श्री दुर्गा अमृतवाणी - Shree Durga Amritwani

“श्री दुर्गा अमृतवाणी” एक अत्यंत पवित्र और प्रभावशाली स्तुति है, जो माता दुर्गा माता की महिमा, शक्ति और करुणा का विस्तृत वर्णन करती है। यह अमृतवाणी विभिन्न रूपों में देवी की स्तुति करते हुए उनके अनंत स्वरूप, कृपा और भक्तों के प्रति प्रेम को दर्शाती है। इसे विशेष रूप से नवरात्रि, दुर्गा पूजा, जागरण और दैनिक पाठ में श्रद्धा के साथ गाया या पढ़ा जाता है।

मंगलमयी भय मोचिनी दुर्गा सुख की खान
जिसके चरणों की सुधा स्वयं पिये भगवान

दुःखनाशक संजीवनी नवदुर्गा का पाठ
जिससे बनता भिक्षुक भी दुनिया का सम्राट

अम्बा दिव्या स्वरूपिणी का ऐसो प्रकाश
पृथ्वी जिससे ज्योतिर्मय उज्जव्वल है आकाश

दुर्गा परम सनातनी जग की सृजनहार
आदि भवानी महादेवी सृष्टि का आधार

जय जय दुर्गे माँ, जय जय दुर्गे माँ
जय जय दुर्गे माँ, जय जय दुर्गे माँ

सदमार्ग प्रदर्शनी न्यान का ये उपदेश
मन से करता जो मनन उसके कटे कलेश

जो भी विपत्ति काल में करे दुर्गा जाप
पूर्ण हो मनोकामना भागे दुःख संताप

उत्पन्न करता विश्व की शक्ति अपरम्पार
इसका अर्चन जो करे भव से उतरे पार

दुर्गा शोकविनाशिनी ममता का है रूप
सती साध्वी सतवंती सुख की कला अनूप

जय जय दुर्गे माँ, जय जय दुर्गे माँ
जय जय दुर्गे माँ, जय जय दुर्गे माँ

विष्णु ब्रह्मा रूद्र भी दुर्गा के है अधीन
बुद्धि विद्या वरदानी सर्वसिद्धि प्रवीण

लाख चौरासी योनियां से ये मुक्ति दे
महामाया जगदम्बिके जब भी दया करे

दुर्गा दुर्गति नाशिनी सिंघवाहिनी सुखकार
वेदमाता ये गायत्री सबकी पालनहार

सदा सुरक्षित वो जन है जिस पर माँ का हाथ
विकट डगरिया पे उसकी कभी ना बिगड़े बात

जय जय दुर्गे माँ, जय जय दुर्गे माँ
जय जय दुर्गे माँ, जय जय दुर्गे माँ

महागौरी वरदायिनी मैया दुःख निदान
शिवदूती ब्रह्मचारिणी करती जग कल्याण

संकटहरणी भगवती की तू माला फेर
चिंता सकल मिटाएगी घडी लगे ना देर

पारस चरणन दुर्गा के जग जग माथा टेक
सोना लोहे को करे अद्भुत कौतक देख

भवतारक परमेश्वरि लीला करे अनंत
इसके वंदन भजन से पापो का हो अंत

जय जय दुर्गे माँ, जय जय दुर्गे माँ
जय जय दुर्गे माँ, जय जय दुर्गे माँ

जय जय दुर्गे माँ, जय जय दुर्गे माँ
जय जय दुर्गे माँ, जय जय दुर्गे माँ

जय जय दुर्गे माँ, जय जय दुर्गे माँ
जय जय दुर्गे माँ, जय जय दुर्गे माँ

दुर्गा माँ दुःख हरने वाली - दुर्गा अमृतवाणी

दुर्गा माँ दुःख हरने वाली मंगल मंगल करने वाली
भय के सर्प को मारने वाली भवनिधि से जग तारने वाली

अत्याचार पाखंड की दमिनी वेद पुराणों की ये जननी
दैत्य भी अभिमान के मारे दीन हीन के काज संवारे

सर्वकलाओं की ये मालिक शरणागत धनहीन की पालक
इच्छित वर प्रदान है करती हर मुश्किल आसान है करती

भ्रामरी हो हर भ्रम मिटावे कण-कण भीतर कजा दिखावे
करे असम्भव को ये सम्भव धन धान्य और देती वैभव

महासिद्धि महायोगिनी माता महिषासुर की मर्दिनी माता
पूरी करे हर मन की आशा जग है इसका खेल तमाशा

जय दुर्गा जय-जय दमयंती जीवन-दायिनी ये ही जयन्ती
ये ही सावित्री ये कौमारी महाविद्या ये पर उपकारी

सिद्ध मनोरथ सबके करती भक्त जनों के संकट हरती
विष को अमृत करती पल में यही तारती पत्थर जल में

इसकी करुणा जब है होती माटी का कण बनता मोती
पतझड़ में ये फूल खिलावे अंधियारे में जोत जलावे

वेदों में वर्णित महिमा इसकी ऐसी शोभा और है किसकी
ये नारायणी ये ही ज्वाला जपिए इसके नाम की माला

ये ही है सुखेश्वरी माता इसका वंदन करे विधाता
पग-पंकज की धूलि चंदन इसका देव करे अभिनंदन

जगदम्बा जगदीश्वरी दुर्गा दयानिधान
इसकी करुणा से बने निर्धन भी धनवान

छिन्नमस्ता जब रंग दिखावे भाग्यहीन के भाग्य जगावे
सिद्धि दात्री आदि भवानी इसको सेवत है ब्रह्मज्ञानी

शैल-सुता माँ शक्तिशाला इसका हर एक खेल निराला
जिस पर होवे अनुग्रह इसका कभी अमंगल हो ना उसका

इसकी दया के पंख लगाकर अम्बर छूते है कई जाकर
राय को ये ही पर्वत करती गागर में है सागर भरती

इसके कब्जे जग का सब है शक्ति के बिना शिव भी शव है
शक्ति ही है शिव की माया शक्ति ने ब्रह्मांड रचाया

इस शक्ति का साधक बनना निष्ठावान उपासक बनना
कुष्मांडा भी नाम इसका कण-कण में है धाम इसका

दुर्गा माँ प्रकाश स्वरूपा जप-तप ज्ञान तपस्या रूपा
मन में ज्योत जला लो इसकी साची लगन लगा लो इसकी

कालरात्रि ये महामाया श्रीधर के सिर इसकी छाया
इसकी ममता पावन झुला इसको ध्यानु भक्त ना भुला

इसका चिंतन चिंता हरता भक्तो के भंडार है भरता
साँसों का सुरमंडल छेड़ो नवदुर्गा से मुंह न मोड़ो

चन्द्रघंटा कात्यानी महादयालू महाशिवानी
इसकी भक्ति कष्ट निवारे भवसिंधु से पार उतारे

अगम अनंत अगोचर मैया शीतल मधुकर इसकी छैया
सृष्टि का है मूल भवानी इसे कभी न भूलो प्राणी

दुर्गा की कर साधना मन में रख विश्वास
जो मांगोगे पाओगे क्या नहीं मेरी माँ के पास

खड्ग-धारिणी हो जब आई काल रूप महाकाली कहाई
शुम्भ निशुम्भ को मार गिराया देवों को भय-मुक्त बनाया

अग्निशिखा से हुई सुशोभित सूरज की भाँती प्रकाशित
युद्ध-भूमि में कला दिखाई दानव बोले त्राहि-त्राहि

करे जो इसका जाप निरंतर चले ना उस पर टोना मंत्र
शुभ-अशुभ सब इसकी माया किसी ने इसका पार ना पाया

इसकी भक्ति जाए ना निष्फल मुश्किल को ये डाले मुश्किल
कष्टों को हर लेने वाली अभयदान वर देने वाली

धन लक्ष्मी हो जब आती कंगाली है मुंह छुपाती
चारों और छाए खुशहाली नजर ना आये फिर बदहाली

कल्पतरु है महिमा इसकी कैसे करू मै उपमा इसकी
फलदायिनी है भक्ति जिसकी सबसे न्यारी शक्ति उसकी

अन्नपूर्णा अन्न-धनं को देती सुख के लाखों साधन देती
प्रजा-पालक इसे ध्याते नर-नारायण भी गुण गाते

चम्पाकली सी छवि मनोहर इसकी दया से धर्म धरोहर
त्रिभुवन की स्वामिनी ये है योगमाया गजदामिनी ये है

रक्तदन्ता भी इसे है कहते चोर निशाचर दानव डरते
जब ये अमृत-रस बरसावे मृत्युलोक का भय ना आवे

काल के बंधन तोड़े पल में सांस की डोरी जोड़े पल में
ये शाकम्भरी माँ सुखदायी जहां पुकारू वहां सहाई

विंध्यवासिनी नाम से करे जो निशदिन याद
उसे ग्रह में गूंजता हर्ष का सुरमय नाद

ये चामुण्डा चण्ड-मुण्ड घाती निर्धन के सिर ताज सजाती
चरण-शरण में जो कोई जाए विपदा उसके निकट ना आये

चिंतपूर्णी चिंता है हरती अन्न-धनं के भंडारे भरती
आदि-अनादि विधि विधाना इसकी मुट्ठी में है जमाना

रोली कुमकुम चन्दन टीका जिसके सम्मुख सूरज फीका
ऋतुराज भी इसका चाकर करे आराधना पुष्प चढ़ाकर

इंद्र देवता भवन धुलावे नारद वीणा यहाँ बजावे
तीन लोक में इसकी पूजा माँ के सम न कोई भी दूजा

ये ही वैष्णो आदिकुमारी भक्तन की पत राखनहारी
भैरव का वध करने वाली खण्डा हाथ पकड़ने वाली

ये करुणा का न्यारा मोती रूप अनेकों एक है ज्योति
माँ वज्रेश्वरी कांगड़ा वाली खाली जाए ना कोई सवाली

ये नरसिंही ये वाराही नेहमत देती ये मनचाही
सुख समृद्धि दान है करती सबका ये कल्याण है करती

मयूर कही है वाहन इसका करते ऋषि आहवान इसका
मीठी है ये सुगंध पवन में इसकी मूरत राखो मन में

नैना देवी रंग इसी का पतितपावन अंग इसी का
भक्तो के दुःख लेती ये है नैनो को सुख देती ये है

नैनन में जो इसे बसाते बिन मांगे ही सब कुछ पाते
शक्ति का ये सागर गहरा दे बजरंगी द्वार पे पहरा

इसके रूप अनूप की समता करे ना कोय
पूजे चरण सरोज जो तन मन शीतल होय

कालीका रूप में लीला करती सभी बलाएं इससे डरती
कही पे है ये शांत स्वरूपा अनुपम देवी अति अनूपा

अर्चना करना एकाग्र मन से रोग हरे धनवंतरी बन के
चरणपादुका मस्तक धर लो निष्ठा लगन से सेवा कर लो

मनन करे जो मनसा माँ का गौरव उत्तम पाय जवाका
मन से मनसा जपना पूरा होगा हर इक सपना

ज्वालामुखी का दर्शन कीजो भय से मुक्ति का वर लीजो
ज्योति यहाँ अखण्ड हो जलती जो है अमावस पूनम करती

श्रद्धा भाव को कम ना करना दुःख में हंसना गम ना करना
घट-घट की माँ जाननहारी हर लेती सब पीड़ा तुम्हारी

बगलामुखी के द्वारे जाना मनवांछित ही वैभव पाना
उसी की माया हंसना रोना उससे बेमुख कभी ना होना

शीतल रस की धारा कर देगी कल्याण तुम्हारा
धुनी वहां पे रमाये रखना मन से अलख जगाये रखना

भजन करो कामाख्या जी का धाम है जो माँ पार्वती का
सिद्ध माता सिद्धेश्वरी है राजरानी राजेश्वरी है

धूप दीप से उसे मनाना श्यामा गौरी रटते जाना
जिसने आराधा दूर हुई हर पथ की बाधा

नंदा देवी माँ जो ध्याओगे सच्चा आनंद वही पाओगे
कौशिकी माता जी का द्वारा देगा तुझको सदा सहारा

महालक्ष्मी को पूजते रहियो धन सम्पत्ति पाते ही रहियो
घर में सच्चा सुख बरसेगा भोजन को ना कोई तरसेगा

त्रिपुर मालिनी नाम है न्यारा चमकाए तकदीर का तारा
देविकानाभ में जाकर देखो स्वर्ग धाम वो माँ का देखो

दुर्गा भवानी के दर जाके आस्था से एक चुनर चढ़ा के
जग की खुशियाँ पा जाओगे शहंशाह बनकर आ जाओगे

वहां पे कोई फेर नहीं है देर तो है अंधेर नहीं है
कैला देवी करौली वाली जिसने सबकी चिंता टाली

करणी माँ की अदभुत करणी महिमा उसकी जाए ना वरणी
भूलो ना कभी चौथ की माता जहां पे कारज सिद्ध हो जाता

सप्तश्रंगी मैया की साधना कर दिन रैन
कोष भरेंगे रत्नों से पुलकित होंगे नैन

मंगलमयी सुख धाम है दुर्गा कष्ट निवारण नाम है दुर्गा
सुखद रूप भव तरिणी मैया हिंगलाज भयहारिणी मैया

रमा उमा माँ शक्तिशाला दैत्य दलन को भई विकराला
अंत:करण में इसे बसालो मन को मंदिर रूप बनालो

रोग शोक बाहर कर देती आंच कभी ना आने देती
रत्न जड़ित ये भूषण धारी देवता इसके सदा आभारी

धरती से ये अम्बर तक है महिमा सात समंदर तक है
चींटी हाथी सबको पाले चमत्कार है बड़े निराले

मृत संजीवनी विद्यावाली महायोगिनी ये महाकाली
साधक की है साधना ये ही जपयोगी आराधना ये ही

करुणा की जब नजर घुमावे कीर्तिमान धनवान बनावे
तारा माँ जग तारने वाली लाचारों की करे रखवाली

ये ही है विन्धेश्वरी मैया है वो जगभुवनेश्वरी मैया
इसे ही कहते देवी स्वाहा साधक को दे फल मनचाहा

वृषभ पर भी करे सवारी रुद्राणी माँ महागुणकारी
सर्व संकटो को हर लेती विजय का विजया वर देती

योगकला जप तप की दाती परम पदों की माँ वरदाती
गंगा में है अमृत इसका आत्मबल है जागृत इसका

अन्तर्मन में अम्बिके रखे जो हर ठौर
उसको जग में देवता भावे ना कोई और

मंगल मूर्ति महा सुखकारी संत जनों की है रखवारी
दुर्गा भजन महा फलदायी प्रलय काल में होत सहाई

मोक्षदायिनी माँ जो सुमिरे जन्म मरण के भव से उबरे
रक्षक हो जो क्षीर भवानी चले काल की ना मनमानी

दुखसागर में सुखी जो रहना दुर्गा नाम जपो दिन रैना
अष्टसिद्धि नौ निधियों वाली महादयालु भद्रकाली

सपने सब साकार करेगी दुखियों का उद्धार करेगी
मंगला माँ का चिंतन कीजो हरसिद्धि ते हर सुख लीजो

भक्तो के मन के अंदर रहती है कण-कण के अंदर
सूरज चाँद करोड़ो तारे ज्योति से ज्योति लेते सारे

वो ज्योति है प्राण स्वरूपा तेज वही भगवान स्वरूपा
जिस ज्योति से आये ज्योति अंत उसी में जाए ज्योति

ज्योति है निर्दोष निराली ज्योति सर्वकलाओं वाली
ज्योति ही अंधकार मिटाती ज्योति साचा राह दिखाती

अम्बा माँ की ज्योति में तू ब्रह्मांड को देख
ज्योति ही तो खींचती हर मस्तक की रेख

जगदम्बा जगतारिणी दुर्गा अमृतवाणी

 

जगदम्बा जगतारिणी जगदाती जगपाल
इसके चरणन जो हुए उन पर होए दयाल

माँ की शीतल छाँव में स्वर्ग सा सुख होए
जिसकी रक्षा माँ करे मार सके ना कोय

करुणामयी कापालिनी दुर्गा दयानिधान
जैसे जिसकी भावना वैसे दे वरदान

मातृ श्री महाशारदे नमता देत अपार
हानि बदले लाभ में जब ये हिलावे तार

जय जय आंबे माँ जय जगदम्बे माँ
जय जय आंबे माँ जय जगदम्बे माँ

नश्वर हम खिलौनों की चाबी माँ के हाथ
जैसे इशारा माँ करे नाचे हम दिन-रात

भाग्य लिखे भाग्येश्वरी लेकर कलम-दवात
कठपुतली के बस में क्या सब कुछ माँ के हाथ

पतझड़ दे या दे हमें खुशियों का मधुमास
माँ की मर्जी है जो दे हर सुख उसके पास

माँ करुणा की नाव पर होंगे जो भी सवार
बाल भी बांका होए ना वैरी जो हो संसार

जय जय आंबे माँ जय जगदम्बे माँ
जय जय आंबे माँ जय जगदम्बे माँ

मंगला माँ के भक्त के ग्रह में मंगलाचार
कभी अमंगल हो नहीं पवन चले सुखकार

शक्ति ही को लो शक्ति मिलती इसके धाम
कामधेनु के तुल्य है शिवशक्ति का नाम

चन्दन वृक्ष है एक भला बुरे है लाख बबूल
बदी के कांटे छोड़ के चुन नेकी के फूल

माँ के चरण-सरोज की कलियों जैसे सुगंध
स्वर्ग में भी ना होगा जो है यहाँ आनंद

जय जय आंबे माँ जय जगदम्बे माँ
जय जय आंबे माँ जय जगदम्बे माँ

पाप के काले खेल में सुख ना पावे कोय
कोयले की तो खान में सब कुछ काला होय

निकट ना आने दो कभी दुष्कर्मों के नाग
मानव चोले पर नहीं लगने दीजो दाग

नवदुर्गा के नाम का मनन करो सुखकार
बिन मोल बिन दाम ही करेगी माँ उपकार

भव से पार लगाएगी माँ की एक आशीष
तभी तो माँ को पूजते श्री हरी जगदीश

जय जय आंबे माँ जय जगदम्बे माँ
जय जय आंबे माँ जय जगदम्बे माँ

जय जय आंबे माँ जय जगदम्बे माँ
जय जय आंबे माँ जय जगदम्बे माँ

विधि पूर्वक जोत जलाकर माँ चरणन में ध्यान लगाकर
जो जन मन से पूजा करेंगे जीवन-सिन्धु सहज तरेंगे

कन्या रूप में जब दे दर्शन श्रद्धा-सुमन कर दीजो अर्पण
सर्वशक्ति वो आदिकौमारी जाइये चरणन पे बलिहारी

त्रिपुर रूपिणी ज्ञानमयी माँ भगवती वो वरदानमयी माँ
चंड-मुण्ड नाशक दिव्य स्वरूपा त्रिशूलधारिणी शंकर रूपा

करे कामाक्षी कामना पूरी देती सदा माँ सबरस पूरी
चंडिका देवी का करो अर्चन साफ़ रहेगा मन का दर्पण

सर्व भूतमयी सर्वव्यापक माँ की दया के देवता याचक
स्वर्णमयी है जिसकी आभा चाहती नहीं है कोई दिखावा

कहीं वो रोहिणी कहीं सुभद्रा दूर करत अज्ञान की निद्रा
छल कपट अभिमान की दमिनी सुख सौभाग्य हर्ष की जननी

आश्रय दाति माँ जगदम्बे खप्पर वाली महाबली अम्बे
मुंडन की जब पहने माला दानव दल पर बरसे ज्वाला

जो जन उसकी महिमा गाते दुर्गम काज सुगम हो जाते
जय विजय अपराजिता माई जिसकी तपस्या महाफलदाई

चेतना बुद्धि श्रद्धा माँ है दया शांति लज्जा माँ है
साधन सिद्धि वर है माँ का जहां भक्ति वो घर है माँ का

सप्तशती में दुर्गा दर्शन शतचंडी है उसका चिन्तन
पूजा ये सर्वार्थ साधक भवसिंधु की प्यारी नावक

देवी कुण्ड के अमृत से तन मन निर्मल हो
पावन ममता के रस में पाप जन्म के धो

अष्टभुजा जग मंगल करणी योगमाया माँ धीरज धरनी
जब कोई इसकी स्तुति करता कागा मन हंस बनता

महिष मर्दिनी नाम है न्यारा देवों को जिसने दिया सहारा
रक्तबीज को मारा जिसने मधु कैटभ को मारा जिसने

धूम्रलोचन का वध कीन्हा अभयदान देवन को दीन्हा
जग में कहाँ विश्राम इसको बार-बार प्रणाम है इसको

यज्ञ हवन कर जो बुलाते भ्रमराम्भा माँ की शरण में जाते
उनकी रखती दुर्गा लाज बन जाते हैं बिगड़े काज

सुख पदार्थ उनको है मिलते पांचों चोर ना उनको छलते
शुद्ध भाव से गुण गाते चक्रवर्ती है वो कहलाते

दुर्गा है हर जन की माता कर्महीन निर्धन की माता
इसके लिए कोई गैर नहीं है इसे किसी से बैर नहीं है

रक्षक सदा भलाई की मैया शत्रु सिर्फ बुराई की मैया
अनहद ये स्नेह का सागर कोई नहीं है इसके बराबर

दधिमति भी नाम है इसका पतित पावन धाम है इसका
तारा माँ जब कला दिखाती भाग्य के तारे है चमकाती

कौशिकी देवी पूजते रहिये हर संकट से जूझते रहिये
नैया पार लगाएगी माता भय हरने को आएगी माता

अम्बिका नाम धराने वाली सूखे वृक्ष तिलाने वाली
पारस मणियाँ जिसकी माला दया की देवी माँ कृपाला

मोक्षदायिनी के द्वारे भक्त खड़े कर जोड़
यमदूतों के जाल को घड़ी में दे जो तोड़

भैरवी देवी का करो वंदन ग्वाल बाल से खिलेगा आँगन
झोलियाँ खाली ये भर देती शक्ति भक्ति का वर देती

विमला मैया ना विसराओ भावना का प्रसाद चढ़ाओ
माटी को कर देगी चंदन साची माँ ये असुर निकंदन

तोड़ेगी जंजाल ये सारे सुख देती तत्काल ये सारे
पग पंकज की धूलि पा लो माथे उसका तिलक लगा लो

हर एक बाधा टल जाएगी भय की डायन जल जाएगी
भक्तों से ये दूर नहीं है दाती है मजबूर नहीं है

उग्र रूप माँ उग्र तारा जिसकी रचना ये जग सारा
अपनी शक्ति जब दिखलाती उंगली पर संसार नचाती

जल थल नील गगन की मालिक अग्नि और पवन की मालिक
दशों दिशाओं में ये रहती सभी कलाओं में ये रहती

इसके रंग में ईश्वर रंगा ये ही है आकाश की गंगा
इन्द्रधनुष है माया इसकी नजर ना आती काया इसकी

जड़ भी ये ही चेतन ये ही साधक ये ही साधन ये ही
ये महादेवी ये महामाया किसी ने इसका पार ना पाया

ये है अर्पणा ये श्री सुन्दरी चन्द्रभागा ये सावित्री
नारायणी का रूप यही है नंदिनी माँ का स्वरूप यही है

