श्री सिद्धिविनायक आरती - Shree Siddhivinayak Aarti
प्रस्तुत संग्रह हिंदू धर्मातील पाच प्रमुख आरती व भजनांचा आहे - श्री गणेश आरती (सुखकर्ता दुखहर्ता), श्री शंकर आरती (लवथवती विक्राळा), श्री देवी आरती (दुर्गे दुर्घट भारी), घालीन लोटांगण (संत नामदेव) व वैष्णव भजन (अच्युतं केशवं व हरे कृष्ण). यात गणपतीला विघ्नहर्ता, शंकराला संहारक व दयाळू, देवीला शक्तिस्वरूपा आणि विष्णूला पालनकर्ता म्हणून गायले आहे. ही सर्व गीते आरतीच्या वेळी, सकाळ-संध्याकाळच्या उपासनेत व विशेष सणांमध्ये गायली जातात.
सुख करता दुखहर्ता, वार्ता विघ्नाची ।
नूर्वी पूर्वी प्रेम कृपा जयाची ।
सर्वांगी सुन्दर उटी शेंदु राची ।
कंठी झलके माल मुकताफळांची ।
जय देव जय देव, जय मंगल मूर्ति ।
दर्शनमात्रे मनः, कामना पूर्ति जय देव जय देव ॥
रत्नखचित फरा तुझ गौरीकुमरा ।
चंदनाची उटी कुमकुम केशरा ।
हीरे जडित मुकुट शोभतो बरा ।
रुन्झुनती नूपुरे चरनी घागरिया ।
जय देव जय देव, जय मंगल मूर्ति ।
दर्शनमात्रे मनः, कामना पूर्ति जय देव जय देव ॥
लम्बोदर पीताम्बर फनिवर वंदना ।
सरल सोंड वक्रतुंडा त्रिनयना ।
दास रामाचा वाट पाहे सदना ।
संकटी पावावे निर्वाणी, रक्षावे सुरवर वंदना ।
जय देव जय देव, जय मंगल मूर्ति ।
दर्शनमात्रे मनः, कामना पूर्ति जय देव जय देव ॥
॥ श्री गणेशाची आरती ॥
शेंदुर लाल चढ़ायो अच्छा गजमुखको ।
दोंदिल लाल बिराजे सुत गौरिहरको ।
हाथ लिए गुड लड्डू सांई सुरवरको ।
महिमा कहे न जाय लागत हूं पादको ॥
जय देव जय देव..
जय देव जय देव, जय जय श्री गणराज ।
विद्या सुखदाता धन्य तुम्हारा दर्शन, मेरा मन रमता, जय देव जय देव ॥
अष्टौ सिद्धि दासी संकटको बैरि ।
विघ्नविनाशन मंगल मूरत अधिकारी ।
कोटीसूरजप्रकाश ऐबी छबि तेरी ।
गंडस्थलमदमस्तक झूले शशिबिहारि ॥
जय देव जय देव, जय जय श्री गणराज ।
विद्या सुखदाता धन्य तुम्हारा दर्शन, मेरा मन रमता, जय देव जय देव ॥
भावभगत से कोई शरणागत आवे ।
संतत संपत सबही भरपूर पावे ।
ऐसे तुम महाराज मोको अति भावे ।
गोसावीनंदन निशिदिन गुन गावे ॥
जय देव जय देव, जय जय श्री गणराज ।
विद्या सुखदाता धन्य तुम्हारा दर्शन, मेरा मन रमता, जय देव जय देव ॥
॥ श्री शंकराची आरती ॥
लवथवती विक्राळा ब्रह्मांडी माळा,
वीषे कंठ काळा त्रिनेत्री ज्वाळा
लावण्य सुंदर मस्तकी बाळा,
तेथुनिया जळ निर्मळ वाहे झुळझुळा ॥
जय देव जय देव..
जय देव जय देव, जय श्रीशंकरा ।
आरती ओवाळू, तुज कर्पुरगौरा जय देव जय देव ॥
कर्पुरगौरा भोळा नयनी विशाळा,
अर्धांगी पार्वती सुमनांच्या माळा
विभुतीचे उधळण शितकंठ नीळा,
ऐसा शंकर शोभे उमा वेल्हाळा ॥
जय देव जय देव, जय श्रीशंकरा ।
आरती ओवाळू, तुज कर्पुरगौरा जय देव जय देव ॥
देवी दैत्यी सागरमंथन पै केले,
त्यामाजी अवचित हळहळ जे उठले
ते त्वा असुरपणे प्राशन केले,
नीलकंठ नाम प्रसिद्ध झाले ॥
जय देव जय देव, जय श्रीशंकरा ।
आरती ओवाळू, तुज कर्पुरगौरा जय देव जय देव ॥
व्याघ्रांबर फणिवरधर सुंदर मदनारी,
पंचानन मनमोहन मुनिजनसुखकारी
शतकोटीचे बीज वाचे उच्चारी,
रघुकुलटिळक रामदासा अंतरी ॥
जय देव जय देव, जय श्रीशंकरा ।
आरती ओवाळू, तुज कर्पुरगौरा जय देव जय देव ॥
॥ श्री देवीची आरती ॥
दुर्गे दुर्घट भारी तुजविण संसारी,
अनाथनाथे अंबे करुणा विस्तारी ।
वारी वारीं जन्ममरणाते वारी,
हारी पडलो आता संकट नीवारी ॥
जय देवी जय देवी..
जय देवी जय देवी, जय महिषासुरमथनी ।
सुरवर-ईश्वर-वरदे, तारक संजीवनी जय देवी जय देवी ॥
त्रिभुवनी भुवनी पाहतां तुज ऎसे नाही,
चारी श्रमले परंतु न बोलावे काहीं ।
साही विवाद करितां पडिले प्रवाही,
ते तूं भक्तालागी पावसि लवलाही ॥
जय देवी जय देवी, जय महिषासुरमथनी ।
