नवीनतम भजन - Latest Bhajans
यहाँ आपको सभी श्रेणियों के नवीनतम प्रकाशित भजन मिलेंगे —राम, हनुमान, शिव, कृष्ण, माता रानी और अन्य।
इन भजनों के पूरे बोल (Lyrics), विवरण और PDF डाउनलोड सुविधा के साथ उपलब्ध हैं।
श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी - Shri Krishna Govind Hare Murari
परिचय “श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी” एक अत्यंत प्रसिद्ध और पावन श्रीकृष्ण भजन है। यह नाम-संकीर्तन शैली का भजन है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण और भगवान विष्णु के दिव्य नामों का जप किया जाता है। यह भजन मंदिरों, सत्संग, भजन संध्या और जन्माष्टमी जैसे पावन अवसरों पर श्रद्धा से गाया जाता है। भावार्थ इस भजन में भक्त भगवान को उनके विभिन्न नामों — कृष्ण, गोविंद, मुरारी, नारायण, वासुदेवा — से पुकारता है। इन नामों का स्मरण करते हुए वह प्रभु की शरण में जाता है और अपनी भक्ति व्यक्त करता है। यह भजन नाम-जप की महिमा को दर्शाता है। भगवान के पवित्र नामों का संकीर्तन करने से मन शांत होता है, श्रद्धा बढ़ती है और आत्मा को दिव्य आनंद की अनुभूति होती है।
चरणों में रखना मैया जी - Charno Mein Rakhna Maiya Ji
परिचय “चरणों में रखना मैया जी” एक अत्यंत भावपूर्ण देवी भजन है। इसमें भक्त अपने जीवन की कठिनाइयों और असहाय स्थिति को व्यक्त करते हुए माता से अपने चरणों में स्थान देने की प्रार्थना करता है। यह भजन नवरात्रि, माता की चौकी और जागरण में गहरी श्रद्धा से गाया जाता है। भावार्थ इस भजन में भक्त स्वयं को जीवन की भँवर में फँसी पुरानी नाव के समान बताता है, जिसकी पतवार छूट चुकी है। संसार के लोग साथ छोड़ देते हैं, पर माँ ही सच्चा सहारा और किनारा हैं। भक्त विनम्रता से प्रार्थना करता है कि माँ उसकी खाली झोली भर दें और उसे अपने चरणों में स्थान दें। यह भजन पूर्ण समर्पण, विश्वास और माँ की शरणागति का सुंदर उदाहरण है।
श्री रामाष्टकम् - Shree Ram Ashtakam
परिचय श्री रामाष्टकम् की रचना महर्षि वेदव्यास द्वारा की गई है। यह अष्टकम् भगवान श्रीराम के सगुण-निर्गुण, ब्रह्मस्वरूप और करुणामय तत्व का अद्भुत वर्णन करता है। इसमें श्रीराम को परब्रह्म, गुरु, तारक और मोक्षदाता के रूप में स्वीकार किया गया है। भावार्थ यह अष्टकम् बताता है कि श्रीराम केवल अयोध्या के राजा नहीं, बल्कि परम सत्य और अद्वैत ब्रह्म हैं। उनका स्मरण समस्त पापों का नाश करता है, भय दूर करता है और अंततः जीव को मोक्ष प्रदान करता है। अर्थ (संक्षिप्त व्याख्या) राममद्वयम् – अद्वैत ब्रह्म स्वरूप राम समस्तपापखण्डनम् – सभी पापों का नाश भवाब्धि पोत – संसार सागर से पार कराने वाली नौका महावाक्यबोधक – उपनिषदों द्वारा प्रतिपादित ब्रह्म भवच्छिदम् – जन्म-मरण से मुक्ति देने वाले
मैं बालक तू माता शेरां वालिए - Main Balak Tu Mata Sheranwaliye
परिचय “मैं बालक तू माता शेरां वालिए” एक प्रसिद्ध माता वैष्णो देवी भजन है। यह भजन भक्त और माँ के बीच अटूट संबंध, प्रेम और विश्वास को दर्शाता है। इसमें भक्त स्वयं को माँ का बालक मानकर पूर्ण समर्पण व्यक्त करता है। यह भजन विशेष रूप से नवरात्रि, माता की चौकी और जागरण में गाया जाता है। भावार्थ इस भजन में भक्त कहता है कि वह माता का बालक है और यह रिश्ता अटूट है। माँ की ममता, प्यार और आशीर्वाद से ही जीवन में बुद्धि, साहस और ज्ञान मिलता है। जब हृदय में माँ की ज्योति बस जाती है, तो हर मंदिर में उसी का स्वरूप दिखाई देता है। भक्त जीवन भर माता की सेवा करने और उनके गुण गाने का संकल्प लेता है। यह भजन पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और समर्पण का प्रतीक है।
राधे अलबेली सरकार - Radhe Albeli Sarkar
परिचय यह भजन राधा रानी की करुणा, कृपा और शरणागति की भावना को व्यक्त करता है। इसमें भक्त राधा जी को अपनी नैया पार लगाने वाली अलबेली सरकार के रूप में पुकारता है और वृन्दावन धाम में बुलाने की विनती करता है। भावार्थ भजन का सार यह है कि राधा रानी की कृपा से ही भक्त को वृन्दावन धाम और श्री बिहारी जी के दर्शन का सौभाग्य मिलता है। संसार के बंधनों को छोड़कर जो उनके चरणों में आता है, उसकी जीवन नैया पार हो जाती है। उनकी महिमा अनंत और अपरम्पार है। पाठ का फल इस भजन का गायन करने से राधा नाम में प्रेम बढ़ता है, मन में भक्ति और समर्पण की भावना जागृत होती है। वृन्दावन धाम के प्रति आकर्षण और राधा-कृष्ण की कृपा प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त होता है।
भज मन राधे गोविंदा - Bhajman Radhe Govinda
भजन का परिचय यह भजन “भज मन राधे राधे गोविंदा” ब्रज वैष्णव परंपरा का अत्यंत सरल, मधुर और प्रभावशाली नाम-स्मरण भजन है। इसमें भक्त अपने मन को उपदेश देता है कि वह संसार की चंचलता छोड़कर श्रीराधा और श्रीकृष्ण के पावन नामों का निरंतर स्मरण करे। राधा और गोविंद का संयुक्त नाम जप वैष्णव भक्ति में सर्वोच्च माना गया है। भजन का भावार्थ इस भजन का मूल भाव यह है कि मनुष्य का मन बार-बार विषयों की ओर भटकता है, इसलिए उसे प्रेमपूर्वक समझाया गया है कि वह केवल राधे–राधे गोविंदा का जप करे। राधा नाम के साथ गोविंद का स्मरण यह दर्शाता है कि श्रीकृष्ण तक पहुँचने का सरल और सुलभ मार्ग श्रीराधा की कृपा है। यह भजन भक्त के हृदय में माधुर्य, प्रेम, दीनता और पूर्ण समर्पण का भाव उत्पन्न करता है। निरंतर दोहराव नाम-जप को सहज, गहन और रसपूर्ण बनाता है। यह भजन कब और कहाँ गाया जाता है यह भजन विशेष रूप से वृन्दावन, बरसाना और ब्रज क्षेत्र में नाम-संकीर्तन, राधाष्टमी, जन्माष्टमी, होली और दैनिक साधना के समय गाया जाता है। इस्कॉन मंदिरों, वैष्णव सत्संगों और व्यक्तिगत जप के लिए यह भजन अत्यंत उपयुक्त है।
तुम्हीं में ये जीवन जिए जा रहा हूँ - Tumhi me ye jivan jiye ja raha hu
परिचय यह भजन पूर्ण समर्पण और ईश्वर-एकत्व की भावना को व्यक्त करता है। इसमें भक्त यह स्वीकार करता है कि जीवन, श्वास, ज्ञान, दर्शन और अनुभव – सब कुछ उसी परम सत्ता की देन है। यह गीत अद्वैत भाव और शरणागति का सुंदर उदाहरण है। भावार्थ भजन का सार यह है कि जीवन में जो भी घट रहा है, वह ईश्वर की इच्छा से ही है। सुख-दुख, विष-अमृत, ज्ञान-अज्ञान – सब उसी से उत्पन्न हैं। भक्त स्वयं को एक पथिक मानकर प्रभु के चरणों में पूर्ण समर्पण करता है और जो भी मिलता है, उसे प्रसाद समझकर स्वीकार करता है। पाठ का फल इस भजन का नियमित गायन या चिंतन करने से मन में समर्पण, शांति और संतुलन की भावना विकसित होती है। यह अहंकार को कम करता है और ईश्वर में दृढ़ विश्वास स्थापित करता है। कठिन परिस्थितियों में भी स्वीकार्यता और आंतरिक शक्ति प्रदान करता है।
