आमलकी एकादशी 2026 : व्रत की कथा, तिथि ,महत्व और पूजा विधि

आमलकी एकादशी का व्रत 27 फरवरी, शुक्रवार को रखा जाएगा (जिसे आंवला एकादशी और रंगभरी एकादशी भी कहा जाता है) । यह व्रत फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को भगवान विष्णु और आंवले के वृक्ष की पूजा के लिए समर्पित है

By: RevivingCultures
Published on: 20 February 2026 at 12:20 pm / Updated on: 24 May 2026 at 11:09 pm
आमलकी एकादशी 2026 : व्रत की कथा, तिथि ,महत्व और पूजा विधि

तिथि और शुभ मुहूर्त -

वैदिक पंचांग के अनुसार, इस वर्ष के मुख्य मुहूर्त निम्नलिखित हैं -

  • एकादशी तिथि प्रारंभ : 27 फरवरी 2026 को रात 12:33 बजे (26 फरवरी की मध्यरात्रि)।
  • एकादशी तिथि समाप्त : 27 फरवरी 2026, रात 10:32।
  • व्रत पारण का समय : 28 फरवरी 2026, शनिवार को सुबह 06:47 से 10:38 के बीच। 

पूजा विधि - नियम 

  • संकल्प : सुबह स्नान के बाद हाथ में जल, तिल और कुश लेकर व्रत का संकल्प लें।
  • आंवला वृक्ष की पूजा :  इस दिन मुख्य रूप से आंवले के पेड़ की पूजा की जाती है। पेड़ की जड़ में जल अर्पित करें, रोली-अक्षत लगाएं और धूप -दीप जलाएं। 
  • भगवान विष्णु की पूजा : भगवान विष्णु के मधुसूदन स्वरूप की पूजा करें। उन्हें पीले फूल, पीला चंदन, तुलसी दल और आंवला अर्पित करें।
  • रात्रि जागरण : एकादशी की रात को भगवान विष्णु के भजनों का संकीर्तन करना बहुत ही पुण्यकारी माना जाता है।
  • पारण : एकादशी के अगले दिन द्वादशी पर पारण के समय का विशेषकर धयान रखना चाहिए अन्यथा आपका एकादशी का व्रत सम्पूर्ण नहीं होता है। 

एकादशी के दिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ अवश्य करें और साथ में तुलसी दल भी अर्पित करें। 

पूजा का महत्व

  • आंवले में देवताओं का वास: माना जाता है कि आंवले के वृक्ष में भगवान विष्णु, ब्रह्मा और शिव सहित सभी देवी-देवताओं का निवास होता है।
  • इसे अमृत फल कहा जाता है, जो शारीरिक स्वास्थ्य (आरोग्य) और आध्यात्मिक शुद्धि प्रदान करता है। अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति के लिए यह व्रत सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
  • आमलकी महान वृक्ष है ,जो की भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिये है। यह वृक्ष सभी पापों का नाश करने वाला है।

आमलकी एकादशी की पवित्र कथा -

प्राचीन काल में वैदिश नाम का एक समृद्ध राज्य था, जिस पर धर्मपरायण राजा चित्रसेन शासन करते थे। वे चंद्रवंशी राजवंश से थे और भगवान विष्णु के परम भक्त थे। राज्य में चारों वर्णों  (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ) के लोग रहते थे वे सभी भगवान विष्णु के भक्त थे और नियमित रूप से एकादशी का व्रत रखते थे।
एक वर्ष, फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष के दौरान पूरे राज्य ने मिलकर आमलकी एकादशी मनाने का निर्णय लिया। राजा, रानी और सभी नागरिक नदी के किनारे एक विशाल आंवले के पेड़ के पास पूजा के लिए एकत्र हुए। उसी रात, जंगल में रहने वाला एक शिकारी पानी की तलाश में वहां आया। उसने जीवित रहने के लिए अपना पूरा जीवन जानवरों का शिकार करने में बिताया था. थका हुआ और भूखा शिकारी उसी आंवले के पेड़ के नीचे आराम करने लगा जहाँ भक्त पूजा कर रहे थे। वह अनुष्ठानों को नहीं समझता था, लेकिन उसने अनजाने में ही रात भर जागरण में भाग लिया और कुछ नहीं खाया। अगली सुबह शिकारी अपने घर लौट आया। कुछ समय बाद जब उसकी मृत्यु हुई तो यमराज के दूत उसे उसके पापों के लिए नरक ले जाने आए।  भगवान विष्णु के दूत भी वहां पहुंच गए और शिकारी को वैकुण्ठ ले जाने लग!  दूतों के बीच विवाद छिड़ गया। जब मामला भगवान विष्णु के सामने प्रस्तुत किया गया, तो उन्होंने कहा यह शिकारी जीवन भर पापी रहा लेकिन इसने अनजाने में पवित्र आंवले के पेड़ के पास पूरी रात जागकर और उपवास करके आमलकी एकादशी का पालन किया है। इस एक कार्य ने उसके सभी पापों को धो दिया है। वह अनंत काल तक वैकुण्ठ धाम में निवास करेगा।
इस प्रकार, शिकारी ने मोक्ष प्राप्त किया और उसे एक दिव्य रथ पर वैकुण्ठ ले जाया गया। राजा चित्रसेन और उनकी प्रजा ने भी अपने सांसारिक जीवन के बाद विष्णु लोक प्राप्त किया।

कथा का फल : मृत्यु के बाद उस बहेलिए ने अगले जन्म में राजा विदुरथ के यहाँ जन्म लिया और पशुरथ के नाम से विख्यात हुआ। एक बार जब वह जंगल में राक्षसों से घिर गया, तो उसके शरीर से एक दिव्य देवी प्रकट हुईं जिन्होंने राक्षसों का अंत कर दिया। यह सब पिछले जन्म में किए गए आमलकी एकादशी के अनजाने व्रत का ही फल था। 

जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक इस कथा को सुनता है या व्रत करता है, वह जीवन में सुख-समृद्धि पाता है और अंत में वैकुंठ धाम (मोक्ष) को प्राप्त होता है। 

आमलकी एकादशी व्रत कथा सम्पूर्ण हुई -  बोलो 

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे !