श्री सूर्य देव आरती - Shree Surya Dev Aarti
सूर्यदेव की यह आरती भगवान सूर्य नारायण के तेज, करुणा, ज्ञान और लोककल्याणकारी स्वरूप का गुणगान करती है। इसमें सूर्यदेव को कश्यप ऋषि और अदिति के पुत्र, समस्त संसार के अंधकार का नाश करने वाले तथा भक्तों के हृदय को प्रकाशित करने वाले देवता के रूप में वंदित किया गया है। सनातन परंपरा में सूर्यदेव को प्रत्यक्ष देवता माना गया है, जिनकी उपासना से स्वास्थ्य, ऊर्जा, आत्मविश्वास, बुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। प्रातःकाल इस आरती का श्रद्धापूर्वक गायन करने से जीवन में सकारात्मकता और दिव्य चेतना का संचार होता है।
ऊँ जय कश्यप नन्दन, प्रभु जय अदिति नन्दन।
त्रिभुवन तिमिर निकंदन, भक्त हृदय चन्दन॥
सप्त अश्वरथ राजित, एक चक्रधारी।
दुःखहारी, सुखकारी, मानस मलहारी॥
सुर मुनि भूसुर वन्दित, विमल विभवशाली।
अघ-दल-दलन दिवाकर, दिव्य किरण माली॥
सकल सुकर्म प्रसविता, सविता शुभकारी।
विश्व विलोचन मोचन, भव-बंधन भारी॥
कमल समूह विकासक, नाशक त्रय तापा।
सेवत सहज हरत अति, मनसिज संतापा॥
नेत्र व्याधि हर सुरवर, भू-पीड़ा हारी।
वृष्टि विमोचन संतत, परहित व्रतधारी॥
सूर्यदेव करुणाकर, अब करुणा कीजै।
हर अज्ञान मोह सब, तत्वज्ञान दीजै॥
ऊँ जय कश्यप नन्दन, प्रभु जय अदिति नन्दन।
त्रिभुवन तिमिर निकंदन, भक्त हृदय चन्दन॥
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सरयू किनारे - Saryu Kinare
परिचय यह अत्यंत मधुर और भावपूर्ण राम भजन भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के अयोध्या आगमन की दिव्य अनुभूति को प्रकट करता है। भजन में सरयू तट, अवध नगरी और प्रभु श्रीराम के स्वागत का इतना सुंदर चित्रण किया गया है कि सुनने वाला स्वयं को अयोध्या की उस पावन बेला में उपस्थित अनुभव करता है। भजन के शब्द भक्तों के हृदय में वर्षों से बसे उस प्रेम, प्रतीक्षा और आनंद को दर्शाते हैं, जब प्रभु अपने भक्तों के जीवन और घर में पधारते हैं। दीपों की रोशनी, मुस्कुराते चेहरे और प्रभु दर्शन की लालसा इस भजन को और भी अधिक भक्तिमय बना देती है। यह केवल भगवान के आगमन का वर्णन नहीं, बल्कि उस आध्यात्मिक आनंद का उत्सव है जो प्रभु कृपा से जीवन में आता है। भावार्थ इस भजन में भक्त भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के अवध आगमन का आनंद मनाते हुए कहता है कि जैसे प्रभु स्वयं उसके आंगन में पधार गए हों। प्रभु के आगमन से पूरा वातावरण प्रकाश, प्रेम और खुशियों से भर जाता है। वर्षों की प्रतीक्षा समाप्त होती है और भक्त की आँखें प्रभु दर्शन पाकर भावविभोर हो उठती हैं। भजन यह भी दर्शाता है कि श्रीराम, सीता और लक्ष्मण का संबंध प्रेम, त्याग और मर्यादा का प्रतीक है। उनके दर्शन मात्र से भक्त के जीवन में शांति और आनंद का संचार होता है। अवधपुरी की खुशहाली और दीपों की जगमगाहट इस बात का प्रतीक है कि जहाँ प्रभु का वास होता है वहाँ अंधकार और दुःख स्वयं दूर हो जाते हैं। अंत में भक्त यही कामना करता है कि उसका पूरा जीवन प्रभु के दर्शन और स्मरण में ही बीते। यह भजन श्रद्धा, प्रेम और प्रभु आगमन की अलौकिक अनुभूति को अत्यंत सुंदर ढंग से प्रस्तुत करता है।
हे गोपाल राधा कृष्ण गोविंद गोविंद - Hey Gopal Radha Krishna Govind Govind Sankirtan
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मैं तो गोवर्धन कु जाऊ मेरी वीर - Mai To Govardhan Ku Jau Meri Veer
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भक्ति रस के और आरतीMore Bhajans