सुरवरईश्वरवरदे, तारक संजीवनी जय देवी जय देवी ॥
प्रसन्न वदने प्रसन्न होसी निजदासां,
क्लेशापासूनि सोडी तोडी भवपाशा ।
अंवे तुजवांचून कोण पुरविल आशा,
नरहरि तल्लिन झाला पदपंकजलेशा ॥
जय देवी जय देवी, जय महिषासुरमथनी ।
सुरवरईश्वरवरदे, तारक संजीवनी जय देवी जय देवी ॥
॥ घालीन लोटांगण आरती ॥
घालीन लोटांगण, वंदीन चरण ।
डोळ्यांनी पाहीन रुप तुझें ।
प्रेमें आलिंगन, आनंदे पूजिन ।
भावें ओवाळीन म्हणे नामा ॥
त्वमेव माता च पिता त्वमेव ।
त्वमेव बंधुक्ष्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विध्या द्रविणं त्वमेव ।
त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥
कायेन वाचा मनसेंद्रीयेव्रा,
बुद्धयात्मना वा प्रकृतिस्वभावात ।
करोमि यध्य्त सकलं परस्मे,
नारायणायेति समर्पयामि ॥
भक्ति भारत भजन
अच्युतं केशवं रामनारायणं,
कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम ।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं,
जानकीनायकं रामचंद्र भजे ॥
हरे राम हर राम,
राम राम हरे हरे ।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण,
कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥
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सरयू किनारे - Saryu Kinare
परिचय यह अत्यंत मधुर और भावपूर्ण राम भजन भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के अयोध्या आगमन की दिव्य अनुभूति को प्रकट करता है। भजन में सरयू तट, अवध नगरी और प्रभु श्रीराम के स्वागत का इतना सुंदर चित्रण किया गया है कि सुनने वाला स्वयं को अयोध्या की उस पावन बेला में उपस्थित अनुभव करता है। भजन के शब्द भक्तों के हृदय में वर्षों से बसे उस प्रेम, प्रतीक्षा और आनंद को दर्शाते हैं, जब प्रभु अपने भक्तों के जीवन और घर में पधारते हैं। दीपों की रोशनी, मुस्कुराते चेहरे और प्रभु दर्शन की लालसा इस भजन को और भी अधिक भक्तिमय बना देती है। यह केवल भगवान के आगमन का वर्णन नहीं, बल्कि उस आध्यात्मिक आनंद का उत्सव है जो प्रभु कृपा से जीवन में आता है। भावार्थ इस भजन में भक्त भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के अवध आगमन का आनंद मनाते हुए कहता है कि जैसे प्रभु स्वयं उसके आंगन में पधार गए हों। प्रभु के आगमन से पूरा वातावरण प्रकाश, प्रेम और खुशियों से भर जाता है। वर्षों की प्रतीक्षा समाप्त होती है और भक्त की आँखें प्रभु दर्शन पाकर भावविभोर हो उठती हैं। भजन यह भी दर्शाता है कि श्रीराम, सीता और लक्ष्मण का संबंध प्रेम, त्याग और मर्यादा का प्रतीक है। उनके दर्शन मात्र से भक्त के जीवन में शांति और आनंद का संचार होता है। अवधपुरी की खुशहाली और दीपों की जगमगाहट इस बात का प्रतीक है कि जहाँ प्रभु का वास होता है वहाँ अंधकार और दुःख स्वयं दूर हो जाते हैं। अंत में भक्त यही कामना करता है कि उसका पूरा जीवन प्रभु के दर्शन और स्मरण में ही बीते। यह भजन श्रद्धा, प्रेम और प्रभु आगमन की अलौकिक अनुभूति को अत्यंत सुंदर ढंग से प्रस्तुत करता है।
हे गोपाल राधा कृष्ण गोविंद गोविंद - Hey Gopal Radha Krishna Govind Govind Sankirtan