जप लो इसके नाम की माला कृपा करेगी ये कृपाला
ध्यान में जब तुम खो जाओगे माँ के प्यारे हो जाओगे

इसका साधक कांटों पे फूल समझ कर सोए
दुःख भी हंस के झेले कभी ना विचलित होए

सुख सरिता देवी सर्वानी मंगल चंडी शिव शिवानी
आस का दीप जलाने वाली प्रेम सुधा बरसाने वाली

मुम्बा देवी की करो पूजा ऐसा मंदिर और ना दूजा
मनमोहिनी मूरत माँ की दिव्य ज्योत है सूरत माँ की

ललिता ललित कला की मालक विकलांग और लाचार की पालक
अमृत वर्षा जहाँ भी करती रत्नों से भंडार है भरती

ममता की माँ मीठी लोरी थामे बैठी जग की डोरी
दुश्मन सब और गुणी ज्ञानी सुनते माँ की अमृत वाणी

सर्व समर्थ सर्वज्ञ भवानी पार्वती ही माँ कल्याणी
जय दुर्गे जय नर्मदा माता मुरलीधर गुण तेरा गाता

ये ही उमा मिथिलेश्वरी है भयहरिणी भक्तेश्वरी है
देवता झुकते द्वार पे इसके कौन गिने उपकार इसके

माला धारी ये मृगवाही सरस्वती माँ ये वाराही
अजर अमर है ये अनंता सकल विश्व की इसको चिंता

कन्याकुमारी धाम निराला धन पदार्थ देने वाला
देती ये संतान किसी को जीविका के वरदान किसी को

जो श्रद्धा विश्वास से आता कोई क्लेश ना उसे सताता
जहाँ ये वर्षा सुख की करती वहाँ पे सिद्धियाँ पानी भरती

विधि विधाता दास है इसके करुणा का धन पास है इससे
ये जो मानव हँसता रोता माँ की इच्छा से ही होता

श्रद्धा दीप जलाए के जो भी करे अरदास
उसकी माँ के द्वार पे पूर्ण हो सब आस

कोई कहे इसे महाबली माता जो भी सुमिरे वो फल पाता
निर्बल को बल यही पे मिलता घड़ियों में ही भाग्य बदलता

अच्छरू माँ के गुण जो गावे पूजा ना उसकी निष्फल जावे
अच्छरू सब कुछ अच्छा करती चिंता संकट भय को हरती

करुणा का यहाँ अमृत बहता मानव देख चकित है रहता
क्या क्या पावन नाम है माँ के मुक्तिदायक धाम है माँ के

कहीं पे माँ जागेश्वरी है करुणामयी करुणेश्वरी है
जो जन इसके भजन में जागे उसके घर दर्द है भागे

नाम कहीं है अरासुर अम्बा पापनाशिनी माँ जगदम्बा
की जो यहाँ आराधना मन से झोली भरेगी भक्ति धन से

भूत पिशाच का डर ना रहेगा सुख का झरना सदा बहेगा
हर शत्रु पर विजय मिलेगी दुःख की काली रात टलेगी

कनकावती करेडी माई संत जनों की सदा सहाई
सच्चे दिल से करे जो पूजन पाये गुनाह से मुक्ति दुर्जन

हर सिद्धि का जाप जो करता किसी बला से वो नहीं डरता
चिंतन में जब मन खो जाता हर मनोरथ सिद्ध हो जाता

कहीं है माँ का नाम खनारी शान्ति मन को देती न्यारी
इच्छापूर्ण करती पल में शहद घुला है यहाँ के जल में

सबको यहाँ सहारा मिलता रोगों से छुटकारा मिलता
भलाई जिसने करते रहना ऐसी माँ का क्या है कहना

क्षीरजा माँ अम्बिके दुःख हरन सुखधाम
जन्म जन्म के बिगड़े हुए यहाँ पे सिद्ध हो काम

झंडे वाली माँ सुखदाती कांटो को भी फूल बनाती
यहाँ भिखारी भी जो आता दानवीर वो है बन जाता

बांझों को यहाँ बालक मिलते इसकी दया से लंगड़े चलते
श्रद्धा भाव प्यार की भूखी ये है दिली सत्कार की भूखी

यहाँ कभी अभिमान ना करना कंजकों का अपमान ना करना
घट-घट की ये जाननहारी इसको सेवत दुनिया सारी

भयहरिणी भंडारिका देवी जिसे ध्याया देवों ने भी
चरण शरण में जो भी आये वो कंकड़ हीरा बन जाए

बुरे ग्रह का दोष मिटाती अच्छे दिनों की आस जगाती
ऐसा पलटे माँ ये पासा हो जाती है दूर निराशा

उन्नति के ये शिखर चढ़ावे रंको को ये राजा बनावे
ममता इसकी है वरदानी भूल के भी ना भूलो प्राणी

कहीं पे कुंती बन के बिराजे चारों ओर ही डंका बाजे
सपने में भी जो नहीं सोचा यहाँ पे वो कुछ मिलते देखा

कहता कोई समुंद्री माता कृपा समुंद्र का रस है पाता
दागी चोले यहाँ पर धुलते बंद नसीबों के दर खुलते

दया समुंद्र की लहराए बिगड़ी कईयों की बन जाए
लहरें समुंद्र में है जितनी करुणा की है नेहमत उतनी

इतने ये उपकार है करती हो नहीं सकती गिनती
जिसने डोर लगन की बाँधी जग में उत्तम पाये उपाधि

सर्व मंगल जगजननी मंगल करे अपार
सबकी मंगल कामना करता इसका द्वार

भादवा मैया है अति प्यारी अनुग्रह करती पातकहारी
आपतियों का करे निवारण आप कर्ता आप ही कारण

झोपड़ी में वो मंदिर में वो बाहर भी वो अंदर में वो
वर्षा वो ही बसंत वो ही लीला करे अनंत वो ही

दान भी वो ही दानी वो ही प्यास भी वो ही पानी वो ही
दया भी वो दयालु वो ही कृपा रूप कृपालु वो ही

