भीष्म स्तुति - Bhishma Stuti
परिचय
यह पावन स्तुति भीष्म पितामह द्वारा शरशय्या पर लेटे हुए भगवान श्रीकृष्ण की आराधना में उच्चारित की गई है। इसमें श्रीकृष्ण को साक्षात् परमब्रह्म, भक्तों के सखा, करुणामय रक्षक और समस्त सृष्टि के अधिष्ठाता के रूप में स्मरण किया गया है। यह स्तुति भागवत महापुराण के प्रथम स्कंध में वर्णित है और जीवन के अंतिम क्षणों में ईश्वर-स्मरण के आदर्श को प्रस्तुत करती है।
भावार्थ
इस स्तुति का केंद्रीय भाव यह है कि जीवन का परम लक्ष्य भगवान श्रीकृष्ण की शरणागति है। भीष्म पितामह अपने अंतिम समय में श्रीकृष्ण के रूप, लीला, करुणा और भक्तवत्सलता का ध्यान करते हुए उनसे मोक्ष की कामना करते हैं। यह स्तुति सिखाती है कि अहंकार, मोह और भेद-बुद्धि का त्याग कर यदि भक्त संपूर्ण मन से भगवान का स्मरण करे, तो वही स्मरण जीवन और मृत्यु दोनों को सार्थक बना देता है।