श्री भवानी अष्टकम् - Shree Bhavani Ashtakam
परिचय
भवानी अष्टकम् की रचना आदि शंकराचार्य ने की है। यह अष्टकम् माँ भवानी / आदिशक्ति के प्रति पूर्ण शरणागति का भाव प्रकट करता है। साधक स्वीकार करता है कि संसार में कोई भी स्थायी सहारा नहीं है — एकमात्र आश्रय माँ भवानी ही हैं।
भावार्थ
यह अष्टकम् बताता है कि जब सभी संबंध, ज्ञान, कर्म और साधन असहाय प्रतीत हों, तब भी माँ भवानी जीव की एकमात्र गति हैं। वह हर संकट, भय, पाप और दुःख से रक्षा करने वाली करुणामयी शक्ति हैं।
अर्थ (संक्षिप्त व्याख्या)
गतिस्त्वं – मेरी एकमात्र शरण
भवाब्धि – संसार रूपी सागर
कुसंसार पाश – मोह और बंधन
शरण्ये – शरण देने वाली
आदिशक्ति – समस्त शक्तियों की मूल