एक वीरा माँ नाम उसी का धर्म कर्म है काम उसी का
एक ज्योति के रूप करोड़ों किसी रूप से मुंह ना मोड़ो

जाने वो किस रूप में आये जाने कैसा खेल रचाए
उसकी लीला वो ही जाने उसको सारी सृष्टि माने

जीवन मृत्यु हाथ में उसके जादू है हर बात में उसके
वो जाने क्या कब है देना उसने ही तो सब है देना

प्यार से मांगो याचक बनके की जो विनय उपासक बनके
वो ही नैया वो ही खिवैया वो रचना है वो ही रचैया

जिस रंग रखे उस रंग रहिये बुरा भला ना कुछ भी कहिये
राखे मारे उसकी मर्जी डूबे तारे उसकी मर्जी

जो भी करती अच्छा करती काज हमेशा सच्चा करती
वो कर्मों की गति को जाने बुरा भला वो सब पहचाने

दामन जब है उसका पकड़ा क्या करना फिर तकदीर से झगड़ा
मालिक की हर आज्ञा मानो उसमें सदा भलाई जानो

शांता माँ से शांति मांगो बन के दास
खोटा खरा क्या सोचना कर लिया जब विश्वास

रेणुका माँ पावन मंदिर करता नमन यहाँ पर अम्बर
लाचारों की करे रखवाली कोई सवाली जाए ना खाली

ममता चुनरी की छाँव में स्वर्ग सी सुंदर ही गाँव में
बिगड़ी किस्मत बनती देखी दुःख की रैना ढलती देखी

इस चौखट से लगे जो माथा गर्व से ऊँचा वो हो जाता
रसना में रस प्रेम का भर लो बलिदेवी का दर्शन कर लो

विष को अमृत करेगी मैया दुःख संताप हरेगी मैया
जिन्हें संभाला वो इसे माने मूढ़ भी बनते यहाँ सयाने

दुर्गा नाम की अमृत वाणी नस-नस बीच बसाना प्राणी
अम्बा की अनुकम्पा होगी वन का पंछी बनेगा योगी

पतित पावन जोत जलेगी जीवन गाड़ी सहज चलेगी
ठहरे ना अंधियारा घर में वैभव होगा न्यारा घर में

भक्ति भाव की बहेगी गंगा होगा आठ पहर सत्संगा
छल और कपट ना छलेगा भक्तों का विश्वास फलेगा

पुष्प प्रेम के जाएंगे बांटे जल जाएंगे लोभ के कांटे
जहाँ पे माँ का होय बसेरा हर सुख वहाँ लगाएगा डेरा

चलोगे तुम निर्दोष डगर पे दृष्टि होती माँ के घर पे
पढ़े सुने जो अमृत वाणी उसकी रक्षक आप भवानी

अमृत में जो खो जाएगा वो भी अमृत हो जाएगा
अमृत अमृत में जब मिलता अमृतमयी है जीवन बनता

दुर्गा अमृत वाणी के अमृत भीगे बोल
अंत:करण में तू प्राणी इस अमृत को घोल

जय माता दी
जय माँ दुर्गे

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सारे जहाँ के मालिक तेरा ही आसरा है - Saare Jahan Ke Malik Tera Hi Aasara Hai
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परिचय यह अत्यंत भावपूर्ण और आत्मसमर्पण से भरा भजन परमात्मा के प्रति पूर्ण विश्वास, श्रद्धा और स्वीकार भाव को प्रकट करता है। भजन में भक्त ईश्वर को समस्त संसार का स्वामी मानते हुए कहता है कि उसका एकमात्र सहारा केवल वही प्रभु हैं। जीवन में सुख आए या दुःख, सफलता मिले या कठिनाई — हर परिस्थिति को प्रभु की इच्छा मानकर स्वीकार करना ही सच्ची भक्ति है। भजन के शब्द मनुष्य को यह प्रेरणा देते हैं कि ईश्वर हमारी हर स्थिति, हर पीड़ा और हर भावना को बिना कहे समझते हैं। भक्त अपने जीवन की मजबूरियों, दुःखों और संघर्षों को प्रभु के चरणों में समर्पित कर देता है और उनकी इच्छा में ही अपनी खुशी खोज लेता है। सरल भाषा और गहरे आध्यात्मिक भावों से भरा यह भजन मन को शांति, धैर्य और प्रभु के प्रति अटूट विश्वास से भर देता है। भावार्थ इस भजन में भक्त कहता है कि संसार में उसका सबसे बड़ा सहारा केवल परमात्मा हैं और वही उसके जीवन का आधार हैं। भक्त प्रभु की हर इच्छा को स्वीकार करते हुए कहता है कि जो कुछ भी उसके जीवन में घट रहा है, वह सब भगवान की रज़ा से ही हो रहा है। इसलिए वह हर परिस्थिति में संतोष और समर्पण का भाव रखता है। भजन यह भी बताता है कि भगवान अपने भक्त के मन की हर बात जानते हैं। भक्त चाहे अपनी पीड़ा शब्दों में व्यक्त न कर पाए, फिर भी प्रभु उसकी हर मजबूरी और हर भावना को समझते हैं। जीवन में आने वाले दुःख और सुख दोनों को ईश्वर की कृपा मानकर स्वीकार करना ही सच्चे भक्त का गुण है। अंत में भक्त भगवान से कोई शिकायत नहीं करता, बल्कि इस बात के लिए भी उनका धन्यवाद करता है कि उन्होंने उसे इस संसार में भेजा और अपने स्मरण का अवसर दिया। यह भजन पूर्ण समर्पण, धैर्य, संतोष और प्रभु की इच्छा में प्रसन्न रहने का सुंदर संदेश देता है।

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जय माता दी - Jai Mata Di
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परिचय यह भजन माँ की असीम ममता, करुणा और उनके विभिन्न दिव्य रूपों की महिमा का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन करता है। इसमें माँ को सृष्टि की सर्वोच्च शक्ति और जीवन की आधारशिला के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिनके स्नेह के सामने समस्त संसार फीका प्रतीत होता है। भजन में यह भी दर्शाया गया है कि माँ केवल जन्म देने वाली ही नहीं, बल्कि हर कठिन परिस्थिति में अपने बच्चों की रक्षक, मार्गदर्शक और सहारा भी होती हैं। उनके अलग-अलग रूप—काली, दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी—जीवन के विभिन्न पहलुओं में उनकी महत्ता को उजागर करते हैं। भावार्थ इस भजन में भक्त माँ के प्रति अपनी गहरी श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करता है। वह कहता है कि माँ का नाम लेते ही उसके सारे दुःख और कष्ट दूर हो जाते हैं, क्योंकि माँ हर समय अपने बच्चों की रक्षा के लिए तत्पर रहती हैं। जब जीवन में कठिनाइयाँ आती हैं, तब माँ ही मरहम बनकर उसे संभालती हैं और उसे सही राह दिखाती हैं। भजन यह भी बताता है कि जीवन एक चादर की तरह है, जिसे माँ अपने प्रेम और संस्कारों से बुनती हैं। अंततः यह संदेश मिलता है कि माँ के स्नेह और आशीर्वाद से ही भाग्य जागृत होता है और जीवन में सुख-शांति का संचार होता है।

ऊँची तेरी शान है मैया - Unchi Teri Shaan Hai Maiya
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परिचय यह भजन माँ भवानी की महिमा, उनके दिव्य धाम और उनकी असीम कृपा का अत्यंत सुंदर और भावपूर्ण वर्णन करता है। इसमें माँ को ऐसी शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिनके दरबार में पहुँचकर हर भक्त को बैकुंठ जैसा अनुभव होता है। भजन में उनके मंदिर की दिव्यता, अखंड ज्योति, गंगा की पवित्रता और उनके अलौकिक श्रृंगार का मनोहारी चित्रण किया गया है। यह भजन श्रद्धा, भक्ति और माँ के प्रति अटूट विश्वास को प्रकट करता है। भावार्थ इस भजन में भक्त माँ भवानी की शरण में आकर अपने जीवन की सभी परेशानियों का समाधान पाता है। वह मानता है कि माँ के दरबार में आने से हर दुख दूर हो जाता है और जीवन में सुख-शांति का संचार होता है। माँ की माया इतनी महान है कि वे पलभर में किसी की किस्मत बदल सकती हैं और खाली झोली को भर सकती हैं। भजन यह भी सिखाता है कि माँ के चरणों में सच्चे मन से समर्पण करने पर जीवन की हर कठिनाई आसान हो जाती है और भक्त को सच्चा सहारा मिल जाता है।

हे माँ मुझको ऐसा घर दो - Hey Maa Mujhko Aisa Ghar Do
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परिचय यह भजन माँ के प्रति भक्त की सरल, पवित्र और गहरी इच्छा को व्यक्त करता है, जिसमें वह अपने घर को ही एक मंदिर के रूप में देखना चाहता है। इसमें वह माँ से प्रार्थना करता है कि उसके घर में ऐसा वातावरण बने, जहाँ हर समय भक्ति, सेवा और श्रद्धा का वास हो। भजन में माँ की कृपा, उनके सान्निध्य और उनके नाम की ज्योति को जीवन का सबसे बड़ा सुख बताया गया है। यह भजन भक्ति और सेवा के आदर्श जीवन की प्रेरणा देता है। भावार्थ इस भजन में भक्त माँ से यह वरदान मांगता है कि उसका घर ऐसा हो, जहाँ हर समय माँ का वास हो और उनकी ज्योति निरंतर जलती रहे। वह चाहता है कि उसके घर से कोई भी खाली हाथ न लौटे और सभी को समान सम्मान और प्रेम मिले। भजन यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति केवल मंदिरों तक सीमित नहीं, बल्कि हमारे घर और व्यवहार में भी झलकनी चाहिए। अंततः यह संदेश देता है कि यदि हम अपने जीवन और घर को सेवा, दया और श्रद्धा से भर दें, तो वही स्थान एक पवित्र मंदिर बन जाता है, जहाँ स्वयं माँ का निवास होता है।

मेरे घर आओ माँ - Mere Ghar Aao Maa
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परिचय यह भजन माँ दुर्गा को अपने घर आमंत्रित करने की एक भावपूर्ण और सच्ची पुकार है, जिसमें भक्त नवरात्रि के पावन अवसर पर माँ को अपने घर पधारने की विनती करता है। इसमें माँ के विभिन्न स्वरूपों, उनकी सवारी, उनके श्रृंगार और उनकी महिमा का सुंदर वर्णन किया गया है। भजन में भक्त का प्रेम, उसकी श्रद्धा और माँ के दर्शन पाने की तीव्र इच्छा स्पष्ट रूप से झलकती है, जो इसे अत्यंत मधुर और भक्तिमय बनाती है। भावार्थ इस भजन में भक्त माँ से प्रार्थना करता है कि वे उसके घर आकर उसे अपने दर्शन दें और उसके जीवन को धन्य करें। वह कहता है कि वह पूरी श्रद्धा से उनकी पूजा करेगा, भोग लगाएगा और आरती करेगा। भजन यह भी दर्शाता है कि माँ के नौ रूपों की उपासना से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। अंततः यह संदेश मिलता है कि सच्चे मन से माँ को बुलाने पर वे अवश्य अपने भक्त के पास आती हैं और उसकी हर मनोकामना पूर्ण करती हैं।

