श्री नृसिंह स्तम्भाविर्भाव स्तोत्रम् - Shree Narasimha Stambha Avirbhava Stotram
नृसिंह स्तोत्र भगवान भगवान नृसिंह की महिमा का अत्यंत प्रभावशाली और दिव्य स्तवन है। यह स्तोत्र उनके उग्र, तेजस्वी तथा रक्षक स्वरूप का विस्तृत वर्णन करता है, जिन्होंने अपने परम भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए अद्भुत रूप धारण किया। जब अधर्म अपने चरम पर था और अत्याचारी हिरण्यकश्यप ने समस्त मर्यादाओं को तोड़ दिया था, तब भगवान ने नृसिंह अवतार लेकर धर्म की पुनः स्थापना की।
सहस्रभास्करस्फुरत्प्रभाक्षदुर्निरीक्षणं
प्रभग्नक्रूरकृद्धिरण्यकश्यपोरुरःस्थलम्॥
अर्थ - मैं उस भगवान नृसिंह की वंदना करता हूँ जिनकी प्रभा हजारों सूर्य के समान तेजस्वी है, जिन्हें देख पाना अत्यंत कठिन है। जिन्होंने क्रोध में आकर अत्याचारी हिरण्यकश्यप के वक्षस्थल को चीर दिया।
अजसृजाण्डकर्परप्रभिन्नरौद्रगर्जनं
उदग्रनिग्रहाग्रहोग्रविग्रहाकृतिं भजे॥ १॥
अर्थ - जिनकी भयंकर गर्जना से ब्रह्मांड के अंड (सृष्टि) तक कांप उठते हैं, जो अत्यंत उग्र स्वरूप धारण कर दुष्टों का दमन करते हैं—ऐसे भगवान को मैं नमन करता हूँ।
स्वयम्भुशम्भुजम्भजित्प्रमुख्यदिव्यसम्भ्रम-
द्विजृम्भदुद्यदुत्कटोग्रदैत्यदम्भकुम्भिभित्॥
अर्थ - जिनकी महिमा से ब्रह्मा, शिव और अन्य देवता भी चकित हो जाते हैं, जो अत्यंत उग्र होकर दैत्यों के अहंकार को नष्ट करते हैं।
अनर्गलाट्टहासनिस्पृहाष्टदिग्गजार्भटिं
युगान्तिमान्तककृतान्तधिक्कृतान्तकं भजे॥ २॥
अर्थ - जिनकी प्रचंड हंसी से आठों दिशाओं के दिग्गज भी कांप उठते हैं, जो काल के भी अंत करने वाले हैं—ऐसे भगवान की मैं उपासना करता हूँ।
जगज्ज्वलद्दहद्ग्रसद्बृहत्स्फुरन्मुखार्भटिं
महद्भयद्भवद्धगद्धगल्लसत्कृताकृतिम्॥
अर्थ - जिनका विशाल मुख सम्पूर्ण जगत को जलाने और निगलने की क्षमता रखता है, जिनकी ज्वाला से सब भयभीत हो जाते हैं।
हिरण्यकश्यपोः सहस्रसंहरत्समर्थकृ-
न्मुहुर्मुहुर्गलद्गलद्ध्वनन्नृसिंह रक्ष माम्॥ ३॥
अर्थ - हे नृसिंह भगवान! आपने हिरण्यकश्यप जैसे असुर का संहार किया, उसी प्रकार मेरी बार-बार रक्षा करें और मुझे सभी संकटों से बचाएं।
जयत्ववक्रविक्रमक्रमाक्रमक्रियाहरत्
स्फुरत्सहस्रविस्फुलिङ्गभास्करप्रभाग्रसत्॥
अर्थ - जिनकी शक्ति और पराक्रम अद्भुत है, जिनकी ज्वाला हजारों चिंगारियों के समान प्रकट होती है और सूर्य की प्रभा को भी ढक लेती है।
धगद्धगद्धगल्लसन्महद्भ्रमत्सुदर्शनो-
न्मदेभभित्स्वरूपभृद्धवत्कृपामृताम्बुधिः॥ ४॥
अर्थ - जिनका स्वरूप सुदर्शन चक्र के समान तेजस्वी है, जो दुष्टों का नाश करते हैं और भक्तों के लिए कृपा के सागर हैं।
विपक्षपक्षराक्षसाक्षमाक्षरूक्षवीक्षणं
सदाक्षयत्कृपाकटाक्षलक्ष्मिलक्ष्मवक्षसम्॥
अर्थ - जिनकी दृष्टि दुष्टों के लिए कठोर और भक्तों के लिए करुणामयी है, जिनके वक्षस्थल पर लक्ष्मी जी विराजमान हैं।
विचक्षणं विलक्षणं सुतीक्षणं प्रतिक्षणं
परीक्ष दीक्ष रक्ष शिक्ष साक्षिण क्षमं भजे॥ ५॥
अर्थ - जो सर्वज्ञ, अद्वितीय और हर क्षण अपने भक्तों की परीक्षा लेकर उन्हें सही मार्ग दिखाते हैं—ऐसे क्षमाशील भगवान को मैं नमन करता हूँ।
अपूर्व शौर्य धैर्य वीर्य दुर्निवार्य दुर्गमं
अगर्व सर्वनिर्वहत्सुपर्ववर्य पर्विणम्॥
अर्थ - जिनका साहस, धैर्य और शक्ति अनुपम है, जिन्हें कोई रोक नहीं सकता, जो बिना अहंकार के समस्त कार्यों का संचालन करते हैं।
अकार्यकार्यकृद्धनार्यपर्वतप्रहारिणं
सदार्यकार्यभार सत्प्रचार गुर्विणं भजे॥ ६॥
अर्थ - जो असंभव को संभव करने वाले हैं, जो दुष्टों का नाश करते हैं और सज्जनों के कार्यों का भार उठाते हैं—ऐसे भगवान को मैं प्रणाम करता हूँ।
करालवक्त्र कर्कशोग्रवज्रदंष्ट्रमुज्ज्वलं
कुठारखड्गकुन्ततोमराङ्कुशोन्नखायुधम्॥
अर्थ - जिनका मुख भयंकर है, जिनके दांत वज्र के समान कठोर और तेजस्वी हैं, जिनके नख और शस्त्र अत्यंत शक्तिशाली हैं।
महाभ्रयूधभग्नसञ्चलत्सटाजटालकं
जगत्प्रमूर्छिताट्टहासचक्रवर्ति सम्भजे॥ ७॥
अर्थ - जिनकी गर्जना और अट्टहास से पूरा जगत कांप उठता है और जिनका रूप अत्यंत प्रभावशाली है—ऐसे भगवान की मैं उपासना करता हूँ।
प्रपत्ति प्रार्थनार्चनाभिवन्दन प्रदक्षिणा
नताननाङ्ग वाङ्मनः स्मरज्जपस्तुवत्सगत्॥
अर्थ - जो भक्त समर्पण, प्रार्थना, पूजा, प्रणाम, जप और ध्यान के माध्यम से भगवान का स्मरण करते हैं।
कदाश्रुपूरणार्द्रदिव्यभक्तिपारवश्यता
सकृद्भवत्क्रियाचरन्नृसिंह मां प्रसीद ताम्॥ ८॥
अर्थ - ऐसे भक्तों पर भगवान नृसिंह शीघ्र प्रसन्न होते हैं, जो भक्ति में डूबकर भावुक होकर उनकी आराधना करते हैं।
दरिद्रदेविदुष्टदृष्टिदुःखदुर्भरं हरं
नवग्रहोग्रवक्रदोषणाधिव्याधिनिग्रहम्॥
अर्थ - जो दरिद्रता, बुरी दृष्टि, दुख और ग्रह दोषों का नाश करते हैं।
परौषधाधि मन्त्रयन्त्रतन्त्र कृत्रिमं हनं
अकालमृत्युमृत्यु मृत्युमुग्रमूर्तिनं भजे॥ ९॥
अर्थ - जो सभी प्रकार के रोग, तंत्र-मंत्र और अकाल मृत्यु का नाश करते हैं—ऐसे उग्र स्वरूप भगवान को मैं नमन करता हूँ।
इदं नृसिंह स्तम्भसम्भवावतार संस्तवं
वराकलङ्कवंश्य वेङ्कटाभिधान वैष्णवः॥
अर्थ - यह स्तुति भगवान नृसिंह के स्तम्भ से प्रकट होने वाले अवतार की महिमा का वर्णन करती है।
समर्पितोऽस्मि सर्वदा नृसिंहदास्यतेच्छया
रमाङ्क यादशैल नारसिंह तेऽङ्घ्रि सन्निधौ॥ १०॥
अर्थ - मैं स्वयं को सदा भगवान नृसिंह की सेवा में समर्पित करता हूँ और उनके चरणों में शरण ग्रहण करता हूँ।
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भक्ति रस के और स्तोत्रम् - StotramMore Bhajans

परिचय “श्री रामचन्द्र कृपालु भज मन” गोस्वामी गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित अत्यंत प्रसिद्ध और मधुर राम स्तुति है। यह स्तुति भगवान श्रीराम के दिव्य स्वरूप, उनकी करुणा, सौंदर्य, शौर्य और भक्तवत्सलता का अद्भुत वर्णन करती है। इस भजन का पाठ विशेष रूप से राम भक्ति, पूजा, आरती और संध्या वंदना के समय किया जाता है। इसमें भगवान श्रीराम के कमल समान नेत्र, श्यामल रूप, पीताम्बर, धनुष-बाण और उनके दयालु स्वभाव का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण मिलता है। यह स्तुति भक्त के मन को शांति, श्रद्धा और प्रभु प्रेम से भर देती है। भावार्थ इस स्तुति में भक्त भगवान श्रीराम के सुंदर, करुणामय और दिव्य स्वरूप का ध्यान करता है। तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीराम संसार के दुखों और भय को हरने वाले हैं। उनके नेत्र, मुख, हाथ और चरण सभी कमल के समान सुंदर और कोमल हैं। उनका श्यामल स्वरूप नव मेघ के समान मनोहर दिखाई देता है और पीताम्बर बिजली की चमक जैसा प्रतीत होता है। भगवान श्रीराम दीन-दुखियों के सहायक, दैत्यों का नाश करने वाले और रघुकुल के गौरव हैं। उनके सिर पर मुकुट, कानों में कुण्डल और हाथों में धनुष-बाण उनकी वीरता और तेज को प्रकट करते हैं। तुलसीदास जी प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि वे उनके हृदय में निवास करें और काम, क्रोध जैसे विकारों का नाश करें। अंत में माता सीता और माता गौरी के प्रसंग के माध्यम से यह बताया गया है कि सच्चे प्रेम और भक्ति से प्रभु की कृपा अवश्य प्राप्त होती है।

परिचय यह अत्यंत दिव्य और आध्यात्मिक स्तोत्र भगवान शिव की महिमा, करुणा और अनंत स्वरूप का वर्णन करता है। इस स्तुति में भगवान शंकर को सदाशिव, शम्भो और साम्ब शिव के रूप में प्रणाम करते हुए उनके चरणों में शरणागति व्यक्त की गई है। प्रत्येक श्लोक में शिवजी के विभिन्न स्वरूपों, उनके दिव्य गुणों और ब्रह्मांड के पालन, सृष्टि तथा संहार के कारण रूप का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है। यह स्तोत्र केवल स्तुति नहीं, बल्कि भक्त की पूर्ण आत्मसमर्पण भावना और मोक्ष की कामना का प्रतीक है। शिवभक्त इस स्तोत्र का पाठ करके अपने भीतर भक्ति, शांति और आत्मिक शक्ति का अनुभव करते हैं। भावार्थ इस स्तोत्र में भक्त भगवान शिव से प्रार्थना करता है कि वे उसके पाप, अज्ञान और दुःखों को दूर करके उसे अपनी शरण में स्थान दें। भक्त शिवजी को सृष्टि के पालनकर्ता, करुणा के सागर और समस्त जगत के आधार के रूप में स्मरण करता है। वह उनसे अंतःकरण की शुद्धि, सच्ची भक्ति, बल, आरोग्य और दीर्घायु की कामना करता है। स्तोत्र यह भी दर्शाता है कि भगवान शिव ही संसार के समस्त भय, अहंकार और विकारों का नाश करने वाले हैं। अंत में भक्त पूर्ण श्रद्धा के साथ उनके चरणों में समर्पित होकर मोक्ष और दिव्य कृपा की याचना करता है।

परिचय अर्धनारीश्वर स्तोत्र भगवान शिव और माता पार्वती के संयुक्त अर्धनारीश्वर स्वरूप की स्तुति है। इसमें शिव के आधे अंग में पार्वती जी और आधे अंग में स्वयं शिव के दिव्य रूप का वर्णन किया गया है। यह स्वरूप सृष्टि में स्त्री और पुरुष तत्त्व की समानता, संतुलन और एकत्व का प्रतीक है। यह स्तोत्र भक्त को यह संदेश देता है कि शक्ति और शिव अलग नहीं, बल्कि एक ही परम सत्य के दो रूप हैं। इसका श्रद्धापूर्वक पाठ करने से दाम्पत्य जीवन में सुख, मानसिक शांति और आध्यात्मिक संतुलन प्राप्त होता है। भावार्थ इस स्तोत्र में माता पार्वती के सुगंधित चंदन, कस्तूरी, कुंकुम से सुशोभित अंग तथा भगवान शिव के भस्म-विभूषित, जटाधारी और दिगम्बर स्वरूप का सुंदर सामंजस्य वर्णित है। एक ओर कोमलता, करुणा और सौंदर्य है, तो दूसरी ओर वैराग्य, तप और शक्ति। यह स्तोत्र सिखाता है कि जीवन में संतुलन, समरसता और एकत्व ही परम सौंदर्य है।

परिचय यह पावन स्तोत्र भगवान शिव के काशीविश्वनाथ स्वरूप की महिमा का गान करता है। इसमें उन्हें गङ्गाधर, नीलकण्ठ, विश्वेश्वर, गौरीश्वर तथा वृषभवाहन रूप में वंदित किया गया है। यह स्तोत्र काशीपुरी के अधिष्ठाता प्रभु की कृपा प्राप्ति हेतु रचित है। श्रद्धा से इसका पाठ करने पर संकटों का नाश और समस्त मंगल की प्राप्ति बताई गई है। भावार्थ भक्त भगवान विश्वनाथ की शरण ग्रहण कर उनसे दारिद्र्य, दुःख और भय के नाश की प्रार्थना करता है। वे संसाररूपी भार को हरने वाले, करुणामय और शरणागतवत्सल हैं। जो पुरुष श्रद्धापूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसके विघ्न दूर होते हैं, संपत्ति बढ़ती है, विद्या और यश की प्राप्ति होती है तथा मनोवांछित फल मिलते हैं। पाठ का फल आपदाओं का नाश दारिद्र्य और दुःख से मुक्ति विद्या, यश और विजय की प्राप्ति उत्तम संतति और समृद्धि अंततः मोक्षप्राप्ति

परिचय श्री सरस्वती स्तोत्र माता सरस्वती की महिमा का अत्यंत पवित्र और प्रसिद्ध स्तवन है। माँ सरस्वती को विद्या, वाणी, बुद्धि, कला और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। वे श्वेत वस्त्र धारण करने वाली, वीणा और पुस्तक धारण करने वाली तथा हंस वाहन पर विराजमान देवी हैं। इस स्तोत्र में देवी के दिव्य स्वरूप, उनकी करुणा, ज्ञानप्रद शक्ति और जड़ता (अज्ञान) के नाश करने वाली महिमा का सुंदर वर्णन किया गया है। विद्यार्थी, विद्वान, कलाकार और साधक विशेष रूप से इस स्तोत्र का पाठ करते हैं। भावार्थ इस स्तोत्र में देवी सरस्वती को कुंद के फूल, चन्द्रमा और हिम के समान श्वेत व निर्मल बताया गया है। वे वीणा, पुस्तक और अक्षरमाला धारण करती हैं, जो ज्ञान और विद्या का प्रतीक हैं। देवी के अनुग्रह से मनुष्य को बुद्धि, वाणी की शुद्धता, स्मरण शक्ति और आध्यात्मिक प्रकाश प्राप्त होता है। यह स्तोत्र अज्ञानरूपी अंधकार को दूर कर मन में ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न करने की प्रार्थना है।

परिचय यह पवित्र स्तोत्र भगवान गणेश के द्वादश (बारह) दिव्य नामों का स्मरण कराता है। इसमें गणेशजी को वक्रतुण्ड, एकदन्त, लम्बोदर, विघ्नराज, भालचन्द्र, गजानन आदि नामों से वंदित किया गया है। यह स्तोत्र प्रातः, मध्यान्ह और सायं — त्रिसंध्या में पाठ करने योग्य बताया गया है। इसके नियमित जप से विघ्नों का नाश होता है तथा आयु, विद्या, धन और मोक्ष की प्राप्ति होती है। भावार्थ इस स्तोत्र में बताया गया है कि जो मनुष्य श्रद्धा से इन बारह नामों का नित्य स्मरण करता है, उसके जीवन से विघ्न और भय दूर हो जाते हैं। विद्यार्थी को विद्या, धन चाहने वाले को धन, संतान की इच्छा रखने वाले को संतान तथा मोक्ष चाहने वाले को उत्तम गति प्राप्त होती है। अंत में कहा गया है कि जो इस स्तोत्र को लिखकर ब्राह्मणों को अर्पित करता है, उसे भगवान गणेश की कृपा से सर्वविद्या की प्राप्ति होती है। पाठ का फल विघ्नों और बाधाओं का नाश विद्या, धन और संतान की प्राप्ति मनोकामनाओं की सिद्धि भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्ति

परिचय श्री गणेश पञ्चरत्न स्तोत्र भगवान श्रीगणेश की महिमा का अत्यंत प्रसिद्ध और मंगलमय स्तवन है। इसमें गणपति को विघ्नों का नाश करने वाला, बुद्धि और सिद्धि देने वाला तथा समस्त लोकों का रक्षक बताया गया है। यह स्तोत्र पाँच मुख्य श्लोकों में गणेशजी के स्वरूप, गुण, करुणा और दिव्य प्रभाव का वर्णन करता है। श्रद्धा और भक्ति से इसका पाठ करने पर जीवन के विघ्न दूर होते हैं और कार्य सिद्ध होते हैं। भावार्थ इस स्तोत्र में श्रीगणेश को मोदकप्रिय, एकदन्त, गजमुख और करुणामय कहा गया है। वे दैत्यों का विनाश करने वाले, भक्तों के संकट हरने वाले और बुद्धि के दाता हैं। गणेशजी को योगियों के हृदय में निवास करने वाला तथा परम तत्त्व का स्वरूप बताया गया है। उनका स्मरण करने से भय, रोग, दोष और बाधाएँ नष्ट होती हैं तथा जीवन में यश, आरोग्य और समृद्धि प्राप्त होती है।

परिचय यह दिव्य स्तुति भगवान गणेश की महिमा का गान करती है। इसमें उन्हें विघ्नों के नाशक, मोक्ष के साधक, कृपा और क्षमा के सागर, तथा समस्त लोकों के मंगलकर्ता के रूप में वंदित किया गया है। इस स्तुति में गणेशजी के एकदन्त, गजानन, विनायक और महागणेश स्वरूपों का ध्यान कर भक्त उनके चरणों में शरण ग्रहण करता है। भावार्थ भक्त भगवान गणेश को प्रणाम करते हुए उनसे प्रार्थना करता है कि वे उसके विघ्न, पाप और संकटों का नाश करें। जो साधक प्रतिदिन श्रद्धा से इस स्तुति का पाठ करता है, उसे आरोग्य, दोषरहित जीवन, उत्तम संतति और आयु की प्राप्ति होती है। भगवान एकदन्त योगियों के हृदय में सदा विराजमान रहते हैं और अपने भक्तों के सभी विघ्न दूर करते हैं। पाठ का फल समस्त विघ्नों का नाश आरोग्य और आयु की वृद्धि मनोकामनाओं की पूर्ति सुख, समृद्धि और सद्बुद्धि की प्राप्ति

परिचय शिव ताण्डव स्तोत्र महादेव के तेजस्वी और दिव्य चण्डताण्डव नृत्य का स्तुतिपरक स्तोत्र है। इसे रावण जी ने अत्यंत भक्तिभाव और प्रसन्नता के साथ रचा था। इस स्तोत्र में भगवान शिव के अत्यंत सौम्य और क्रूर रूप दोनों का वर्णन किया गया है – उनके जटाओं में बहती गंगा, गले में लिपटी भुजंगमालाएं, सिर पर विराजमान चन्द्रमा और उनके क्रूर ताण्डव का दृश्य। भावार्थ शिव ताण्डव स्तोत्र में भगवान शिव की महिमा का विस्तार से चित्रण किया गया है। इसमें उनके जटाओं में बहती गंगा, सुशोभित चन्द्रमा, भुजंगमालाएं, प्रखर तेज और उनका चण्डताण्डव नृत्य दर्शाया गया है। हर श्लोक में शिव जी की शक्ति, उनकी दिव्यता, उनके क्रोध और करुणा का संतुलन देखने को मिलता है। पाठ का फल इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से: मानसिक और शारीरिक शक्ति में वृद्धि होती है। जीवन में आने वाले संकट, भय और अवरोध दूर होते हैं। ध्यान और एकाग्रता की क्षमता बढ़ती है। भक्त को आध्यात्मिक शांति और आंतरिक उत्साह प्राप्त होता है। जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, साहस और दृढ़ता का संचार होता है।

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