कृष्णप्रेममयी राधा युगलाष्टकम् - Krishna Prem Mayi Radha Yugalashtakam
परिचय युगलाष्टकम् श्रीराधा–कृष्ण के दिव्य युगल स्वरूप का अत्यंत मधुर और भावपूर्ण स्तवन है। इसमें राधा और कृष्ण को एक-दूसरे का प्रेम, प्राण, धन, चेतना और आश्रय बताया गया है। यह रचना वैष्णव परंपरा में युगल भक्ति और माधुर्य भाव का श्रेष्ठ उदाहरण मानी जाती है, जहाँ राधा और कृष्ण को अलग नहीं बल्कि एकात्म रूप में पूजा जाता है। भावार्थ युगलाष्टकम् का मूल भाव यह है कि श्रीराधा और श्रीकृष्ण परस्पर पूर्णतः अभिन्न हैं। राधा का सर्वस्व कृष्ण हैं और कृष्ण का सर्वस्व राधा हैं। उनका प्रेम, प्राण, चेतना, निवास, वस्त्र और राज्य सब एक-दूसरे में स्थित है। भक्त यह स्वीकार करता है कि उसके जीवन का वास्तविक धन और उसकी शाश्वत गति केवल राधा–कृष्ण युगल ही हैं। पाठ का फल युगलाष्टकम् का नित्य श्रद्धा और प्रेमपूर्वक पाठ करने से— राधा–कृष्ण के प्रति प्रेम और माधुर्य भाव की वृद्धि होती है मन में शांति, कोमलता और भक्तिरस का संचार होता है अहंकार, भय और द्वेष का नाश होता है भक्ति में स्थिरता और गहराई आती है अंततः भक्त को राधा–कृष्ण की कृपा और दिव्य सान्निध्य प्राप्त होता है
श्यामा प्यारी मेरे साथ है - Shyama Pyari Mere Sath Hai
परिचय यह भजन श्यामा प्यारी (राधा रानी) की शरणागति, करुणा और संरक्षण की भावना को दर्शाता है। भक्त स्वयं को उनकी छत्र-छाया में सुरक्षित अनुभव करता है और उनके साथ होने से हर भय समाप्त हो जाता है। भावार्थ भजन का मुख्य संदेश है कि जब राधा रानी का हाथ सिर पर हो, तो जीवन की कोई भी विपत्ति भयावह नहीं रहती। उनकी करुणा, ममता और प्रेम ही भक्त का वास्तविक सहारा है। संसार के रिश्ते क्षणिक हैं, पर श्यामा से जुड़ा संबंध शाश्वत और मोक्षदायक है। पाठ का फल इस भजन का नियमित गायन करने से मन में विश्वास, निर्भयता और प्रेम की भावना उत्पन्न होती है। यह भजन राधा नाम में दृढ़ आस्था जगाता है और जीवन की कठिनाइयों में मानसिक शांति प्रदान करता है।
भीष्म स्तुति - Bhishma Stuti
परिचय यह पावन स्तुति भीष्म पितामह द्वारा शरशय्या पर लेटे हुए भगवान श्रीकृष्ण की आराधना में उच्चारित की गई है। इसमें श्रीकृष्ण को साक्षात् परमब्रह्म, भक्तों के सखा, करुणामय रक्षक और समस्त सृष्टि के अधिष्ठाता के रूप में स्मरण किया गया है। यह स्तुति भागवत महापुराण के प्रथम स्कंध में वर्णित है और जीवन के अंतिम क्षणों में ईश्वर-स्मरण के आदर्श को प्रस्तुत करती है। भावार्थ इस स्तुति का केंद्रीय भाव यह है कि जीवन का परम लक्ष्य भगवान श्रीकृष्ण की शरणागति है। भीष्म पितामह अपने अंतिम समय में श्रीकृष्ण के रूप, लीला, करुणा और भक्तवत्सलता का ध्यान करते हुए उनसे मोक्ष की कामना करते हैं। यह स्तुति सिखाती है कि अहंकार, मोह और भेद-बुद्धि का त्याग कर यदि भक्त संपूर्ण मन से भगवान का स्मरण करे, तो वही स्मरण जीवन और मृत्यु दोनों को सार्थक बना देता है।
कृष्ण कृपा हो तभी - Krishna Kripa Ho Tabhi