यह स्तोत्र भगवान श्री गणेश (गणपति) की महिमा का गुणगान है, जो 'वक्रतुंड' (टेढ़ी सूंड वाले), 'महाकाय' (विशालकाय), 'सूर्यकोटि समप्रभा' (करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी) कहे गए हैं। इसमें 'ॐ गं गणपतये नमः' बीज मंत्र है, तथा 'सिद्धिविनायक' (सिद्धि देने वाले), 'अस्तविनायक' (आठ प्रसिद्ध गणेश मंदिरों के स्वामी) का स्मरण किया गया है। इस स्तोत्र में प्रसिद्ध गणेश आरती 'सुखकर्ता दुःखहर्ता' का भी समावेश है, जो सर्वविदित है।

यह स्तोत्र भगवान जगन्नाथ (जो श्री विष्णु या भगवान कृष्ण के ही रूप हैं) की महिमा का गुणगान करता है। 'जगन्नाथ' का अर्थ है 'जगत के नाथ' अर्थात ब्रह्मांड के स्वामी। इस स्तोत्र में भगवान के अनेक नामों एवं स्वरूपों - चतुर्भुज (चार भुजाओं वाले), पद्मनाभ (नाभि में कमल वाले), निलाद्रिह (नीलांचल या नीलगिरि पर्वत पर निवास करने वाले), दीनबंधु (दीनों के मित्र), दयासिंधु (दया के सागर), बलभद्र (बलराम), बासुदेव (वसुदेव के पुत्र), माधव, मधुसूदन, मुरारि, कृष्ण, केशव, श्रीराम, गोविंद, कपिलाचार्य (कपिल मुनि अवतार) आदि का वर्णन है। इस स्तोत्र में भगवान को सर्वव्यापी, जगत के कर्ता-धर्ता, रक्षक और लक्ष्मीपति बताया गया है।

प्रस्तुत संग्रह हिंदू धर्मातील पाच प्रमुख आरती व भजनांचा आहे - श्री गणेश आरती (सुखकर्ता दुखहर्ता), श्री शंकर आरती (लवथवती विक्राळा), श्री देवी आरती (दुर्गे दुर्घट भारी), घालीन लोटांगण (संत नामदेव) व वैष्णव भजन (अच्युतं केशवं व हरे कृष्ण). यात गणपतीला विघ्नहर्ता, शंकराला संहारक व दयाळू, देवीला शक्तिस्वरूपा आणि विष्णूला पालनकर्ता म्हणून गायले आहे. ही सर्व गीते आरतीच्या वेळी, सकाळ-संध्याकाळच्या उपासनेत व विशेष सणांमध्ये गायली जातात.

यह भजन माँ दुर्गा माता की शरणागति और भक्त की विनम्र प्रार्थना को दर्शाता है। इसमें भक्त अपनी कमजोरी स्वीकार करते हुए माँ से कृपा और सहारे की याचना करता है।

“भोर भई दिन चढ़ गया मेरी अम्बे” एक प्रसिद्ध आरती भजन है, जो माता दुर्गा माता की महिमा और उनकी पूजा का वर्णन करता है। यह भजन प्रातःकालीन आरती और नवरात्रि के दौरान विशेष रूप से गाया जाता है।

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यह भगवान धन्वंतरि की आरती है। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद के देवता तथा भगवान विष्णु का अंशावतार माना जाता है। समुद्र मंथन के समय वे अमृत कलश और औषधियों के ज्ञान के साथ प्रकट हुए।

यह माँ गंगा की आरती है। गंगा को सनातन परंपरा में पतित पावनी तथा मोक्षदायिनी माना गया है। उनका जल पवित्र और जीवनदायी है।

यह माँ पार्वती की आरती है। पार्वती जी को आदिशक्ति, जगजननी तथा भगवान शिव की अर्धांगिनी माना जाता है। वे सती, दुर्गा और भवानी के रूप में भक्तों का कल्याण करती हैं।

यह श्री तुलसी माता की आरती है। तुलसी को भगवान विष्णु की अति प्रिय माना गया है। सनातन परंपरा में तुलसी का स्थान अत्यंत पवित्र है तथा प्रत्येक शुभ कार्य में तुलसी का विशेष महत्व है।