ण व्यवहार का स्मरण करती हैं। वे कहती हैं कि हे प्रियतम! आपके बिना हमारा जीवन शून्य है, एक क्षण भी युग समान प्रतीत होता है। पाठ का फल हृदय में श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम और समर्पण की भावना उत्पन्न होती है। विरह, दुःख और मानसिक अशान्ति का नाश होता है। दाम्पत्य और पारिवारिक जीवन में मधुरता आती है। भक्ति में स्थिरता, श्रद्धा और आत्मिक आनन्द की प्राप्ति होती है। भगवान के चरणों में प्रेमपूर्वक समर्पण की भावना दृढ़ होती है।