नगर में देवी आई - Nagar Mein Devi Aayi
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परिचय यह भजन माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों और उनकी असीम शक्ति, करुणा और महिमा का अत्यंत भव्य और भक्तिपूर्ण वर्णन करता है। इसमें माँ को “सर्व मंगल मांगल्ये” कहकर उनकी सार्वभौमिक शक्ति और कृपा को प्रणाम किया गया है। भजन में नवरात्रि के नौ दिनों में पूजे जाने वाले माँ के विभिन्न रूपों—शैलपुत्री से लेकर सिद्धिदात्री तक—का सुंदर उल्लेख है, जो भक्तों को उनके विविध स्वरूपों और उनकी महत्ता से परिचित कराता है। यह भजन भक्ति, श्रद्धा और उत्सव का अद्भुत संगम है। भावार्थ इस भजन में यह भाव प्रकट किया गया है कि माँ दुर्गा ही समस्त संसार की रक्षक और पालनकर्ता हैं, जो अपने विभिन्न रूपों में भक्तों के कष्टों को दूर करती हैं। उनके नाम का स्मरण ही सबसे बड़ा सहारा है, जो जीवन के हर संकट को समाप्त कर सकता है। भजन यह भी दर्शाता है कि माँ के दरबार में सच्चे मन से झुकने पर हर मनोकामना पूर्ण होती है और जीवन में सुख-शांति का संचार होता है। माँ के नौ रूपों के माध्यम से यह सिखाया गया है कि वे हर रूप में अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और उन्हें सही मार्ग दिखाती हैं। यह भजन हमें माँ के प्रति अटूट विश्वास और समर्पण बनाए रखने की प्रेरणा देता है।

मैया ने झोली भरी - Maiya Ne Jholi Bhari
मैया ने झोली भरी - Maiya Ne Jholi Bhari

परिचय यह भजन माँ के दरबार की महिमा, वहाँ मिलने वाले स्नेह, अपनापन और दिव्य आनंद का अत्यंत सुंदर और भावपूर्ण चित्रण करता है। इसमें एक भक्त की वर्षों की प्रतीक्षा और उसकी पूर्ण हुई इच्छा का वर्णन है, जब उसे माँ के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होता है। भजन यह दर्शाता है कि माँ का आंगन केवल एक स्थान नहीं, बल्कि प्रेम, शांति और आध्यात्मिक आनंद का केंद्र है, जहाँ पहुँचकर हर भक्त अपने सभी दुख भूल जाता है। भावार्थ इस भजन में भक्त अपनी प्रसन्नता और कृतज्ञता व्यक्त करता है कि उसे माँ के दरबार में हाजिरी लगाने का अवसर मिला। वह बताता है कि माँ के दरबार में हमेशा प्रकाश और सकारात्मक ऊर्जा रहती है, और वहाँ जाने वाला हर व्यक्ति एक नई अनुभूति प्राप्त करता है। माँ की कृपा से उसकी झोली भर गई और उसके जीवन की सभी इच्छाएं पूरी हो गईं। भजन यह संदेश देता है कि सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ माँ को पुकारने पर वे अवश्य अपने भक्त को दर्शन देती हैं और उसे अपने आशीर्वाद से धन्य करती हैं।

ममता की छाँव - Mamta Ki Chaanw
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परिचय यह भजन मां के प्रति अटूट प्रेम, श्रद्धा और कृतज्ञता की भावना को अत्यंत भावुक और हृदयस्पर्शी शब्दों में व्यक्त करता है। इसमें मां को जीवन का आधार, शक्ति का स्रोत और सच्चे अर्थों में संसार का रूप बताया गया है। भजन में यह भाव प्रकट होता है कि मां की ममता, उसका आंचल और उसकी दुआएं ही संतान के जीवन को दिशा, सुरक्षा और सुकून प्रदान करती हैं। यह भजन हर व्यक्ति को अपनी मां के महत्व और उसके अनमोल प्रेम का एहसास कराता है। भावार्थ इस भजन में संतान अपनी मां के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त करता है और स्वीकार करता है कि जीवन के हर कठिन क्षण में मां ही उसका सहारा बनी है। जब-जब दुख और पीड़ा आई, मां के आंचल ने उसे संभाला और उसकी दुआओं ने उसे बचाया। मां की गोद को स्वर्ग के समान बताया गया है, जहां सुकून और शांति मिलती है। भजन यह भी दर्शाता है कि मां की शक्ति और आशीर्वाद से ही संतान हर चुनौती का सामना कर पाती है। अंततः यह संदेश दिया गया है कि हमें हमेशा अपनी मां के प्रति सम्मान, प्रेम और समर्पण बनाए रखना चाहिए, क्योंकि वही हमारे जीवन की सबसे बड़ी ताकत और सच्चा सहारा है।

जगदंबा भवानी - Jagdamba Bhawani
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परिचय यह भजन माँ दुर्गा के प्रति अटूट श्रद्धा, विश्वास और समर्पण का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण करता है। इसमें माँ को सृष्टि की जननी, शक्ति का स्रोत और अपने भक्तों की सच्ची रक्षक के रूप में स्मरण किया गया है। भजन में भक्त माँ की ममता, उनकी कृपा और उनके विभिन्न रूपों—जगदंबा, भवानी, रुद्राणी, ब्रह्माणी—का गुणगान करते हुए उनसे अपने जीवन में मार्गदर्शन और संरक्षण की प्रार्थना करता है। यह भजन भक्त और माँ के बीच के गहरे भावनात्मक संबंध को उजागर करता है। भावार्थ इस भजन में भक्त यह स्वीकार करता है कि संसार में माँ की ममता से बढ़कर कुछ भी नहीं है और वही उसके जीवन की सबसे बड़ी शक्ति और सहारा है। जब भी वह डरता है या जीवन में भटकता है, वह माँ से हिम्मत और सही रास्ता दिखाने की प्रार्थना करता है। भजन यह भी दर्शाता है कि संसार के धोखे और दुखों से थककर भक्त अंततः माँ की शरण में आता है और उनसे अपने जीवन की नैया पार लगाने की विनती करता है। यह भजन हमें सिखाता है कि सच्चे मन से माँ को पुकारने पर वे अवश्य अपने भक्त की रक्षा करती हैं, उसे साहस देती हैं और जीवन की हर कठिनाई में उसका मार्गदर्शन करती हैं।