परिचय यह भजन भगवान श्रीकृष्ण की कृपा और हरिनाम की महिमा का सुंदर वर्णन करता है। इसमें बताया गया है कि कृष्ण का नाम जप पाना भी स्वयं उनकी कृपा का ही परिणाम है। भावार्थ भजन समझाता है कि संसार की चकाचौंध और रिश्ते क्षणिक हैं। जो वास्तव में साथ जाता है, वह केवल भगवान का नाम और उनकी कृपा है। ठाकुर जी के चरणों से जुड़ना ही जीवन की सच्ची संपत्ति है। पाठ का फल इस भजन के गायन से मन को शांति, भक्ति और वैराग्य की भावना प्राप्त होती है। हरिनाम जपने से मानसिक शुद्धि और भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
चले बाराती भोलेनाथ की शादी - Chale Baraati Bholenath Ki Shaadi
परिचय यह भजन भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य विवाह का उत्सवपूर्ण वर्णन करता है। शिवजी की अनोखी बारात, जिसमें भूत-प्रेत, गण, देवता और स्वयं प्रकृति भी झूम उठती है, इस भजन का मुख्य आकर्षण है। यह गीत महाशिवरात्रि और विवाह उत्सवों में विशेष रूप से गाया जाता है। भावार्थ भजन में शिवजी के वैरागी स्वरूप और उनके विवाह की अद्भुत झांकी प्रस्तुत की गई है। भस्म, चंद्र, गंगा और नागों से सजे भोलेनाथ जब विवाह के लिए चलते हैं तो तीनों लोकों में आनंद की लहर दौड़ जाती है। यह विवाह केवल एक उत्सव नहीं बल्कि शिव और शक्ति के दिव्य मिलन का प्रतीक है। पाठ का फल इस भजन का गायन करने से घर में मंगल, आनंद और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। शिव-पार्वती की कृपा प्राप्त होती है तथा वैवाहिक जीवन में प्रेम, संतुलन और सौहार्द बढ़ता है।
गुरु अष्टकम् - Guru Ashtakam
परिचय श्री गुरु अष्टकम् वैष्णव परंपरा का अत्यंत पावन स्तोत्र है, जिसकी रचना श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने की थी। यह स्तुति सद्गुरु को भगवान श्रीकृष्ण की कृपा का साक्षात् माध्यम मानते हुए उनके श्रीचरणों में पूर्ण शरणागति का भाव प्रकट करती है। इसमें गुरु को अज्ञानरूपी अग्नि से संसार को बचाने वाला, भक्ति का मार्ग दिखाने वाला और राधा-कृष्ण प्रेम का दाता बताया गया है। भावार्थ इस स्तुति का भाव यह है कि सद्गुरु की कृपा से ही जीव संसाररूपी दावानल से मुक्त होकर भक्ति के मार्ग पर अग्रसर होता है। गुरु न केवल शास्त्रज्ञान प्रदान करते हैं, बल्कि अपने आचरण, सेवा और प्रेम के द्वारा भक्त को राधा-कृष्ण की मधुर लीलाओं से जोड़ते हैं। गुरु की प्रसन्नता से ही भगवान की प्रसन्नता प्राप्त होती है, और उनकी कृपा के बिना मोक्ष या भक्ति की सिद्धि संभव नहीं है।
Kevalashtakam - कैवल्याष्टकम्
कैवल्याष्टकम् (जिसे केवलाष्टक भी कहा जाता है) भगवान श्रीहरि के नाम-महात्म्य को प्रकट करने वाला अत्यंत प्रभावशाली वैष्णव स्तोत्र है। इस अष्टक में यह प्रतिपादित किया गया है कि समस्त संसार माया से आवृत है और इस भवसागर से पार उतरने का एकमात्र सत्य और शाश्वत साधन “हरि नाम” ही है। यह स्तोत्र भक्ति, वैराग्य और आत्मबोध का सार प्रस्तुत करता है। भावार्थ (संक्षेप) इस कैवल्याष्टकम् का केंद्रीय भाव यह है कि हरि का नाम ही सर्वश्रेष्ठ साधन और परम सत्य है। यह नाम सबसे अधिक मधुर, मंगलकारी और पावन है। यह अष्टकम् संसार की नश्वरता और जीवन की अनिश्चितता को स्पष्ट करते हुए बताता है कि सभी दुःखों से मुक्ति का एकमात्र उपाय भगवान के नाम का निरंतर स्मरण और कीर्तन है। हरि-नाम ही गुरु, पिता, माता और सच्चा बंधु है। बाल्यकाल से लेकर जीवन के अंतिम क्षण तक नाम-स्मरण करने से चित्त शुद्ध होता है और साधक को शुद्ध चिदानन्द स्वरूप का अनुभव प्राप्त होता है।
