विजया एकादशी 2026 व्रत: तिथि,महात्म्य ,शुभ मुहूर्त, पूजा विधि एवं कथा

फाल्गुन मास में आने वाली एकादशी को विजया एकादशी के नाम से जाना जाता है। यह भगवान विष्णु को समर्पित एक अत्यंत शुभ व्रत है। यह व्रत जीवन में आने वाली बाधाओं और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए किया जाता है। आइये जानते हैं इस एकादशी का महत्व, पारण समय और व्रत की विधि और कथा।

By: RevivingCultures
Published on: 6 February 2026 at 12:09 pm / Updated on: 24 May 2026 at 11:09 pm
विजया एकादशी 2026 व्रत: तिथि,महात्म्य ,शुभ मुहूर्त, पूजा विधि एवं कथा

विजया एकादशी 2026 की महत्वपूर्ण तिथियां

वर्ष 2026 में विजया एकादशी 13 फरवरी, शुक्रवार को मनाई जाएगी। 

  •  एकादशी तिथि प्रारंभ   - 12 फरवरी 2026 को दोपहर 12:22 बजे से।
  •  एकादशी तिथि समाप्त - 13 फरवरी 2026 को दोपहर 02:25 बजे तक।
  •  व्रत पारण का समय  - 14 फरवरी 2026 को सुबह 07:00 बजे से 10:44  बजे के बीच।

विजया एकादशी का महत्व

शास्त्रों में एकादशी का व्रत सभी व्रतों में सबसे उत्तम माना गया है। पुराणों में कहा गया है की विजया एकादशी का व्रत भगवान राम ने भी किया था। लंका पर विजय प्राप्त करने के लिए भगवान राम ने अपनी सेना के साथ मिलकर यह व्रत किया था।  विजया एकादशी के व्रत को सफलता और विजय का प्रतिक माना जाता है।  इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति को कठिन से कठिन कार्यों में सफलता और दुश्मनों पर विजय प्राप्त होती है। यह व्रत हर कार्य में विजय दिलाने वाला माना जाता है। यह व्रत समस्त पापों को नष्ट करने वाला और अंत में मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है। व्यवसाय, नौकरी, या किसी भी महत्वपूर्ण कार्य में आ रही अड़चनों को दूर करने के लिए यह व्रत बहुत फलदायी माना जाता है। श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था कि इस व्रत की कथा सुनने या पढ़ने मात्र से वाजपेय यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।

पूजा विधि और नियम

  • कलश स्थापना : इस दिन सोने, चांदी, तांबे या मिट्टी के कलश पर भगवान विष्णु (श्री हरि) की प्रतिमा स्थापित की जाती है। 
  • पूजन सामग्री : श्री हरी को पीले फूल, मौसमी फल, चंदन, धूप-दीप और विशेष रूप से तुलसी दल अर्पित करें।
  • तुलसी अर्पण : भगवान विष्णु को तुलसी अत्यंत प्रिय है, इसलिए पूजा में तुलसी दल अवश्य रखें।
  • दान : द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराएं और कलश सहित अन्न-वस्त्र का दान करने के बाद ही व्रत खोलें (पारण करें)।
  • व्रत और जागरण : दिन भर निराहार या फलाहार रहकर भगवान का ध्यान करें और रात्रि में जागरण करना शुभ माना जाता है।
  • पारण : अगले दिन यानी द्वादशी को किसी ब्राह्मण को भोजन कराकर या दान देकर ही व्रत खोलें (पारण करें)।

विजया एकादशी व्रत की पौराणिक कथा :

युधिष्ठिर ने पूछा - वासुदेव फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष में किस नाम की एकादशी आती है कृपा करके बताईये। 

श्री कृष्ण ने बताया - युधिष्ठिर ! एक बार नारद जी ने ब्रह्मा जी से पूछा फाल्गुन के कृष्णपक्ष में जो 'विजया' नाम की एकादशी आती है ,कृपया उसके पुण्य का वर्णन कीजिये । 

तब ब्रह्मा जी बोले - हे नारद ! सुनो यह व्रत बहुत ही प्राचीन ,पवित्र और पापनाशक है। यह 'विजय' नाम की एकादशी राजाओं को विजय प्रदान करती है। 

पूर्वकाल की बात है , जब भगवान श्री राम माता सीता की खोज में वन-वन भटक रहे थे, तब उनकी भेंट सुग्रीव और हनुमान जी से हुई। माता सीता का पता चलने के बाद, श्री राम अपनी विशाल वानर सेना के साथ समुद्र तट पर पहुँचे। उनके सामने विशाल समुद्र था जिसे पार करना असंभव लग रहा था।

तब श्री राम ने लक्ष्मण जी से पूछा कि "हे सुमित्रानंदन ! किस पुण्य से इस समुद्र को पार किया जा सकता है ?"  तब लक्ष्मण जी बोले है पुराणपुरुष पुरुषोत्तम यहाँ द्वीप के भीतर ऋषि वकदालभ्य नामक ऋषि रहते है । उन प्राचीन मुनीश्वर के पास जाकर ही उनसे इसका उपाय पूछिए । तब भगवान राम ऋषि के आश्रम पहुँचे और उन्हें प्रणाम कर अपनी दुविधा बताई। ऋषि वकदालभ्य उनको देखते ही पहचान गए की ये पुराणपुरुषोतम श्री राम हैं , जो किसी कारणवश मानव शरीर में अवतरित हुए हैं । मुनि ने श्री राम की दुविधा को दूर करते हुए बताया कि "हे राम! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी आने वाली है। यदि आप अपनी सेना सहित इस एकादशी का विधि-विधान से व्रत करेंगे, तो आप निश्चित ही समुद्र पार कर लेंगे और लंका पर विजय प्राप्त करेंगे"। 

ऋषि के कहे अनुसार, श्री राम ने पूरी श्रद्धा के साथ विजया एकादशी का व्रत रखा। इस व्रत के प्रभाव से वानर सेना समुद्र पर सेतु (पुल) बनाने में सफल रही और अंततः भगवान राम ने रावण का वध कर लंका पर विजय प्राप्त की। 

जो मनुष्य इस व्रत को विधि विधान से करता है, उन्हें इस लोक में विजय प्राप्त होती है और उनका परलोक भी अक्षय बना रहता है। 

विजया एकादशी व्रत कथा सम्पूर्ण हुई बोलो

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे !