Jagannath

आहे नील शैल - Ahe Nila Saila
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आहे नील शैल - Ahe Nila Saila

भजन का परिचय यह भजन “आहे नील शैल, प्रबल मत्त बारण” ओड़िया भक्ति परंपरा का एक अत्यंत प्रसिद्ध और भावपूर्ण भजन है, जिसकी रचना महान भक्त भक्त सालबेग ने की थी। इस भजन में भगवान श्रीजगन्नाथ को नीलाचल पर्वत के समान अडिग, करुणामय और भक्तों के संकट हरने वाले स्वरूप में स्मरण किया गया है। यह भजन पूर्ण शरणागति और अटूट विश्वास का सुंदर उदाहरण है। भजन का भावार्थ इस भजन में भक्त भगवान जगन्नाथ को पुकारते हुए उनके पूर्व अवतारों और लीलाओं का स्मरण करता है। गजेंद्र की रक्षा, द्रौपदी की लज्जा-रक्षा, विभीषण को शरण देना और प्रह्लाद की रक्षा — ये सभी उदाहरण यह दर्शाते हैं कि प्रभु अपने भक्तों को कभी नहीं छोड़ते। “आहे नील शैल” कहकर भक्त यह भाव प्रकट करता है कि प्रभु संकटों के बीच अडिग पर्वत की भांति रक्षा करने वाले हैं। भजन का मूल भाव यह है कि चाहे भक्त कितना भी दीन, हीन या असहाय क्यों न हो — प्रभु की शरण में जाने पर अवश्य उद्धार होता है। यह भजन कब और कहाँ गाया जाता है यह भजन विशेष रूप से पुरी श्रीजगन्नाथ मंदिर रथयात्रा महोत्सव जगन्नाथ भजन संध्या संकट और प्रार्थना के समय गाया जाता है। ओडिशा के साथ-साथ इस्कॉन मंदिरों और वैष्णव सत्संगों में भी यह भजन अत्यंत श्रद्धा से गाया जाता है।
श्री जगन्नाथाष्टकम् - Shree Jagannatha Ashtakam
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श्री जगन्नाथाष्टकम् - Shree Jagannatha Ashtakam

जगन्नाथाष्टकम् – भजन का परिचय जगन्नाथाष्टकम् आदि शंकराचार्य जी द्वारा रचित एक अत्यंत पावन और प्रभावशाली स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) की करुणा, सौंदर्य, माधुर्य और सर्वव्यापकता का सुंदर वर्णन करता है। इस स्तोत्र में भगवान जगन्नाथ को वृन्दावन-विहारी, नीलाचल-निवासी, रथयात्रा में विराजमान और समस्त देवताओं द्वारा पूजित स्वरूप में नमन किया गया है। हर श्लोक के अंत में भक्त यही प्रार्थना करता है कि प्रभु जगन्नाथ सदा उसकी दृष्टि और हृदय में विराजमान रहें। जगन्नाथाष्टकम् का भावार्थ इस स्तोत्र का मूल भाव यह है कि भक्त को न राज्य चाहिए, न धन, न सांसारिक सुख, बल्कि केवल भगवान जगन्नाथ के दर्शन और उनकी शरण चाहिए। भगवान को यहाँ करुणा-सागर, दया-सिंधु, पापों का नाश करने वाला और दीन-हीन के एकमात्र सहायक के रूप में स्वीकार किया गया है। रथ पर आरूढ़ भगवान जगन्नाथ जब भक्तों की स्तुतियाँ सुनते हैं, तब वे अत्यंत करुणामय हो जाते हैं। कवि यह भाव प्रकट करता है कि संसार असार है और केवल प्रभु के चरणों में ही सच्चा आश्रय है। यह स्तोत्र वैराग्य, भक्ति और पूर्ण शरणागति का संदेश देता है। यह स्तोत्र कब और कहाँ पढ़ा जाता है जगन्नाथाष्टकम् का पाठ विशेष रूप से पुरी जगन्नाथ मंदिर रथयात्रा महोत्सव एकादशी, जन्माष्टमी प्रातःकालीन साधना और संध्या भजन के समय किया जाता है। इस्कॉन मंदिरों और वैष्णव परंपरा में यह स्तोत्र अत्यंत श्रद्धा से गाया और पढ़ा जाता है। जगन्नाथाष्टकम् की महिमा (फलश्रुति भाव) ऐसा माना गया है कि जो भक्त श्रद्धा और पवित्रता के साथ जगन्नाथाष्टकम् का नियमित पाठ करता है, उसके पाप नष्ट होते हैं, मन शुद्ध होता है और अंततः वह भगवान विष्णु के धाम को प्राप्त करता है।
जगन्नाथ रक्षामाम् - Jagannath Rakshamam
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जगन्नाथ रक्षामाम् - Jagannath Rakshamam