राधिका रानी जी - Radhika Rani Ji
यह भजन श्री राधिका रानी के चरणों में पूर्ण समर्पण और बृज-रज की उपासना की भावना को व्यक्त करता है। इसमें भक्त की यही अभिलाषा है कि उसे बृजवासियों की संगति मिले, यमुना-तट, कुंज-गलियाँ, गोवर्धन और श्री राधा-कृष्ण के दिव्य दर्शन सदा प्राप्त होते रहें। यह भजन वैष्णव भक्ति परंपरा में राधा-प्रधान माधुर्य भाव को अत्यंत कोमल रूप में प्रकट करता है। भावार्थ (संक्षेप) इस भजन का मूल भाव यह है कि भक्त संसार के सभी आकर्षण त्यागकर केवल श्री राधा रानी की शरण में रहना चाहता है। बृज की रज, संतों की संगति, यमुना-स्नान और श्री राधा-कृष्ण की लीलाओं में लीन होना ही उसके जीवन का लक्ष्य है। भक्त राधिका को करुणामयी, कृष्ण-मनुहारिणी और बृज की अधिष्ठात्री मानकर उनसे दास्य-भाव से कृपा की याचना करता है।
श्री षड् गोस्वामी अष्टकम् - Shree Sadgoswami Astakam
षड् गोस्वामी अष्टकम् वैष्णव परंपरा का एक अत्यंत पूज्य अष्टकम् है, जिसमें श्री रूप गोस्वामी, श्री सनातन गोस्वामी, श्री रघुनाथ भट्ट गोस्वामी, श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, श्री जीव गोस्वामी और श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी — इन छह महान संतों की दिव्य भक्ति, त्याग, विद्वत्ता और श्री राधा-कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम का वर्णन किया गया है। यह अष्टकम् श्री चैतन्य महाप्रभु की भक्ति-धारा का सार प्रस्तुत करता है। भावार्थ (संक्षेप) इस अष्टकम् का केंद्रीय भाव यह है कि षड् गोस्वामीजन पूर्ण वैराग्य को धारण कर, सांसारिक वैभव त्यागकर, केवल श्री राधा-कृष्ण की प्रेममयी भक्ति में निरंतर लीन रहे। वे नाम-संकीर्तन, नृत्य, गायन और शास्त्र-चिंतन में रत रहकर जीवों के कल्याण हेतु भक्ति-मार्ग की स्थापना करते हैं। वृंदावन में निवास कर वे राधा-कृष्ण की लीलाओं का निरंतर स्मरण करते हुए प्रेमोन्माद की अवस्था में विचरण करते हैं और समस्त संसार को भक्ति का अमृत प्रदान करते हैं।
चौराष्टकम् - Chaurastakam
चौराग्रगण्य पुरुषाष्टकम् भगवान श्रीकृष्ण के उस अलौकिक रूप का स्तवन है जिसमें वे नवनीतचौर — अर्थात् माखन चोर — के रूप में प्रकट होते हैं। यह अष्टकम केवल बाह्य लीलाओं का वर्णन नहीं करता, बल्कि यह बताता है कि श्रीकृष्ण भक्तों के पाप, अहंकार, आसक्ति और बंधनों को चुरा लेने वाले परम करुणामय भगवान हैं। इस अष्टकम में भक्त स्वयं अपने हृदय को श्रीकृष्ण का कारागार मानकर उन्हें वहीं सदा के लिए बाँध लेना चाहता है। भावार्थ (संक्षेप) इस अष्टकम का केंद्रीय भाव यह है कि श्रीकृष्ण संसार के साधारण चोर नहीं, बल्कि सर्वोच्च चोर हैं — जो भक्तों के पाप, मोह, भवबंधन, यमपाश और अहंकार तक को चुरा लेते हैं। वे धन, मान और इन्द्रियों को हरकर जीव को पूर्णतः शरणागत बना देते हैं। भक्त यह स्वीकार करता है कि प्रभु ने उसका सब कुछ चुरा लिया है और अब वह उन्हें अपने हृदय-रूपी कारागार में भक्तिरूपी बंधन से बाँधकर सदा के लिए रोक लेना चाहता है।