परिचय यह अत्यंत मधुर और भक्तिरस से परिपूर्ण श्रीकृष्ण नाम-स्मरण भजन भगवान श्रीकृष्ण के विभिन्न दिव्य नामों का संकीर्तन करता है। “गोपाल”, “राधा कृष्ण” और “गोविंद” जैसे पावन नाम भक्त के मन को भक्ति, प्रेम और शांति से भर देते हैं। इस भजन का सरल और मधुर स्वरूप सामूहिक संकीर्तन, भजन मंडली और ध्यान के समय विशेष आनंद प्रदान करता है। बार-बार भगवान के नामों का उच्चारण करते हुए भक्त अपने मन को संसारिक चिंताओं से हटाकर श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन कर देता है। यह भजन नाम-जप की महिमा को दर्शाता है और बताता है कि भगवान का नाम ही जीवन का सबसे बड़ा सहारा और आत्मिक आनंद का स्रोत है। भावार्थ इस भजन में भक्त भगवान श्रीकृष्ण को उनके प्रिय नामों से पुकारते हुए उनका स्मरण करता है। “गोपाल” भगवान के उस रूप को दर्शाता है जो अपने भक्तों और समस्त जीवों का पालन करते हैं, जबकि “गोविंद” आनंद और करुणा के स्वरूप श्रीकृष्ण का नाम है। भजन यह संदेश देता है कि भगवान के नामों का निरंतर जप करने से मन शुद्ध होता है और भक्त के भीतर प्रेम, भक्ति और शांति का संचार होता है। यह संकीर्तन भक्त को श्रीराधा-कृष्ण की दिव्य उपस्थिति का अनुभव कराते हुए उसे भक्ति रस में डुबो देता है।
मैं तो गोवर्धन कु जाऊ मेरी वीर - Mai To Govardhan Ku Jau Meri Veer
परिचय यह अत्यंत मधुर और भक्तिरस से भरा गोवर्धन भजन भक्त के मन में बसे ब्रज प्रेम और गिरिराज गोवर्धन के प्रति अटूट श्रद्धा का सुंदर चित्रण करता है। इस भजन में भक्त अपने मन की तीव्र इच्छा व्यक्त करता है कि वह गोवर्धन धाम जाकर गिरिराज जी की परिक्रमा करे, मानसी गंगा में स्नान करे और संतों की सेवा कर भगवान के दर्शन प्राप्त करे। भजन में ब्रजभक्ति की सरलता और प्रेममयी भावना झलकती है। भक्त का मन संसार में कहीं नहीं लगता और वह बार-बार केवल गोवर्धन जाने की ही इच्छा प्रकट करता है। गिरिराज महाराज की परिक्रमा, संत सेवा और हरि दर्शन की लालसा इस भजन को अत्यंत भावपूर्ण बना देती है। यह भजन केवल तीर्थ यात्रा का वर्णन नहीं बल्कि भगवान श्रीकृष्ण और ब्रजधाम के प्रति गहरी भक्ति, प्रेम और समर्पण का दिव्य प्रतीक है। भावार्थ इस भजन में भक्त कहता है कि उसका मन किसी भी प्रकार से नहीं मानता और वह केवल गोवर्धन धाम जाना चाहता है। वह गिरिराज जी की सात कोस परिक्रमा करना, मानसी गंगा में स्नान करना और संतों को भोजन कराना चाहता है। भक्त के हृदय में श्रीकृष्ण के दर्शन की तीव्र लालसा है और वह ब्रजभूमि की सेवा को ही अपने जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य मानता है। उसका मन संसारिक इच्छाओं से हटकर केवल हरि भक्ति में रम गया है। यह भजन दर्शाता है कि सच्चा भक्त भगवान और उनके धाम के प्रति इतना प्रेम रखता है कि उसका मन हर समय उसी स्मरण और दर्शन की अभिलाषा में लगा रहता है।
अंत समय में श्याम - Ant Samay Mein Shyam
परिचय यह अत्यंत भावपूर्ण कृष्ण-भक्ति गीत है, जिसमें भक्त अपने जीवन की समस्त भूलों, दुर्बलताओं और सांसारिक मोह-माया को स्वीकार करते हुए भगवान श्रीकृष्ण से अंतिम समय में अपने नाम का स्मरण कराने की प्रार्थना करता है। इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि जीवन भर की सच्ची भक्ति और भगवान का नाम ही अंत समय में जीव का वास्तविक सहारा बनता है। भजन में वैराग्य, समर्पण, पश्चाताप और प्रभु-प्रेम का सुंदर संगम देखने को मिलता है। भावार्थ इस भजन में भक्त भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में पूर्ण समर्पण व्यक्त करता है। वह स्वीकार करता है कि जीवन में उससे अनेक भूलें हुई हैं, फिर भी उसे प्रभु की असीम करुणा पर विश्वास है। संसार की धन-दौलत, शरीर और संबंध सभी नश्वर हैं और अंततः साथ छोड़ जाते हैं, परंतु भगवान का नाम और उनकी कृपा ही जीव के साथ रहती है। भक्त प्रार्थना करता है कि मृत्यु के समय उसकी जिह्वा पर केवल श्रीकृष्ण का नाम हो और स्वयं श्याम उसे अपने धाम ले जाने आएँ। यह भजन भगवान के नाम-स्मरण, प्रेम और शरणागति के महत्व को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है।
भक्ति रस के और आरतीMore Bhajans