भावार्थ यह मंत्र पूर्ण शरणागति का भाव प्रकट करता है। भक्त अपने अहंकार, भय और चिंता को त्याग कर भगवान श्रीजगन्नाथ के चरणों में स्वयं को समर्पित करता है। “रक्षामाम्” का अर्थ केवल शारीरिक सुरक्षा नहीं, बल्कि मानसिक शांति आध्यात्मिक रक्षा पापों और भय से मुक्ति भी है। यह मंत्र संकट, भय, असुरक्षा और अनिश्चितता के समय अत्यंत प्रभावी माना जाता है। कब और कैसे जप करें • सुबह स्नान के बाद • रात्रि में सोने से पहले • भय, चिंता या अस्थिर मन की स्थिति में • 11, 21 या 108 बार जप • मन में श्रीजगन्नाथ का स्वरूप (बड़ी गोल आँखें, नीलाचल) स्मरण करते हुए
जगन्नाथ चक्का नैन नीलांचल वारे -Jagannath Chaka Nain Lilachal Vare
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जगन्नाथ चक्का नैन नीलांचल वारे -Jagannath Chaka Nain Lilachal Vare

भजन का परिचय यह भजन “जगन्नाथ! जगन्नाथ!” भगवान श्रीजगन्नाथ की करुणा, शरणागति और भक्त-वत्सल स्वरूप को अत्यंत भावपूर्ण शब्दों में व्यक्त करता है। इसमें भक्त स्वयं को असहाय मानकर अपने जीवन की नैया पूर्ण रूप से प्रभु जगन्नाथ के चरणों में सौंप देता है। नीलांचल वासी, चक्र-नयन भगवान जगन्नाथ को साक्षात रक्षक और पालनकर्ता के रूप में पुकारा गया है। भजन का भावार्थ इस भजन का मूल भाव पूर्ण शरणागति है। भक्त स्वीकार करता है कि यदि भगवान जगन्नाथ उसकी रक्षा न करें, तो संसार में कोई भी उसे संभालने वाला नहीं है। “मेरी ये नैया तेरे हवाले” पंक्ति यह दर्शाती है कि भक्त ने अपने जीवन के सभी भार, कष्ट और निर्णय प्रभु पर छोड़ दिए हैं। भगवान को “नैन के तारे” कहना यह प्रकट करता है कि वे भक्त के जीवन का केंद्र और आशा का एकमात्र आधार हैं। यह भजन हृदय में विश्वास, दीनता और गहन भक्ति का भाव जगाता है। यह भजन कब और कहाँ गाया जाता है यह भजन विशेष रूप से पुरी जगन्नाथ मंदिर रथयात्रा महोत्सव जगन्नाथ भजन संध्या व्यक्तिगत प्रार्थना और संकट के समय गाया जाता है। इस्कॉन मंदिरों और वैष्णव सत्संगों में भी यह भजन अत्यंत श्रद्धा से गाया जाता है।
श्री जगन्नाथ चालीसा - Shree Jagannath Chalisa
Chalisa

श्री जगन्नाथ चालीसा - Shree Jagannath Chalisa

यह “श्री जगन्नाथ चालीसा” भगवान श्री जगन्नाथ की महिमा, करुणा और भक्तवत्सल स्वरूप का विस्तार से वर्णन करती है। दोहा और चौपाई छंद में रचित यह चालीसा भगवान के धाम, उनकी रथ यात्रा, तथा भक्तों पर की गई विशेष कृपा का सुंदर वर्णन प्रस्तुत करती है। इसका पाठ विशेष रूप से रथ यात्रा, आषाढ़ मास, गुरुवार, तथा श्री जगन्नाथ मंदिर में श्रद्धा से किया जाता है।
Shri Jagannatha Temple - Hauz Khas New Delhi
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Shri Jagannatha Temple - Hauz Khas New Delhi

नई दिल्ली के हौज खास में स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर की दर्शन जानकारी, आरती समय, मंदिर का इतिहास, स्थान और धार्मिक महत्व Reviving Cultures पर पढ़ें।