जगन्नाथ रक्षामाम् - Jagannath Rakshamam
भावार्थ यह मंत्र पूर्ण शरणागति का भाव प्रकट करता है। भक्त अपने अहंकार, भय और चिंता को त्याग कर भगवान श्रीजगन्नाथ के चरणों में स्वयं को समर्पित करता है। “रक्षामाम्” का अर्थ केवल शारीरिक सुरक्षा नहीं, बल्कि मानसिक शांति आध्यात्मिक रक्षा पापों और भय से मुक्ति भी है। यह मंत्र संकट, भय, असुरक्षा और अनिश्चितता के समय अत्यंत प्रभावी माना जाता है। कब और कैसे जप करें • सुबह स्नान के बाद • रात्रि में सोने से पहले • भय, चिंता या अस्थिर मन की स्थिति में • 11, 21 या 108 बार जप • मन में श्रीजगन्नाथ का स्वरूप (बड़ी गोल आँखें, नीलाचल) स्मरण करते हुए
श्री राधा अष्टकम् - Shree Radha Ashtakam
परिचय श्री राधा अष्टकम् भगवान श्रीकृष्ण की परम प्रियतमा, महाशक्ति स्वरूपा श्रीराधा रानी की दिव्य स्तुति है। इस अष्टक में श्रीराधा को हरि-प्रेम की साक्षात् मूर्ति, वृन्दावन की अधीश्वरी और युगल लीला की मूल शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है। यह स्तुति भक्त को राधा-कृष्ण के नित्य प्रेम-तत्त्व से जोड़ती है और शुद्ध भक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। भावार्थ (संक्षेप) इस अष्टक में भक्त श्रीराधा रानी को अपने जीवन का सर्वस्व मानकर उनका नाम, रूप, गुण और लीला का निरन्तर स्मरण करने की प्रार्थना करता है। स्तुति का मुख्य भाव यह है कि श्रीकृष्ण स्वयं भी श्रीराधा के प्रेम से बँधे हुए हैं और उनकी कृपा से ही हरि-प्रेम की प्राप्ति संभव है। राधा-कृष्ण की युगल सेवा ही परम साध्य है—यही इसका केन्द्रीय भाव है। पाठ का फल श्री राधा अष्टकम् का श्रद्धा और नियमपूर्वक पाठ करने से हृदय में शुद्ध हरि-प्रेम का उदय होता है राधा-कृष्ण की कृपा सहज रूप से प्राप्त होती है सांसारिक आसक्ति का क्षय और वैराग्य की वृद्धि होती है अंततः भक्त को वृन्दावन धाम में युगल सेवा का अधिकारी बनाया जाता है यह पाठ भक्ति-मार्ग में तीव्र प्रगति प्रदान करता है।
ये देखो श्याम - Yeh Dekho Shyam
“ये देखो श्याम” श्रीकृष्ण की मधुर, करुणामय और साक्षात् सान्निध्य का अनुभव कराने वाला एक भावपूर्ण भजन है, जिसे श्री पुंडरिक गोस्वामी जी ने अपनी गहन भक्ति-भावना के साथ प्रस्तुत किया है। यह भजन भक्त को वृन्दावन के श्यामसुन्दर के दर्शन की अनुभूति कराता है और मन को सांसारिक उलझनों से हटाकर कृष्ण-प्रेम में स्थिर करता है। भावार्थ (संक्षेप) इस भजन में भक्त श्रीकृष्ण के रूप, लीलाओं और करुणा को निहारते हुए उन्हें अपने हृदय में बसाने की प्रार्थना करता है। “देखो श्याम” का भाव यह है कि श्यामसुन्दर हर क्षण भक्त के साथ हैं—वे ही आश्रय, शांति और आनंद के स्रोत हैं। यह रचना प्रेम, समर्पण और सहज भक्ति का संदेश देती है। पाठ / श्रवण का फल इस भजन का श्रद्धा से श्रवण या गायन करने से— मन में कृष्ण-प्रेम और शांति का संचार होता है चित्त की एकाग्रता और भक्ति-रस की वृद्धि होती है नकारात्मक भावों का शमन और आंतरिक आनंद की अनुभूति होती है श्रीकृष्ण के प्रति संबंध और विश्वास दृढ़ होता है