Je Anilo Prem Dhan

 जे अनिलो प्रेम धन - Je Anilo Prem Dhan
Bhajans

जे अनिलो प्रेम धन - Je Anilo Prem Dhan

परिचय यह अत्यंत करुणामयी और विरह भाव से परिपूर्ण गौड़ीय वैष्णव भजन श्रील नरोत्तम दास ठाकुर द्वारा रचित है। इस भजन में वे श्रीचैतन्य महाप्रभु के परम पार्षदों और आचार्यों के वियोग में अपनी गहन व्यथा व्यक्त करते हैं। भजन में श्रील नरोत्तम दास ठाकुर प्रेमपूर्वक श्रीनिवास आचार्य, श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी, श्रीरघुनाथ दास गोस्वामी, श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामी, श्रीगोपाल भट्ट गोस्वामी तथा श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी जैसे महान वैष्णव आचार्यों का स्मरण करते हैं। उनके वियोग में वे स्वयं को असहाय अनुभव करते हैं और उनके चरणों की कृपा के लिए व्याकुल होकर पुकारते हैं। यह भजन गुरु-परंपरा, वैष्णव संगति और शुद्ध भक्ति के महत्व को अत्यंत मार्मिक रूप में प्रस्तुत करता है। गौड़ीय वैष्णव परंपरा में यह भजन विशेष श्रद्धा और भाव से गाया जाता है। भावार्थ इस भजन में नरोत्तम दास ठाकुर कहते हैं कि जिन महान आचार्यों ने संसार को कृष्ण प्रेम का अमूल्य धन प्रदान किया, वे अब कहाँ चले गए हैं। वे उनके दर्शन और संगति के अभाव में अत्यंत दुखी हैं। वे श्रीरूप, श्रीसनातन, श्रीरघुनाथ तथा अन्य महान वैष्णव आचार्यों का स्मरण करते हुए कहते हैं कि उनके बिना जीवन सूना प्रतीत होता है। उनके वियोग में हृदय इतना व्याकुल है कि मानो पत्थर पर सिर पटकने या अग्नि में प्रवेश करने का मन हो रहा है। अंत में नरोत्तम दास ठाकुर विलाप करते हैं कि जिन भक्तों ने श्रीगौरांग महाप्रभु के साथ दिव्य लीलाओं का आनंद लिया, उनकी संगति अब उपलब्ध नहीं है। इसी विरह में वे अश्रुपूर्ण होकर रोते हैं। यह भजन गुरु-भक्ति, वैष्णव-विरह और शुद्ध प्रेम की अद्भुत अभिव्यक्ति है।