श्री गंगा स्तोत्रम् - Shree Ganga Stotram
परिचय
गङ्गा स्तोत्र माँ भागीरथी गंगा की महिमा का दिव्य स्तवन है। गंगा को त्रिभुवन तारिणी, पाप-नाशिनी और मोक्षदायिनी कहा गया है। वे भगवान शंकर की जटाओं में विराजमान होकर पृथ्वी पर अवतरित हुईं और समस्त प्राणियों का कल्याण करती हैं। इस स्तोत्र में गंगा जी की पवित्रता, करुणा, कलुष-नाशक शक्ति और भक्तों को भवसागर से पार कराने वाली महिमा का वर्णन है। इसका श्रद्धापूर्वक पाठ करने से मन, वचन और कर्म की शुद्धि होती है तथा जीवन में शांति और मोक्ष की भावना जागृत होती है।
भावार्थ
इस स्तोत्र में भक्त गंगा जी से प्रार्थना करता है कि हे देवि! आप त्रिभुवन की तारिणी हैं, आपके जल का महात्म्य वेदों में प्रसिद्ध है। आपके पवित्र जल का सेवन और स्नान करने से पापों का नाश होता है और परम पद की प्राप्ति होती है। गंगा जी को पतित-पावनी, नरक-निवारिणी और करुणामयी माता कहा गया है। भक्त विनयपूर्वक निवेदन करता है कि हे माँ! मेरे रोग, शोक, पाप और कुमति को हर लीजिए तथा मुझे भवसागर से पार लगाइए।