यह स्तोत्र भगवान श्री गणेश (गणपति) की महिमा का गुणगान है, जो 'वक्रतुंड' (टेढ़ी सूंड वाले), 'महाकाय' (विशालकाय), 'सूर्यकोटि समप्रभा' (करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी) कहे गए हैं। इसमें 'ॐ गं गणपतये नमः' बीज मंत्र है, तथा 'सिद्धिविनायक' (सिद्धि देने वाले), 'अस्तविनायक' (आठ प्रसिद्ध गणेश मंदिरों के स्वामी) का स्मरण किया गया है। इस स्तोत्र में प्रसिद्ध गणेश आरती 'सुखकर्ता दुःखहर्ता' का भी समावेश है, जो सर्वविदित है।

यह स्तोत्र भगवान जगन्नाथ (जो श्री विष्णु या भगवान कृष्ण के ही रूप हैं) की महिमा का गुणगान करता है। 'जगन्नाथ' का अर्थ है 'जगत के नाथ' अर्थात ब्रह्मांड के स्वामी। इस स्तोत्र में भगवान के अनेक नामों एवं स्वरूपों - चतुर्भुज (चार भुजाओं वाले), पद्मनाभ (नाभि में कमल वाले), निलाद्रिह (नीलांचल या नीलगिरि पर्वत पर निवास करने वाले), दीनबंधु (दीनों के मित्र), दयासिंधु (दया के सागर), बलभद्र (बलराम), बासुदेव (वसुदेव के पुत्र), माधव, मधुसूदन, मुरारि, कृष्ण, केशव, श्रीराम, गोविंद, कपिलाचार्य (कपिल मुनि अवतार) आदि का वर्णन है। इस स्तोत्र में भगवान को सर्वव्यापी, जगत के कर्ता-धर्ता, रक्षक और लक्ष्मीपति बताया गया है।

सूर्यदेव की यह आरती भगवान सूर्य नारायण के तेज, करुणा, ज्ञान और लोककल्याणकारी स्वरूप का गुणगान करती है। इसमें सूर्यदेव को कश्यप ऋषि और अदिति के पुत्र, समस्त संसार के अंधकार का नाश करने वाले तथा भक्तों के हृदय को प्रकाशित करने वाले देवता के रूप में वंदित किया गया है। सनातन परंपरा में सूर्यदेव को प्रत्यक्ष देवता माना गया है, जिनकी उपासना से स्वास्थ्य, ऊर्जा, आत्मविश्वास, बुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। प्रातःकाल इस आरती का श्रद्धापूर्वक गायन करने से जीवन में सकारात्मकता और दिव्य चेतना का संचार होता है।

यह भजन माँ दुर्गा माता की शरणागति और भक्त की विनम्र प्रार्थना को दर्शाता है। इसमें भक्त अपनी कमजोरी स्वीकार करते हुए माँ से कृपा और सहारे की याचना करता है।

“भोर भई दिन चढ़ गया मेरी अम्बे” एक प्रसिद्ध आरती भजन है, जो माता दुर्गा माता की महिमा और उनकी पूजा का वर्णन करता है। यह भजन प्रातःकालीन आरती और नवरात्रि के दौरान विशेष रूप से गाया जाता है।

यह माँ सरस्वती की आरती है। सरस्वती को विद्या, ज्ञान, वाणी और कला की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। वे हंसवाहिनी, वीणावादिनी और श्वेतवस्त्रा रूप में पूजित हैं।

यह भगवान धन्वंतरि की आरती है। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद के देवता तथा भगवान विष्णु का अंशावतार माना जाता है। समुद्र मंथन के समय वे अमृत कलश और औषधियों के ज्ञान के साथ प्रकट हुए।

यह माँ गंगा की आरती है। गंगा को सनातन परंपरा में पतित पावनी तथा मोक्षदायिनी माना गया है। उनका जल पवित्र और जीवनदायी है।

यह माँ पार्वती की आरती है। पार्वती जी को आदिशक्ति, जगजननी तथा भगवान शिव की अर्धांगिनी माना जाता है। वे सती, दुर्गा और भवानी के रूप में भक्तों का कल्याण करती हैं।

यह श्री तुलसी माता की आरती है। तुलसी को भगवान विष्णु की अति प्रिय माना गया है। सनातन परंपरा में तुलसी का स्थान अत्यंत पवित्र है तथा प्रत्येक शुभ कार्य में तुलसी का विशेष महत्व है।